
विक्रम सेन
काराकास/नई दिल्ली : अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को सैन्य अभियान ‘ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व’ के तहत गिरफ्तार किए जाने के बाद यह दक्षिण अमेरिकी देश एक बार फिर वैश्विक सुर्खियों में है।
3 जनवरी को हुई इस कार्रवाई में अमेरिकी सेना ने हवाई हमलों और जमीनी अभियान के जरिए मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोर्स को हिरासत में लिया, जिसके बाद उन्हें न्यूयॉर्क ले जाया गया जहां वे नशीले पदार्थों और हथियारों से जुड़े आरोपों का सामना करेंगे।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस अभियान को सफल बताते हुए कहा कि अमेरिका वेनेजुएला को तब तक संचालित करेगा जब तक एक सुरक्षित और निष्पक्ष सत्ता हस्तांतरण नहीं हो जाता।
इस घटना ने राजनीतिक उथल-पुथल को बढ़ावा दिया है, साथ ही वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था और उसकी मुद्रा बोलिवर पर वैश्विक ध्यान केंद्रित हो गया है। दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल भंडार वाले इस देश की मुद्रा की कमजोरी का रहस्य अब भी कई सवाल खड़े करता है, खासकर जब भारत जैसे देशों से इसकी तुलना की जाए।
भारत-वेनेजुएला संबंध: ऊर्जा सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका
भारत और वेनेजुएला के बीच लंबे समय से मजबूत राजनयिक और आर्थिक संबंध रहे हैं। दोनों देश एक-दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करते हैं और ऊर्जा क्षेत्र में वेनेजुएला भारत का प्रमुख साझेदार रहा है। 2024 में भारत ने वेनेजुएला से लगभग 22 मिलियन बैरल कच्चा तेल आयात किया था, जो भारत की ऊर्जा सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदान देता है। वेनेजुएला की राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक संकट का असर वैश्विक बाजार पर पड़ता है, जिसमें भारत जैसे आयातक देश भी प्रभावित होते हैं। अमेरिकी प्रतिबंधों और अब इस सैन्य कार्रवाई के बाद तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव की आशंका बढ़ गई है।
वेनेजुएला की मुद्रा बोलिवर की कमजोरी के कारण
वेनेजुएला की आधिकारिक मुद्रा बोलिवर (VES) पिछले एक दशक में दुनिया की सबसे तेजी से गिरने वाली मुद्राओं में से एक रही है। अत्यधिक महंगाई (हाइपरइन्फ्लेशन), आर्थिक कुप्रबंधन और राजनीतिक अस्थिरता ने इसकी कीमत को लगभग शून्य कर दिया है। 2017 में देश ने आधिकारिक रूप से डिफॉल्ट (दिवालियापन) स्वीकार किया, जिससे विदेशी निवेशकों का विश्वास टूट गया। अमेरिका और पश्चिमी देशों के आर्थिक प्रतिबंधों ने स्थिति को और बिगाड़ा। तेल उत्पादन में गिरावट और सरकारी तेल कंपनी PDVSA की कमजोर हालत ने अर्थव्यवस्था को संभालने का कोई मौका नहीं दिया। हाल की घटनाओं के बाद बोलिवर की स्थिति और अस्थिर हो सकती है।
आम नागरिकों पर प्रभाव
बोलिवर की कमजोरी का सबसे ज्यादा असर वेनेजुएला के आम नागरिकों पर पड़ा है। रोजमर्रा की जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में नकद की जरूरत पड़ती है, और दुकानों में कीमतें दिन में कई बार बदलती हैं। इसी कारण लोग अमेरिकी डॉलर जैसी विदेशी मुद्राओं पर निर्भर हो गए हैं। राजनीतिक संकट ने गरीबी, भुखमरी और पलायन को बढ़ावा दिया है, और अब मादुरो की गिरफ्तारी के बाद अनिश्चितता और बढ़ गई है।
भारत और वेनेजुएला की मुद्राओं की तुलना: 10,000 रुपये कितने बोलिवर?
मुद्रा मूल्यों की तुलना करें तो 1 भारतीय रुपया (INR) लगभग 3.38 वेनेजुएला बोलिवर (VES) के बराबर है।
इस हिसाब से 10,000 भारतीय रुपये वेनेजुएला में करीब 33,800 बोलिवर के बराबर होंगे। हालांकि, यह दर बाजार की स्थिति और राजनीतिक घटनाओं के अनुसार तेजी से बदलती रहती है। भारतीय रुपये की तुलना में बोलिवर की कमजोरी स्पष्ट है, जो वेनेजुएला की आर्थिक दुर्दशा को दर्शाती है।
तेल भंडार होने के बावजूद आर्थिक संकट क्यों?
वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल भंडार है, फिर भी यह आर्थिक रूप से कमजोर क्यों है? इसका मुख्य कारण है भारी और गाढ़ा कच्चा तेल, जिसका निष्कर्षण और प्रसंस्करण महंगा है। पुरानी तकनीक, निवेश की कमी और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों ने तेल से होने वाली आय को सीमित कर दिया है। सरकारी नीतियों ने विविधीकरण को रोका, जिससे अर्थव्यवस्था पूरी तरह तेल पर निर्भर हो गई। अब अमेरिकी कार्रवाई के बाद तेल उत्पादन और निर्यात पर और असर पड़ सकता है, जो वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित करेगा।
यह घटना न केवल वेनेजुएला की संप्रभुता पर सवाल उठाती है, बल्कि वैश्विक geopolitics में नए अध्याय की शुरुआत भी कर सकती है। भारत जैसे देशों को अपनी ऊर्जा रणनीति पर पुनर्विचार करने की जरूरत है।