
बठिंडा (पंजाब)। वैश्विक मंच पर हिंदी और देवनागरी लिपि की स्वीकार्यता निरंतर बढ़ रही है। आज विश्व के सभी महाद्वीपों के 140 से अधिक राष्ट्रों में हिंदी बोली समझी, लिखी और पढ़ी जा रही है। वह संपर्क भाषा के रूप में भी प्रतिष्ठा प्राप्त कर रही है। आज विश्व में हिंदी प्रयोक्ताओं संख्या लगभग 100 करोड़ से अधिक हो गई, जो संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषाओं से बहुत ज्यादा है।
ये उद्गार रीवा एवं शहडोल संभाग के पूर्व कमिश्नर डॉ अशोक कुमार भार्गव ने भारतीय नागरी लिपि परिषद नई दिल्ली और पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वाधान में बठिंडा में आयोजित अंतरराष्ट्रीय हिंदी नागरी सम्मेलन के अवसर पर ‘राष्ट्रीय एकता में नागरी लिपि की भूमिका’ विषय के द्वितीय सत्र के अध्यक्षीय उद्बोधन में व्यक्त किए। संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि मेरी मौलिक अवधारणा है कि कभी कहा जाता था कि ब्रिटिश साम्राज्य में कभी सूर्यास्त नहीं होता। यद्यपि अब ब्रिटेन का यह परिदृश्य भी बदल गया। किंतु आज सुखद स्थिति यह है कि हिंदी प्रेमियों और देवनागरी में लिखने वालों के संसार में भी कभी सूर्यास्त नहीं होता।
डॉ भार्गव ने कहा कि राष्ट्र की एकता अखंडता और भावनात्मक रिश्तों की बुनियाद को सुदृढ़ बनाने में देवनागरी लिपि की अहम भूमिका रही है। हमारा समग्र सांस्कृतिक चिंतन, वेद, पुराण, उपनिषद, रामायण, महाभारत, भगवद गीता और भारतीय दर्शन आदि देवनागरी लिपि में ही लिपिबद्ध किए गए हैं।
राष्ट्रीय एकता के लिए देवनागरी को राष्ट्रीय लिपि के तौर पर मान्यता मिलना चाहिए।

इसमें वे सभी गुण है जो हमारी भारतीय भाषाओं को जोड़ने वाली एक मजबूत कड़ी का काम कर सकती है। इससे विभिन्न भाषाओं के मध्य अपरिचय, अविश्वास की दूरी मिटेगी। एक दूसरे के साहित्य संसार को समझ सकेंगे, ज्ञान की श्री वृद्धि होगी,चिंतन का फलक उदार होगा , शोध का स्वरूप अखिल भारतीय होने से व्यापार, व्यवसाय, वाणिज्य, पर्यटन तथा रोजगार को अखिल भारतीय बाजार मिलेगा।
इस अवसर पर डॉ भार्गव ने देवनागरी लिपि की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए विस्तार से बताया कि देवनागरी लिपि विश्व की सबसे वैज्ञानिक और सर्वोत्तम लिपि है इसके उच्चारण और लेखन में पूर्णतः साम्य है अर्थात जैसा लिखा जाता है वैसा ही पढ़ा जाता है और जैसा पढ़ा जाता है वैसा ही लिखा जाता है। इसमें कोई मूक वर्ण नहीं है। इसलिए किसी प्रकार की भ्रम की स्थिति नहीं होती जैसा कि रोमन लिपि में होता है। देवनागरी लिपि सीखने में सहज, सरल, नमनीय और बहुत सुंदर है। यह अपेक्षाकृत स्थान भी कम घेरती है।
देवनागरी लिपि अपनी अनंत विशेषताओं के कारण विश्व नागरी बनने की सामर्थ्य भी रखती है। उन्होंने कहा कि देवनागरी को राष्ट्रीय लिपि मान्य करने का अर्थ यह नहीं है कि अन्य भाषाओं या लिपियों का सम्मान कम होगा वरन उनकी महत्ता बिल्कुल कम नहीं होगी। देश में सद्भाव, मैत्री, बंधुता निर्मित होगी, भाषायी संकीर्णता, अलगाववाद और पृथकतावाद के विषाणु नष्ट होंगे। लिपिहीन भाषाओं तथा विलुप्तप्राय भाषाओं के लिए भी मार्ग प्रशस्त होगा।
इस अवसर पर नागरी लिपि परिषद नई दिल्ली के अध्यक्ष डॉ प्रेमशंकर पतंजलि, महामंत्री डॉ हरिसिंह पाल, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति आचार्य किरण हजारीका एवं देश भर के शोधार्थी, शिक्षक, प्राध्यापक, साहित्यकार और विद्वानों सहित नीदरलैंड, अमेरिका, सूरीनाम, मॉरीशस, न्यूजीलैंड सहित अन्य देशों के अनेक प्रतिभागी भी सम्मिलित थे।