

वैलेंटाइन-डे पर सारी दुनिया प्यार के रंग में सराबोर होती है। यह जाने बिना प्यार की बासंती बयार में बहते रहते हैं कि आखिर ‘प्यार’ क्या बला है?दरअसल, प्यार एक विलक्षण अनुभूति है। सारे संसार में इसकी खूबसूरती और मधुरता की मिसालें दी जाती हैं। इस सुकोमल भाव पर सदियों से बहुत कुछ लिखा, पढ़ा और सुना जाता रहा है! बावजूद इसके इसे समझने में भूल होती रही है। मनोवैज्ञानिकों ने इस मीठे अहसास की भी गंभीर विवेचना कर डाली! फिर भी मानव मन ने इस शब्द की आड़ में छला जाना जारी रखा है। अलग-अलग विद्वानों, लेखकों और विचारकों ने प्यार को अपने-अपने नजरिए से देखा और बयां किया है।
महान विचारक लेमेन्नाइस के अनुसार, जो सचमुच प्रेम करता है उस मनुष्य का हृदय धरती पर साक्षात स्वर्ग है। ईश्वर उस मनुष्य में बसता है, क्योंकि ईश्वर प्रेम है। दार्शनिक लूथर के विचार हैं कि प्रेम ईश्वर की प्रतिमा है और निष्प्राण प्रतिमा नहीं, बल्कि दैवीय प्रकृति का जीवंत सार है जिससे कल्याण के गुण छलकते रहते हैं। मनोवैज्ञानिक वेंकर्ट का मत है, प्यार में व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति की कामना करता है, जो एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में उसकी विशेषता को कबूल करे, स्वीकारे और समझे! उसकी यह इच्छा ही अक्सर पहले प्यार का कारण बनती है। जब ऐसा शख्स मिलता है तब उसका मन ऐसी भावनात्मक संपदा से समृद्ध हो जाता है, जिसका उसे पहले कभी अहसास भी नहीं हुआ था।
मनोवैज्ञानिक युंग कहते हैं कि प्रेम करने या किसी के प्रेम पात्र बनने से यदि किसी को अपनी कोई कमी से छुटकारा मिलता है, तो संभवत: यह अच्छी बात होगी! लेकिन, इसकी कोई गारंटी नहीं है कि ऐसा होगा ही! या इस तरह से उसे मुक्ति मिल ही जाएगी। मनोवैज्ञानिक हॉर्नी स्वस्थ प्रेम को संयुक्त रूप से जिम्मेदारियां वहन करने और साथ-साथ कार्य करने का अवसर बताते हैं। उनके अनुसार प्रेम में निष्कपटता और दिल की गहराई बहुत जरूरी है।मैस्लो ने स्वस्थ प्रेम के जिन लक्षणों की चर्चा की है, वे गंभीर और प्रभावी है। वे कहते हैं कि सच्चा प्यार करने वालों में ईमानदारी से पेश आने की प्रवृत्ति होती है। वे अपने को खुलकर प्रकट कर सकते हैं। वे बचाव, बहाना, छुपाना या ध्यानाकर्षण जैसे शब्दों से दूर रहते हैं। मैस्लो ने कहा है स्वस्थ प्रेम करने वाले एक-दूसरे की निजता स्वीकार करते हैं। आर्थिक या शैक्षणिक कमियों, शारीरिक या बाह्य कमियों की उन्हें चिन्ता नहीं होती जितनी व्यावहारिक गुणों की।
सुप्रसिद्ध लेखिका अमृता प्रीतम ने लिखा है ‘जिसके साथ होकर भी तुम अकेले रह सको, वही साथ करने योग्य है। जिसके साथ होकर भी तुम्हारा अकेलापन दूषित न हो। तुम्हारी तन्हाई, तुम्हारा एकान्त शुद्ध रहे। जो अकारण तुम्हारी तन्हाई में प्रवेश न करे। जो तुम्हारी सीमाओं का आदर करे। जो तुम्हारे एकांत पर आक्रामक न हो। तुम बुलाओ तो पास आए। इतना ही पास आए जितना तुम बुलाओ। जब तुम अपने भीतर उतर जाओ तो तुम्हें अकेला छोड़ दे। खलील जिब्रान ने प्रेम पर इतना खूबसूरत लिखा है कि जितना पढ़ो उतना कम ही लगता है। खलील हर बार एक नई व्याख्या और नए दर्शन के साथ प्रेम पर अभिव्यक्त होते हैं, जैसे प्रेम केवल खुद को ही देता है और खुद से ही पाता है। प्रेम किसी पर अधिकार नहीं जमाता, न किसी के अधिकार को स्वीकार करता है। प्रेम के लिए तो प्रेम का होना ही बहुत है।’
कभी ये मत सोचो कि तुम प्रेम को रास्ता दिखा रहे हो या दिखा सकते हो! क्योंकि, अगर तुम सच्चे हो तो प्रेम खुद तुम्हें रास्ता दिखाएगा। प्रेम के अलावा प्रेम की ओर कोई इच्छा नहीं होती पर अगर तुम प्रेम करो और तुमसे इच्छा किए बिना न रहा जाए, तो यही इच्छा करो कि तुम पिघल जाओ प्रेम के रस में और प्रेम के इस पवित्र झरने में बहने लगो! प्रेम के रस में डूबो तो ऐसे कि जब सुबह तुम जागो तो प्रेम का एक और दिन पा जाने का अहसान मानो। फिर रात में जब तुम सोने जाओ तो तुम्हारे दिल में अपने प्रियतम के लिए प्रार्थना हो और होठों पर उसकी खुशी के लिए गीत। ईसा मसीह ने कहा कि प्रेम सबसे करो, भरोसा कुछ पर करो और नफरत किसी से न करो, जबकि किसी अज्ञात प्रेम विशेषज्ञ की यह बात भी गौरतलब है कि पुरुषों का प्रेम आंखों से और महिलाओं का प्रेम कानों से शुरू होता है। अब्राहम लिंकन के लिए प्रेम की परिभाषा यह है कि किसी दुश्मन को पूरी तरह बर्बाद करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि उससे प्रेम करना शुरू कर दो।
प्रेम की महिमा बखान करते हुए सेंट ऑगस्टिन सलाह देते है कि प्यार से हमेशा कोसों दूर रहने से अच्छा है प्यार करके तबाह हो जाना। जबकि, प्रेम का दूसरा रूप बताते हुए मुंशी प्रेमचंद ने कहा था कि प्रेम सीधी-साधी गाय नहीं है, खूंखार शेर है, जो अपने शिकार पर किसी की आंख नहीं पड़ने देता। महात्मा गांधी भी प्रेम से अछूते नहीं रहे, उनका कहना है कि प्रेम से भरा हृदय अपने प्रेम पात्र की भूल पर दया करता है और खुद घायल हो जाने पर भी उससे प्यार करता है। अब यह आप पर तय करता है कि आप अपने लिए किस तरह के प्रेम को अनुकूल पाते हैं।