

विक्रम सेन
28 फरवरी 2026 से शुरू हुए ईरान–अमेरिका तनाव के बीच वर्तमान में एक नाजुक युद्ध-विराम कायम है, पर स्थायी समझौता अभी दूर दिखाई देता है। इस्लामाबाद के माध्यम से प्रस्तावित वार्ता प्रक्रिया ईरान द्वारा अस्वीकार कर दी गई, क्योंकि अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों पर नौसैनिक ब्लॉकेड जारी रखा है। 21 अप्रैल को Donald Trump ने युद्ध-विराम को अनिश्चित काल के लिए बढ़ाया, लेकिन स्पष्ट संकेत दिया कि जब तक ईरान पूर्ण समझौता नहीं करता, तब तक दबाव की यह नीति जारी रहेगी।
इस पूरे संकट का केंद्र बिंदु बना हुआ है Hormuz जलडमरूमध्य, जहाँ ईरान ने रणनीतिक नियंत्रण बनाए रखते हुए वैश्विक ऊर्जा प्रवाह को गहराई से प्रभावित किया है। यातायात में 90% से अधिक व्यवधान और तेल कीमतों में अस्थिरता ने पूरी विश्व अर्थव्यवस्था को अनिश्चितता के दायरे में डाल दिया है।
ईरान का रुख सतही जिद नहीं, बल्कि एक सोची-समझी “असीमित युद्ध” रणनीति का हिस्सा है। वह सीधे सैन्य टकराव से बचते हुए, ऊर्जा आपूर्ति की नब्ज पकड़कर अमेरिका को दीर्घकालिक संसाधन दबाव में खींच रहा है। ईरान यह भली-भांति समझता है कि पारंपरिक युद्ध में अमेरिका की बढ़त स्पष्ट है, लेकिन Hormuz जैसे रणनीतिक बिंदु पर नियंत्रण उसे ऐसी शक्ति देता है, जिससे वह वैश्विक अर्थव्यवस्था, विशेषकर एशियाई देशों, पर दबाव बनाकर अप्रत्यक्ष रूप से अपने विरोधियों को कमजोर कर सकता है। उसकी रणनीति का मूल सिद्धांत स्पष्ट है, “समय मेरे पक्ष में है।”
दूसरी ओर, अमेरिका ने भी इस संकेत को समझते हुए प्रत्यक्ष युद्ध से दूरी बनाई है। युद्ध-विराम बढ़ाना दरअसल समय खरीदने की रणनीति है। एक तरफ ब्लॉकेड के माध्यम से दबाव बनाए रखा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर पूर्ण सैन्य कार्रवाई से बचा जा रहा है। इसके पीछे ठोस कारण हैं: घरेलू स्तर पर घटती स्वीकृति दर, ईरान नीति को लेकर व्यापक असंतोष, और वैश्विक ऊर्जा संकट के कारण सहयोगी देशों (यूरोप, कनाडा, भारत) में बढ़ती नाराजगी। साथ ही, रूस-यूक्रेन और चीन जैसे अन्य मोर्चों पर भी अमेरिकी संसाधनों का दबाव स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
यह पूरा घटनाक्रम एक बड़े वैश्विक परिवर्तन की ओर संकेत करता है। अमेरिका अब भी सैन्य और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत शक्तिशाली है, वह विश्व का प्रमुख ऊर्जा उत्पादक और सबसे मजबूत नौसैनिक शक्ति बना हुआ है, लेकिन उसका एकाधिकार समाप्त हो चुका है। दुनिया अब एकध्रुवीय नहीं, बल्कि बहुध्रुवीय संतुलन की ओर बढ़ चुकी है, जहाँ शक्ति का खेल “भय” से नहीं, बल्कि “संतुलन” से संचालित हो रहा है।
ट्रंप की आक्रामक नीतियाँ, टैरिफ, प्रतिबंध, और दबाव आधारित कूटनीति ने सहयोगियों में भरोसे की जगह सतर्कता पैदा की है। यूरोपीय देश अब चीन, भारत और अन्य शक्तियों के साथ अपने आर्थिक संबंधों को संतुलित कर रहे हैं। यूक्रेन और पश्चिम एशिया के संघर्षों ने यह भी दिखाया है कि आधुनिक युद्ध केवल सैन्य नहीं, बल्कि आर्थिक और संसाधन-आधारित थकावट की रणनीति बन चुका है।
OPEC+ देश भी अब पूरी तरह अमेरिका-निर्भर नीति से हटकर अपने हितों की स्वतंत्र सुरक्षा कर रहे हैं। वहीं चीन और रूस बिना प्रत्यक्ष युद्ध में उतरे, आर्थिक, ऊर्जा और कूटनीतिक माध्यमों से अमेरिकी प्रभाव को धीरे-धीरे चुनौती दे रहे हैं। ईरान इस पूरे समीकरण में एक “संतुलन बिगाड़ने वाला कारक” बनकर उभरा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद रणनीतिक स्थानों के जरिए वैश्विक समीकरण प्रभावित कर रहा है।
इस पूरे परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण तत्व है, समय की सीमा। अमेरिकी संविधान के 22वें संशोधन के तहत बंधे Donald Trump का कार्यकाल 2029 में समाप्त होना तय है। ऐसे में उनकी नीतियों में त्वरित परिणाम दिखाने और शक्ति प्रदर्शन के माध्यम से अपनी वैश्विक छवि को स्थापित करने की स्पष्ट अधीरता दिखाई देती है। उनकी सोच स्पष्ट है, “कमजोरी आक्रामकता को जन्म देती है”, लेकिन यही आक्रामकता अब सहयोगियों को भी दूरी बनाने पर मजबूर कर रही है।
भारत के हितों का विस्तृत एवं वर्तमान विश्लेषण
चीन-रूस-ईरान अमेरिका की निंदा कर रहे हैं, जबकि भारत और अरब देश संतुलित रुख अपनाए हुए हैं। भारत BRICS चेयर के रूप में मध्यस्थता की भूमिका नहीं निभा रहा, बल्कि राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दे रहा है। इससे ब्रिक्स में दरार जरूर आई है, पर वह समय के साथ मैनेज की जा सकती हैं।
भारत ने किसी एक पक्ष का अंधानुकरण नहीं किया। “स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी” बरकरार है, यह hedging (जोखिम प्रबंधन) का उत्कृष्ट उदाहरण है।
ईरान युद्ध और ट्रंप की आक्रामक नीति ने भारत को अल्पकालिक आर्थिक दबाव दिया है, लेकिन मल्टी-अलाइनमेंट और hedging की रणनीति ने इसे बड़े नुकसान से बचाया है। ऊर्जा विविधीकरण, चाबहार, रूसी तेल और मजबूत घरेलू अर्थव्यवस्था ने भारत को इस “बहुपक्षीय अखाड़े” में मजबूत स्थिति दी है।
दीर्घकाल में यह संकट भारत के लिए अवसर भी साबित हो सकता है, यदि हम INSTC, Gulf साझेदारी और स्वदेशी उत्पादन को और मजबूत करें।
अंततः सत्य यही है कि अमेरिका अब भी सबसे शक्तिशाली राष्ट्र है, लेकिन दुनिया अब उसकी “जागीर” नहीं रही। यह एक ऐसे संक्रमण का दौर है जहाँ ईरान, चीन, रूस और OPEC+ जैसे खिलाड़ी मिलकर शक्ति-संतुलन को नए सिरे से परिभाषित कर रहे हैं। और इस बहुध्रुवीय व्यवस्था में, हर निर्णय, चाहे वह युद्ध-विराम हो या टकराव अब वैश्विक शतरंज की एक चाल बन चुका है, जहाँ जीत किसी एक की नहीं, बल्कि संतुलन बनाए रखने वाले की होगी।
जय हिंद 🇮🇳

