
हाल ही में हुई जाति जनगणना ने मौजूदा आरक्षण नीतियों की पर्याप्तता और निष्पक्षता पर चर्चा को और तेज कर दिया है। भारत में आरक्षण हमेशा से सामाजिक न्याय और अवसर की समानता के चौराहे पर खड़ा रहा है। हालांकि, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 राज्यों को ऐतिहासिक भेदभाव को दूर करने का अधिकार देते हैं। लेकिन, न्यायिक रूप से लगाई गई 50% की सीमा अक्सर अधिक समावेशिता की मांगों से टकराती रही है। 50% आरक्षण सीमा पर बहस पुनः शुरू हो गई तथा याचिकाएं और राजनीतिक मांगें अधिक कोटा और लाभों के उप-वर्गीकरण की मांग कर रही है। एक राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय से आग्रह किया है कि आरक्षण के लिए 50% की सीमा को लचीला माना जाए, जिसे ‘विशेष परिस्थितियों’ में नजरअंदाज करने की अनुमति दी जाए। साथ ही राज्य सेवाओं में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए कोटा 14% से बढ़ाकर 27% करने वाले कानून को मान्य करने की मांग की है। हाल के राजनीतिक बयान, जैसे कि बिहार में 85% आरक्षण की मांग तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए क्रीमी लेयर प्रावधानों की मांग करने वाली सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएं, समानता की संवैधानिक गारंटी के साथ सकारात्मक कार्रवाई को संतुलित करने की जटिलता को उजागर करती है।
संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 कानून के समक्ष समानता और सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर की गारंटी देते हैं। साथ ही राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों, अनुचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के लिए विशेष प्रावधान करने का अधिकार भी देते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने बालाजी बनाम मैसूर राज्य (1962) के अपने फैसले में कहा था कि आरक्षण ‘उचित सीमा के भीतर’ होना चाहिए। इसकी अधिकतम सीमा 50% होनी चाहिए। क्योंकि, इसे औपचारिक समानता बनाए रखने के रूप में देखा गया था। भारतीय संवैधानिक कानून के अंतर्गत सबसे चर्चित मामलों में से एक इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) था। इसे ‘मंडल मामला’ भी कहा जाता है। मंडल आयोग, जिसे आधिकारिक तौर पर दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग कहा जाता है, की स्थापना 1979 में बीपी मंडल के नेतृत्व में भारत में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (एसईबीसी) की पहचान के लिए की गई थी। आयोग ने 1980 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इसमें अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए मौजूदा 22.5% के अलावा, ओबीसी के लिए सरकारी नौकरियों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में 27% आरक्षण की सिफारिष की गई थी। इससे कुल आरक्षण 49.5% हो गया। सन 1990 में, प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने इन सिफारिशों को लागू करने की घोषणा की। न्यायालय ने मंडल आयोग की 27% ओबीसी आरक्षण की सिफारिश को बरकरार रखा।
महाराष्ट्र विधानसभा ने गायकवाड़ आयोग की सिफारिशों के आधार पर 2018 में एसईबीसी अधिनियम पारित किया। इसने मराठों को सार्वजनिक नौकरियों और शिक्षा में 16% आरक्षण दिया। बाद में, बॉम्बे उच्च न्यायालय ने कोटा घटाकर 13% रोजगार और 12% शिक्षा कर दिया। हालांकि, अपर्याप्त सहायक साक्ष्य के कारण, बॉम्बे उच्च न्यायालय ने पिछले अध्यादेश और एसईबीसी अधिनियम पर रोक लगा दी। अदालत ने 2018 अधिनियम के समर्थन में आयोग मात्रात्मक आंकड़ों को स्वीकार किया, जिसने कोटा प्रणाली को पुनर्जीवित किया। 50% कोटा से परे 2021 में, सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि आरक्षण के लिए मराठा आयोग्य थे। भारत में समाज के विभिन्न वर्गो, मुख्यतः अनुसूचित जातियों (एससी), अनुसूचित जनजातियों (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षण नीतियों को सक्षम, परिभाषित और विनियमित करने के लिए कई संवैधानिक संशोधन किए गए हैं। ये संशोधन अक्सर आरक्षण की न्यायिक व्याख्याओं को संबोधित करते हैं या मौजूदा प्रावधानों का विस्तार करते हैं।
सन् 1995 में, इंदिरा साहनी मामले (1992) में सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले की प्रतिक्रियास्वरूप 77वां संशोधन अधिनियम लाया गया। इसमें पदोन्नति में आरक्षण के विरूद्ध निर्णय दिया गया था। इसके तहत अनुच्छेद 16 (4ए) जोड़ा गया। इससे राज्य को अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए पदोन्नति में सीटें आरक्षित करने की अनुमति उस स्थिति में मिल गई, यदि सरकरी सेवाओं में उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है। सन 2000 में, 81वां संशोधन अधिनियम, रिक्त आरक्षित रिक्तियों को ‘आगे ले जाने के नियम’ के विरूद्ध सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के विरूद्ध लाया गया था। इसे 50% आरक्षण सीमा का उल्लंघन माना गया था। इसमें अनुच्छेद 16(4बी) जोड़ा गया, जो राज्य को पिछले वर्षों की रिक्त आरक्षित रिक्तियों को आगे ले जाने की अनुमति देता है। इन रिक्तियों को एक अलग वर्ग माना जाता है और इन्हें चालू वर्ष की 50% आरक्षण सीमा से छूट दी गई है।
सन 2001 में, 85वें संशोधन अधिनियम, 2001 द्वारा पदोन्नति में आरक्षण के प्रावधान को और अधिक सुरक्षित किया गया। इसने अनुच्छेद 16(4ए) में परिणामी वरिष्ठता सहित वाक्यांश जोड़ा गया। इससे यह सुनिश्चित हुआ कि आरक्षण के माध्यम से पदोन्नत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवार बाद में पदोन्नत सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों के मुकाबले अपनी वरिष्ठता नहीं खोएंगे। सन 2019 में, 103वें संशोधन अधिनियम ने आर्थिक स्थिति के आधार पर आरक्षण की एक नई श्रेणी शुरू की। इसने अनुच्छेद 15(6) और 16(6) को शामिल किया। इससे सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) के लिए 10% आरक्षण का प्रावधान हुआ। यह कोटा मौजूदा 50% आरक्षण के अतिरिक्त है और उन लोगों के लिए है जो पहले से एससी, एसटी या ओबीसी आरक्षण के दायरे में नहीं आते हैं।
पंजाब राज्य बनाम दविंदर सिंह (2024) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी सात न्यायाधीशों की पीठ के माध्यम से अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए क्रीमी लेयर सिद्धांत लागू करने की आवश्यकता पर बल दिया है। यह निर्णय रोहिणी आयोग के दृष्टिकोण पर आधारित था, जिसका गठन 2017 में जातियों या समुदायों के बीच आरक्षण के लाभों के असमान वितरण की जांच के लिए किया गया था। आयोग ने पाया कि ओबीसी आरक्षण के 97% लाभ लगभग 25% जातियों के पास थे, जबकि लगभग एक हजार ओबीसी समुदायों को कोई प्रतिनिधित्व नहीं मिला। अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के भीतर भी इसी तरह की चिंताएं मौजूद हैं, जिससे उप-वर्गीकरण की मांग उठ रही है। आज आरक्षण न्याय से कम और वोट बैंक से ज्यादा जुड़ा है। भारत में आरक्षण प्रणाली ने सामाजिक न्याय और समावेशिता को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
हालांकि, उभरती चुनौतियों का समाधान करने और यह सुनिश्चित करने के लिए कि लाभ उन लोगों तक पहुंचे जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है, निरंतर मूल्यांकन और अनुकूलन आवश्यक है। आरक्षण को 50% की सीमा से आगे बढ़ाने को योग्यता और संवैधानिक समानता के साथ समझौता माना जा सकता है, फिर भी अनुभवजन्य आंकड़े हाशिए पर पड़े समुदायों के निरंतर कम प्रतिनिधित्व को उजागर करते हैं। जैसे-जैसे भारत निरंतर विकसित हो रहा है, वैसे-वैसे एक सच्चे समतामूलक समाज के निर्माण के लिए इसकी नीतियों और प्रथाओं को भी विकसित होना होगा। वर्तमान जाति जनगणना के आंकड़े इन भविष्य की नीतियों को निर्देशित करने में महत्वपूर्ण होंगे, यह सुनिश्चित करते हुए कि वे सूचित, समतामूलक और प्रभावी हों।
