
नई दिल्ली। भारतीय माओवादी आंदोलन के सबसे प्रभावशाली और कुख्यात नेताओं में गिने जाने वाले मुप्पला लक्ष्मण राव उर्फ गणपति को लेकर बड़ी खबर सामने आई है। केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों के सूत्रों के मुताबिक गणपति को नेपाल से पकड़कर भारत लाया गया है और आने वाले दिनों में उसका औपचारिक समर्पण कराया जा सकता है।
हालांकि, इस पूरे मामले को लेकर अभी तक किसी भी केंद्रीय या राज्य एजेंसी की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। बस्तर रेंज के पुलिस महानिरीक्षक सुंदरराज पी ने कहा कि इस तरह की सूचनाएं जरूर सामने आई हैं, लेकिन फिलहाल अधिकृत स्तर पर इसकी पुष्टि नहीं हुई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आती, तब तक कुछ भी निश्चित रूप से कहना संभव नहीं है।
माओवादी आंदोलन का सबसे लंबा नेतृत्व करने वाला चेहरा
करीब सात दशकों तक भूमिगत जीवन जीने वाला गणपति भारतीय माओवादी आंदोलन का सबसे लंबे समय तक नेतृत्व करने वाला चेहरा रहा है। उसका जन्म आंध्रप्रदेश के कृष्णा जिले में हुआ था। छात्र जीवन के दौरान ही वह वामपंथी विचारधारा से प्रभावित हो गया और धीरे-धीरे उग्र वामपंथी आंदोलन में सक्रिय हो गया।
1970 के दशक में उसने आंध्रप्रदेश में सक्रिय नक्सली संगठन पीपुल्स वार ग्रुप (पीडब्ल्यूजी) से जुड़कर संगठनात्मक काम शुरू किया। अपनी रणनीतिक समझ, वैचारिक पकड़ और मजबूत नेटवर्क तैयार करने की क्षमता के कारण संगठन में उसका प्रभाव लगातार बढ़ता गया।
2004 में बना माओवादी संगठन का महासचिव
साल 2004 में पीपुल्स वार ग्रुप और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) के विलय से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का गठन हुआ। इस नए संगठन का महासचिव गणपति को बनाया गया।
करीब 14 वर्षों तक, यानी 2004 से 2018 तक, वह संगठन का सर्वोच्च नेता रहा और देशभर में माओवादी गतिविधियों की रणनीति तय करने में केंद्रीय भूमिका निभाता रहा। उसके नेतृत्व में माओवादी संगठन ने छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश और बिहार सहित कई राज्यों में अपने प्रभाव को फैलाने की कोशिश की। इसी दौरान तथाकथित ‘लाल गलियारा’ की अवधारणा को आगे बढ़ाया गया।
कई बड़े हमलों से जुड़ा रहा नाम
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार गणपति के नेतृत्व वाले दौर में देश में कई बड़े माओवादी हमले हुए, जिन्होंने आंतरिक सुरक्षा को गंभीर चुनौती दी। इनमें 2010 का दंतेवाड़ा हमला शामिल है, जिसमें सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हुए थे। इसके अलावा 2013 में बस्तर की झीरम घाटी में कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा पर हुए हमले में महेंद्र कर्मा, नंदकुमार पटेल और विद्याचरण शुक्ल सहित कई वरिष्ठ नेताओं की हत्या कर दी गई थी। सुरक्षा एजेंसियां लंबे समय तक इन हमलों की रणनीति के पीछे गणपति की भूमिका मानती रही हैं।
बीमारी और उम्र के कारण 2018 में छोड़ा पद
लगातार बढ़ते सुरक्षा अभियानों, कई शीर्ष माओवादी नेताओं की गिरफ्तारी या मुठभेड़ों में मौत और संगठन के भीतर बदलती परिस्थितियों के बीच गणपति पर दबाव बढ़ता गया। बढ़ती उम्र और बीमारी से जूझते हुए उसने 2018 में महासचिव पद छोड़ दिया। इसके बाद संगठन की कमान नंबाला केशव राव उर्फ बसवराज को सौंप दी गई। पद छोड़ने के बाद से गणपति सार्वजनिक रूप से लगभग गायब हो गया था।
2021 के बाद से लापता था गणपति
करीब 74 वर्षीय गणपति को लेकर पिछले कुछ वर्षों से सुरक्षा एजेंसियों के पास बहुत कम ठोस जानकारी थी। वर्ष 2021 के बाद से संगठन की गतिविधियों में उसकी सक्रिय भूमिका को लेकर भी कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिले। एजेंसियों को समय-समय पर यह संकेत मिलते रहे कि वह फिलीपींस, नेपाल या अन्य पड़ोसी क्षेत्रों में छिपा हुआ हो सकता है। बताया जाता है कि लंबे समय तक भूमिगत जीवन और बढ़ती उम्र के कारण वह गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से भी जूझ रहा था और अपनी पत्नी के साथ बेहद सीमित संपर्क में रह रहा था।
गिरफ्तारी की खबर से बढ़ी
नेपाल से पकड़े जाने और भारत लाए जाने की खबरों ने सुरक्षा एजेंसियों और माओवादी विरोधी अभियान से जुड़े हलकों में हलचल बढ़ा दी है। इस सूचना की आधिकारिक पुष्टि होती है, तो इसे भारतीय माओवादी आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाएगा। गणपति जैसे लंबे समय तक प्रभाव रखने वाले नेता का पकड़ में आना या समर्पण करना माओवादी नेटवर्क के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है।
