
बेंगलुरु, कर्नाटक । कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के तेजी से बढ़ते प्रभाव के बीच भारतीय न्यायपालिका के भविष्य, नैतिकता और स्वतंत्रता पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और स्पष्ट संदेश देते हुए Justice B. V. Nagarathna ने न्यायिक व्यवस्था के भीतर भ्रष्टाचार, दबाव और तकनीकी निर्भरता को लेकर कठोर और बेबाक रुख अपनाया।
यह वक्तव्य “Reimagining the Judiciary in the Era of Artificial Intelligence” विषय पर आयोजित 22वें द्विवार्षिक राज्य स्तरीय न्यायिक अधिकारियों सम्मेलन में सामने आया, जिसमें Justice Surya Kant, Siddaramaiah, Justice Aravind Kumar सहित अनेक वरिष्ठ न्यायिक हस्तियां उपस्थित रहीं।
न्यायिक अखंडता पर दो टूक: “भ्रष्ट जजों को हटाना ही होगा”
जस्टिस नागरत्ना ने न्यायपालिका के भीतर स्व-शुद्धि (Self-Purification) की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए स्पष्ट कहा: “जो न्यायाधीश अपनी ज्ञात आय के भीतर जीवनयापन नहीं कर सकते और लालच के शिकार हो जाते हैं, उन्हें व्यवस्था से बाहर कर देना चाहिए।”
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि “किसी भी निर्णय में ‘समन्वय’ (coordination) की कोई गुंजाइश नहीं है। दागी निर्णय न्यायाधीश और पूरी न्यायपालिका पर एक स्थायी कलंक है।”
विधिक दृष्टि से महत्व:
यह बयान Judicial Accountability और सुप्रीम कोर्ट के In-House Procedure के तहत अनुशासनात्मक कार्यवाही को और सख्ती से लागू करने की दिशा में संकेत देता है।
साथ ही, 2nd National Judicial Pay Commission के तहत वेतन वृद्धि के बावजूद भ्रष्टाचार को “अस्वीकार्य” ठहराना न्यायिक नैतिकता की सर्वोच्च प्राथमिकता को दर्शाता है।
न्यायिक स्वतंत्रता: “दबाव से मुक्त रहना ही असली न्याय”
जस्टिस नागरत्ना ने न्यायाधीशों को स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा: “न्यायाधीश बाहरी दबावों या अपने सहयोगियों के प्रभाव से मुक्त रहें। उन्हें साहस और स्वतंत्रता विकसित करनी होगी।”
यह कथन भारतीय संविधान के मूल सिद्धांत Rule of Law और Independence of Judiciary को पुनः सुदृढ़ करता है।
AI पर ऐतिहासिक चेतावनी: “न्याय मशीन नहीं, जज ही देंगे”
AI के बढ़ते उपयोग पर उन्होंने संतुलित लेकिन सख्त रुख अपनाते हुए कहा: “न्याय का भविष्य AI से नहीं, बल्कि न्यायाधीशों से तय होगा — जो संवैधानिक मूल्यों, समानता और न्याय के प्रति प्रतिबद्ध होंगे।”
उन्होंने आगे कहा: “न्यायिक स्वतंत्रता में अब एल्गोरिदमिक प्रभाव से स्वतंत्रता भी शामिल है।”
गंभीर उदाहरण:
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपने समक्ष आए एक मामले का उल्लेख किया, जिसमें AI द्वारा “Mercy vs. Mankind” जैसे काल्पनिक। (non-existent) केस लॉ प्रस्तुत किए गए थे।
सुझाए गए सुधार:
वकीलों द्वारा प्रस्तुत केस-लॉ का प्रमाणन (Certification) अनिवार्य हो।
AI को केवल Peripheral Tool (सहायक उपकरण) के रूप में सीमित रखा जाए।
न्यायिक निर्णय प्रक्रिया में मानव विवेक (Human Judgement) सर्वोपरि रहे।
महिला न्यायाधीशों की सुरक्षा: संस्थागत संवेदनशीलता पर जोर
जस्टिस नागरत्ना ने महिला न्यायाधीशों के लिए सुरक्षित, गरिमामय और सक्षम कार्य वातावरण सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा: “केवल संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं, बल्कि सुरक्षा, गरिमा और पूर्वाग्रह-मुक्त वातावरण भी अनिवार्य है।”
यह बयान न्यायपालिका में Gender Justice और Institutional Accountability को मजबूती देता है।
उच्च न्यायालयों की जिम्मेदारी: अनुच्छेद 235 का पुनः स्मरण
उन्होंने Article 235 of the Constitution of India के तहत उच्च न्यायालयों की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि:
पदोन्नति, स्थानांतरण और अवकाश में पारदर्शिता व निष्पक्षता हो।
रजिस्ट्री स्तर पर शिकायतों का समयबद्ध निपटारा सुनिश्चित किया जाए।
किसी भी न्यायिक अधिकारी को “अकेला छोड़ा गया” महसूस न होने दिया जाए।
न्यायपालिका के लिए चेतावनी और दिशा दोनों।
विधिक विशेषज्ञों के अनुसार यह भाषण केवल एक औपचारिक संबोधन नहीं, बल्कि भारतीय न्यायपालिका के लिए नीतिगत दिशा (Policy Direction) और आंतरिक चेतावनी (Institutional Warning) दोनों है।
प्रमुख विधिक प्रभाव:
Judicial Ethics को लेकर सख्त रुख।
AI Regulation in Judiciary की आवश्यकता को बल
Accountability Mechanism को मजबूत करने का संकेत।
e-Courts Project और भविष्य के Supreme Court Rules पर संभावित प्रभाव।
“स्वतंत्र, निष्पक्ष और मानवीय न्याय ही अंतिम लक्ष्य”
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना का यह वक्तव्य स्पष्ट करता है कि:
न्यायपालिका को तकनीक के साथ आगे बढ़ना है, परंतु तकनीक के अधीन नहीं होना है
न्यायाधीशों को नैतिकता, साहस और संवैधानिक मूल्यों के साथ निर्णय लेना होगा
और सबसे महत्वपूर्ण, “न्याय केवल इंसान देगा, मशीन नहीं।”