
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक हेमंत पाल की टिप्पणी
मध्यप्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह का राज्यसभा सीट छोड़ने की घोषणा मध्यप्रदेश में कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण मोड़ है। उनका कार्यकाल अप्रैल 2026 में समाप्त हो रहा है। लेकिन, उन्होंने उससे पहले ही एलान कर दिया कि वे तीसरी बार उच्च सदन में नहीं जाएंगे। दिग्विजय सिंह ने इसे पूरी तरह अपना व्यक्तिगत निर्णय बताया। लेकिन, समझा जा रहा है कि इसे महज व्यक्तिगत फैसले से कहीं आगे की रणनीति है। इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि कांग्रेस में दिग्विजय सिंह की लंबी राजनीतिक पारी रही है। वे दो बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं और राज्यसभा के दो कार्यकाल पूरे कर चुके। तीसरे कार्यकाल को लेकर उनका बयान एक सोची-समझी रणनीति के रूप में देखने को मजबूर करता है। समझा जा रहा कि क्या वास्तव में यह जमीनी राजनीति में वापसी की तैयारी है या केंद्रीय नेतृत्व से दूरी बनाने का संदेश!
दिग्विजय सिंह की मंशा को समझने के लिए उनके बयान को ही आधार बनाएं तो बात ज्यादा स्पष्ट होती है। उन्होंने कहा कि वे भविष्य में प्रदेश कांग्रेस को मजबूत करने पर फोकस करेंगे। यह संकेत देता है कि वे राज्यसभा के बजाए प्रदेश स्तर की जमीनी राजनीति में सक्रिय होंगे। मध्य प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति कमजोर है, इससे इंकार नहीं। 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 163 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस को महज 66 सीटें ही मिलीं। दिग्विजय सिंह का संगठन में प्रभाव हमेशा रहा है। उनकी मंशा शायद 2028 के विधानसभा चुनावों की तैयारी होगी। राज्यसभा में रहते हुए वे राष्ट्रीय मुद्दों जैसे संवैधानिक प्रक्रियाओं और जनसहमति पर बोलते रहे, लेकिन प्रदेश में उनकी सक्रियता कम थी।
उनके ताजा फैसले से यह भी समझा जा रहा कि वे संगठन को मजबूत कर कमलनाथ या उमंग सिंघार जैसे नेताओं के साथ तालमेल बैठा सकते हैं। राज्यसभा में न जाने का उनका यह फैसला कांग्रेस में ‘परिवर्तन’ का संदेश भी देता है, जहां वरिष्ठ नेता पीछे हटकर युवाओं को जगह देते हैं। 78 साल के दिग्विजय सिंह का यह कदम पार्टी में ‘सेवानिवृत्ति जैसा’ दिखता है, लेकिन वास्तव में यह ‘मेंटर भूमिका’ ग्रहण करने की रणनीति भी हो सकती है। कुल मिलाकर उनकी मंशा संगठन पुनरुद्धार और व्यक्तिगत छवि को ‘त्यागमयी नेता’ के रूप में चमकाने की ज्यादा लगती है।
दिग्विजय सिंह ने कार्यकाल पूरा होने का इंतजार करने के बजाए जो बयान दिया, वो उनका रणनीतिक धैर्य है या मजबूरी, फ़िलहाल यह नहीं कहा जा सकता। उन्हें यदि राजयसभा की सीट छोड़नी ही थी, तो कार्यकाल समाप्ति से पहले ऐसा कोई इशारा क्यों नहीं किया? अप्रैल तक इंतजार करने का कारण क्या रणनीतिक है। अचानक इस्तीफा देते तो शायद पार्टी में विवाद बढ़ता और कांग्रेस पर ‘टिकट वितरण’ का आरोप लगता। संभवतः यह भी एक कारण है कि उन्होंने इंतजार के बजाए ‘स्वैच्छिक निर्णय’ का नैरेटिव बनाया, जो उनकी छवि को मजबूत भी बनाता है।
इसके अलावा, मध्य प्रदेश में आगामी लोकसभा उपचुनाव या स्थानीय निकाय चुनावों में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। जल्दी पद छोड़ते तो संगठन में शून्यता आ जाती। इंतजार ने नए दावेदारों को को इस बहाने समय भी दिया, लेकिन इससे पार्टी में नई चर्चा छिड़ गई। उनकी यह रणनीति भाजपा को दिग्विजय को ‘राज्यसभा टिकट न देने’ का आरोप लगाने का मौका भी देती है। फ़िलहाल यही कहा जा सकता है कि इंतजार धैर्यपूर्ण रणनीति है, जो व्यक्तिगत हानि कम करता है और राजनीतिक लाभ अधिक देता है। कांग्रेस हाईकमान मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की रणनीति युवा चेहरों को बढ़ावा देना है। ऐसे में दिग्विजय सिंह की 78 साल की उम्र भी आड़े आती है।
2024 लोकसभा चुनावों के बाद पार्टी ने राज्यसभा में पुराने नेताओं को टिकट भी कम दिए। इसे देखते हुए दिग्विजय सिंह को तीसरे कार्यकाल के लिए चुना जाना एक तरह से मुश्किल भी था। क्योंकि, मध्य प्रदेश से कांग्रेस के पास सीमित एमएलए हैं। दिग्विजय सिंह इसे भांप भी चुके होंगे। 2022 में भी उनके नाम पर विवाद हुआ था। शायद उनका यह फैसला ‘माहौल बनाने’ की रणनीति भी हो सकता है। यह भी अनुमान है कि वे खुद को ‘पीड़ित’ दिखाकर केंद्रीय नेतृत्व पर दबाव डाल रहे हैं। यदि पार्टी फिर टिकट देती है, तो वे इसे नकार तो नहीं सकते हैं। न दे तो ‘मैंने खुद छोड़ा’ कहकर सम्मान भी बच जाएगा। भाजपा इसे ‘कांग्रेस में घुटन’ का प्रचार करेगी, लेकिन दिग्विजय प्रदेश नेतृत्व को मजबूत कर राहुल गांधी को संदेश दे सकते हैं कि ‘मैं अभी रिटायर नहीं हुआ’।
इसे उनका ‘सॉफ्ट विद्रोह’ जैसा भी माना जा सकता है, जो संगठन में उनकी प्रासंगिकता बनाए रखेगा। दिग्विजय सिंह की मंशा संगठन को मजबूती, छवि निर्माण और केंद्रीय नेतृत्व को संदेश देने की ज्यादा लगती है। उनका तीसरे कार्यकाल का इंतजार रणनीतिक है। शायद वे वे हाईकमान की मंशा भांप चुके हैं। यह फैसला कांग्रेस के लिए बदलाव का संकेत भी समझा जा सकता है। जो भी हो, लेकिन दिग्विजय सिंह का राज्यसभा के तीसरे कार्यकाल से विरक्ति की यह राजनीतिक मंशा उन्हें चर्चा में तो बरकरार रखेगी ही।
