
सर्वोच्च न्यायालय ने एसआईआर के विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया में पहचान के लिए आधार कार्ड के उपयोग का विरोध करने वाले एक याचिकाकर्ता से कहा कि जब तक जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 आधार को मान्य दस्तावेज के रूप में स्वीकार करता है, तब तक अदालत को भी इसे मानना होगा। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल पांचोली की खंडपीठ पश्चिम बंगाल में एसआईआर से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता को फर्जी आधार कार्ड के व्यापक उपयोग की चिंता है, तो उसे बार-बार अदालत में मुद्दा उठाने के बजाए केंद्र सरकार से कानून में संषोधन कराने के लिए संपर्क करना चाहिए। अभिभाषक अश्विनी उपाध्याय ने दावा किया कि देश में बड़ी संख्या में फर्जी आधार कार्ड बने हुए हैं। खासकर सीमा क्षेत्रों में। कई मामलों में पकड़े गए बांग्लादेशी या रोहिंग्या व्यक्तियों के पास बंगाल से जारी आधार पाए गए हैं। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह गंभीर मुद्दा हो सकता है और गहन जांच की आवष्यकता हो सकती है, लेकिन फिलहाल इस पर टिप्पणी करने का उचित समय नहीं है।
न्यायालय ने कहा कि यदि बड़े पैमाने पर फर्जी आधार कार्ड बनाए जा रहे हैं, तो यह विधायी स्तर पर नियंत्रित किया जाना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि याचिकाकर्ता केंद्र सरकार को अभ्यावेदन देकर जनप्रतिनिधित्व कानून, 1950 में संषोधन की मांग करें। जब जन प्रतिनिधित्व कानून, 1950 में संशोधन करके आधार को पहचान के प्रमाण के रूप में शामिल किया गया है, तो अदालत को उसे स्वीकार करना ही होगा। साथ ही यह स्पष्ट किया कि आधार केवल पहचान का दस्तावेज है। यह नागरिकता का प्रमाण नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले वर्ष सितंबर में चुनाव आयोग द्वारा एसआईआर प्रक्रिया के लिए निर्धारित 11 दस्तावेजों के अतिरिक्त आधार कार्ड को भी सत्यापन दस्तावेज के रूप में स्वीकार करने की अनुमति दी थी। यह आदेश जन प्रतिनिधित्व कानून, 1950 की धारा 23(4) के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए दिया गया था। इसमें आधार को पहचान स्थापित करने के लिए मान्य दस्तावेज माना गया है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कानून में जब तक आधार कार्ड मान्य पहचान दस्तावेज है, तब तक अदालत उसे खारिज नहीं कर सकती। फर्जी आधार की समस्या का समाधान न्यायालय नहीं बल्कि विधायी स्तर पर किया जाना चाहिए।
जन प्रतिनिधित्व कानून, 1951 एक महत्वपूर्ण कानून है। यह भारत के चुनावी परिदृश्य को आकार देता है। जन प्रतिनिधित्व कानून, 1951 को लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में सीटों के आवंटन, मतदाताओं की योग्यता और मतदाता सूची की तैयारी के लिए अधिनियमित किया गया था। यह अधिनियम यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक था कि चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से आयोजित किए जाए और लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों का सम्मान किया जाए। जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 कई कारणों से समकालीन भारत में अत्यधिक प्रासंगिक बना हुआ है। इनमें महत्वपूर्ण है सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार। अधिनियम सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के सिद्धांत को कायम रखता है। यह सुनिश्चित करता है कि 18 वर्ष से अधिक आयु के प्रत्येक नागरिक को वोट देने का अधिकार है। यह लोकतंत्र के लिये महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह प्रत्येक नागरिक को सरकार में भागीदारी देने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
साथ ही यह चुनावी अपराधों के लिए भी महत्वपूर्ण है। अधिनियम विभिन्न चुनावी अपराधों, जैसे रिश्वतखोरी, प्रतिरूपण और अनुचित प्रभाव को निर्दिष्ट करता है और उनके लिये दंड निर्धारित करता है। चुनाव की शुचिता बनाए रखने के लिये भी यह महत्वपूर्ण है। यह अधिनियम जन प्रतिनिधित्व कानून, 1951 चुनाव लड़ने के लिए अयोग्यता को भी सूचीबद्ध करता है। इसमें आपराधिक दोषसिद्ध और भ्रष्ट आचरण शामिल हैं। यह सुनिश्चित करता है कि संदिग्ध पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति सार्वजनिक पद पर न रहें। उभरती चुनौतियों का समाधान करने और चुनावी प्रक्रिया को मजबूत करने के लिये जन प्रतिनिधित्व कानून में पिछले कुछ वर्षों में कई संशोधन हुए हैं। उदाहरण के लिये, 2013 में ‘नोटा’ (उपरोक्त में से कोई नहीं) की शुरुआत एक महत्वपूर्ण थी। इसमें मतदाताओं को उपलब्ध उम्मीदवारों के प्रति अपना असंतोष व्यक्त करने की अनुमति मिली।
बदलती परिस्थितियों और चुनौतियों के अनुरूप जन प्रतिनिधित्व कानून में अन्य संशोधन भी हुए हैं। कुछ प्रमुख संशोधनों में शामिल पेपर लेस इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन (वोटर वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल) यह ईवीएम से जुड़ी एक स्वतंत्र प्रणाली है। यह मतदाताओं को यह सत्यापित करने में मदद करती है कि उनका वोट उनके इच्छित उद्देश्य के अनुसार सही दर्ज हुआ है। इसे 2013 में पेश किया गया था। जब उच्चतम न्यायालय ने पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले (2013) के अपने फैसले में चुनाव आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की आवश्यकता की अनुमति दी थी। इसके अलावा यह भी प्रावधान किया गया है कि राजनीतिक दलों के लिये दो हजार रुपए से अधिक प्राप्त दान की सूची चुनाव आयोग को सौंपना अनिवार्य है। राजनीतिक दल दो हजार रुपए से ज्यादा नकद चंदा नहीं ले सकते हैं। सूचना का अधिकार भी महत्वपूर्ण है। उम्मीदवारों को यह जानकारी देनी होगी कि क्या वह किसी लंबित मामले में दो साल या उससे अधिक कैद की सजा से दंडनीय किसी अपराध का आरोपी है या किसी अपराध के लिये दोषी ठहराया गया है। यह भी महत्वपूर्ण है कि उच्चतम न्यायालय ने जन प्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 8(4) को रद्द कर दिया और इसे अवैधानिक घोषित कर दिया। यह भी माना कि अयोग्यता दोषसिद्धी की तारीख होती है। धारा 8(4) दोषी सांसदों, विधायकों और एमएलसी को अपने पद पर बने रहने की अनुमति देती है। शर्त यह है कि वे ट्रायल कोर्ट द्वारा फैसले की तारीख के तीन महीने के अंदर अपनी दोषसिद्धी/सजा के खिलाफ उच्च अदालतों में अपील दायर कर दें।
जन प्रतिनिधित्व कानून ने अपने प्रावधानों और संशोधनों के साथ, भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ‘नोटा’ की शुरुआत ने मतदाताओं को उम्मीदवारों के प्रति अपनी अस्वीकृति व्यक्त करने का अधिकार दिया है। इससे राजनीति में अवांछित तत्वों का प्रभाव कम हो गया है। साथ ही राजनीति के अपराधीकरण पर रोक भ्रष्ट आचरण के दोषी व्यक्तियों की अयोग्यता ने संदिग्ध पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को चुनाव में भाग लेने से रोक दिया है। यह भारतीय चुनाव आयोग को जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के सिद्धांतों को लगातार बनाए रखने में मदद करता है। यह पारदर्शिता बनाए रखता है। इसके अलावा, यह अधिनियम उभरती चुनौतियों, जैसे एग्जिट पोल के प्रभाव और पारदर्शी राजनीतिक फंडिंग की आवश्यकता, को संबोधित करने के लिये पिछले कुछ वर्षों में विकसित हुआ है। चुनाव के अंतिम चरण तक एग्जिट पोल पर प्रतिबंध का उद्देश्य मतदाताओं के निर्णयों को समय से पहले प्रभावित होने से रोकना है।
जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 भारत के लोकतांत्रिक ढांचे की आधारशिला बना हुआ है। यह बदलती परिस्थितियों और चुनौतियों के अनुरूप वर्षों में विकसित हुआ है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि चुनावी प्रक्रिया स्वतंत्र और निष्पक्ष बनी रहे। अधिनियम के प्रावधान और संशोधन भारतीय चुनावों में पारदर्शिता, जवाबदेही और नैतिक आचरण को बढ़ावा देने में सहायक रहे हैं। इससे यह एक जीवंत लोकतंत्र के कामकाज के लिये एक महत्त्वपूर्ण कानून बन गया है। अतः चुनावी प्रक्रिया में कोई भी फेरबदल जैसे पहचान के उपयोग किये जाने वाले दस्तावेजों में कई नए दस्तावेज का उपयोग करने जैसे बदलाव को कानूनी वैधता प्रदान करने के लिए उक्त जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में संशोधन करना आवश्यक है।
