
विशेष संपादकीय विश्लेषण : विक्रम सेन
नई दिल्ली। विश्व राजनीति में “मित्रता” और “हित” शायद ही कभी एक रेखा पर चलते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की दिखाई देने वाली गर्मजोशी भले ही विश्व मंच पर “राजनयिक मित्रता” का प्रतीक बनी हो, किंतु इसके पीछे छिपी कूटनीतिक गणनाएँ, आर्थिक दबाव और सामरिक स्वार्थ की गहरी परतें आज फिर उजागर हो रही हैं।
ट्रंप का हालिया बयान — जिसमें उन्होंने दावा किया कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच संभावित परमाणु युद्ध को रोका — एक बार फिर उस “ट्रंप–शैली की कूटनीति” को सामने लाता है जो अक्सर भ्रम फैलाकर शक्ति-संतुलन में मनोवैज्ञानिक बढ़त लेने का प्रयास करती है।
भारत सरकार ने इस बयान को “तथ्यहीन और कपटपूर्ण” बताते हुए खारिज किया, जिससे स्पष्ट होता है कि नई दिल्ली अब अमेरिकी दबाव की भाषा में नहीं, अपने राष्ट्रीय हितों की भाषा में बात कर रही है।
ASEAN समिट और मोदी का वर्चुअल निर्णय, ‘संकेत या रणनीति?’
प्रधानमंत्री मोदी का ASEAN-इंडिया समिट में वर्चुअली शामिल होना, जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप मलेशिया जा रहे हैं, अपने आप में एक कूटनीतिक संदेश है।
2014 के बाद से मोदी लगभग हर वर्ष एशियाई मंचों पर सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं।
ऐसे में इस बार कुआलालंपुर न जाकर वर्चुअल उपस्थिति यह दर्शाती है कि भारत अब अमेरिका या किसी अन्य राष्ट्र की प्राथमिकताओं के अनुसार नहीं, बल्कि अपने बहुपक्षीय हितों के अनुरूप चल रहा है।
मोदी–ट्रंप की दिवाली के अवसर पर हुई बातचीत के बाद अचानक इस निर्णय का आना यह संकेत देता है कि भारत अपने संवाद का स्वरूप स्वयं तय करेगा।
जहाँ ट्रंप ने रूस से तेल आयात घटाने का दावा किया, वहीं भारत ने दृढ़ता से कहा कि ऊर्जा नीति “राष्ट्रीय हितों और उपभोक्ताओं के कल्याण” के अनुरूप तय की जाएगी — यही आत्मनिर्भर भारत की वास्तविक पहचान है।
उधर विपक्षी पार्टी कांग्रेस के कम्युनिकेशन चीफ जयराम रमेश ने x पर कहा, “प्रेसिडेंट ट्रंप की तारीफ में मैसेज पोस्ट करना एक बात है, लेकिन उस आदमी के साथ फिजिकली दिखना बहुत रिस्की है जिसने 53 बार दावा किया है कि उसने ऑपरेशन सिंदूर रोक दिया है और भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद करने का वादा किया है।”
व्यापारिक समीकरण : दोस्ती के आवरण में दबाव की राजनीति
ट्रंप शासनकाल में भारत पर लगाया गया 50% टैरिफ, GSP सूची से हटाया जाना, और फार्मास्यूटिकल निर्यात पर प्रतिबंध, यह सब “मित्रता” के पीछे की कठोर सच्चाई को उजागर करते हैं।
भारत-अमेरिका व्यापार वार्ताएँ लगातार ठहरी रहीं, जबकि ट्रंप प्रशासन ने भारत के आत्मनिर्भर रुख को “ट्रेड बैरियर” बताकर आलोचना की।
ट्रंप की राजनीति हमेशा आर्थिक हितों की परिधि में घूमती रही है — चाहे वह ईरान पर प्रतिबंध हो, रूस से तेल आयात का मुद्दा हो या एशियाई बाजारों पर अमेरिकी वर्चस्व का प्रश्न।
भारत का स्वतंत्र नीति-निर्णय अमेरिका के लिए चुनौती बन गया है, और यही कारण है कि ट्रंप के बयान अब अधिक भावनात्मक नहीं, बल्कि रणनीतिक दबाव का उपकरण बन गए हैं।
रूस–चीन–अमेरिका त्रिकोण में भारत की निर्णायक भूमिका
आज की वैश्विक व्यवस्था में भारत एक “संतुलन शक्ति” (Balancing Power) के रूप में उभरा है।
रूस–यूक्रेन युद्ध के बाद जब ऊर्जा आपूर्ति संकट गहराया, भारत ने अमेरिकी असहमति के बावजूद रूस से तेल आयात जारी रखा।
यह कदम केवल आर्थिक नहीं, बल्कि कूटनीतिक आत्मविश्वास का प्रतीक था।
अमेरिका चाहता है कि भारत उसकी एशिया नीति का सहयोगी बने, पर भारत यह स्पष्ट कर चुका है कि वह किसी भी धुरी का हिस्सा नहीं बनेगा — न अमेरिका-प्रमुख पश्चिमी गुट का, न रूस-चीन धुरी का।
भारत की यही “रणनीतिक स्वायत्तता” (Strategic Autonomy) आज विश्व मंच पर उसकी सबसे बड़ी पूँजी है।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य : जब मित्रता बनी चुनौती
अमेरिका–भारत संबंधों का इतिहास बताता है कि “मित्रता” अक्सर परस्पर लाभ के नाम पर एकतरफा दबाव में बदलती रही है।
1971: निक्सन प्रशासन ने बांग्लादेश युद्ध के दौरान पाकिस्तान का समर्थन किया।
1998: परमाणु परीक्षणों के बाद क्लिंटन प्रशासन ने भारत पर कठोर आर्थिक प्रतिबंध लगाए।
2005: बुश प्रशासन ने असैन्य परमाणु समझौते से भारत को रणनीतिक साझेदारी में बाँधा।
2019: ट्रंप शासन ने “अमेरिका फर्स्ट” के नाम पर भारत की व्यापारिक स्वायत्तता को चुनौती दी।
इतिहास यही सिखाता है — “अमेरिकी मित्रता तब तक रहती है जब तक अमेरिकी हित सुरक्षित रहते हैं।”
भारत की नीति : मुस्कान नहीं, आत्मनिर्भरता की शक्ति
भारत को अब यह तय करना है कि वह वैश्विक मंच पर “भावनात्मक कूटनीति” से आगे बढ़कर “हित आधारित नीति” को प्राथमिकता देगा।
मोदी सरकार की रणनीति अब इस समझ पर आधारित प्रतीत होती है कि —
“मित्रता तब सार्थक है, जब वह समानता पर आधारित हो।”
ट्रंप जैसे नेता मित्रता को राजनीतिक पूँजी और चुनावी हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं।
भारत को अपने हितों की रक्षा उसी शांति, विवेक और दृढ़ता के साथ करनी होगी, जो उसकी सभ्यता की पहचान है।
साझेदारी नहीं, स्वतंत्र पहचान
भारत-अमेरिका संबंध न तो केवल “मित्रता” हैं, न शत्रुता बल्कि यह हितों का समीकरण है, जो समय-समय पर बदलता रहेगा।
भले ही दोनों के राजनीतिक रिश्ते ठंडे पड़ गए हों, भारत और US के बीच आपसी सिस्टम नॉर्मल तरीके से काम करते रहे हैं। दोनों सेनाओं ने हाल ही में अलास्का में जॉइंट एक्सरसाइज की, जबकि ट्रेड बातचीत जारी रही और दोनों देशों की बातचीत करने वाली टीमें एक-दूसरे के यहां आती-जाती रहीं हैं।
बहरहाल मोदी का ASEAN में वर्चुअल भाग लेना और ट्रंप के विवादित बयान — दोनों ही संकेत हैं कि भारत अब किसी भी शक्ति के इशारों पर नहीं, अपनी नीति की स्वतंत्र रेखा पर चलने के लिए तैयार है।
कूटनीति की सच्चाई भी यही है, “जहाँ समानता समाप्त होती है, वहीं मित्रता निर्भरता बन जाती है।”