विक्रम सेन

विक्रम सेन
नई दिल्ली । यूक्रेन और अमेरिका ने गुरुवार को एक “मिनरल रिसोर्स डेवलपमेंट मेमोरेंडम” पर हस्ताक्षर किए हैं. यह समझौता अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पहल पर हुआ है और इसका उद्देश्य यूक्रेन के दुर्लभ खनिज संसाधनों के विकास में सहयोग करना है. अमेरिका और यूक्रेन के बीच रेअर (दुर्लभ) खनिजों को लेकर एक महत्वपूर्ण समझौते हो गया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस डील को “बहुत बड़ी डील” बताया हैं.
अमेरिका के लिए युद्ध में फंसे यूक्रेन से यह डील क्यों बहुत महत्वपूर्ण है, इसका खुलासा देखे :
विदित हो कि फरवरी में यह समझौता तय था, लेकिन वॉशिंगटन के ओवल ऑफिस में ट्रंप और ज़ेलेंस्की के बीच बहस के बाद इसे टाल दिया गया था. बाद में दोनों देशों ने रिश्ते सुधारने की कोशिश की, खासकर यूक्रेन को अमेरिका से मिल रही सैन्य मदद को देखते हुए.
हालांकि इस डील से अमेरिका की चीन पर खनिज मामले में निर्भरता कम हो जाएगी. क्योंकि सिर्फ़ ‘दुर्लभ खनिज’ ही नहीं, अमेरिका को चीन से कई महत्वपूर्ण खनिज मिलते हैं.
हाल ही में टैरिफ वार के जवाब में 7 मूल्यवान खनिजों के निर्यात पर बीजिंग का प्रतिबंध अमेरिका की कई कच्चे माल के लिए चीन पर निर्भरता को दर्शाता है, जिन्हें वाशिंगटन ने “महत्वपूर्ण” घोषित किया है.
बता दें कि वैश्विक व्यापार भागीदारों के साथ अपने टैरिफ विवाद को बढ़ाते हुए, राष्ट्रपति ट्रम्प ने वाणिज्य विभाग से आयातित “दुर्लभ पृथ्वी खनिजों” पर अमेरिका की निर्भरता से संभावित सुरक्षा जोखिमों पर विचार करने का आह्वान बहुत पहले ही किया था .
ये दुर्लभ खनिज 17 धातु तत्वों का एक समूह है जिन्हें पृथ्वी से निकालना मुश्किल है, लेकिन अमेरिकी रक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं. यह अनुरोध चीन द्वारा अमेरिकी टैरिफ के खिलाफ अपने प्रतिशोध के हिस्से के रूप में उन खनिजों में से 7 के निर्यात पर अंकुश लगाने के बाद आया है.
चीन ने महत्वपूर्ण खनिजों के साथ जवाबी हमला किया
एक ऐसे कदम में जिसने तनाव को काफी हद तक बढ़ा दिया, बीजिंग ने न केवल शब्दों या पारस्परिक टैरिफ के साथ जवाबी कार्रवाई की, बल्कि कुछ और अधिक शक्तिशाली – दुर्लभ पृथ्वी तत्वों के साथ जवाबी कार्रवाई की. 3 अप्रैल को, चीन ने डिस्प्रोसियम और यिट्रियम सहित सात भारी और मध्यम दुर्लभ पृथ्वी पर निर्यात प्रतिबंध लगाए, जो अमेरिकी रक्षा प्रणालियों के लिए महत्वपूर्ण धातुएँ हैं.
उल्लेखनीय हैं कि चीन दुर्लभ पृथ्वी खनिज बाजार पर हावी है, दुनिया की कुल आपूर्ति का लगभग 60% खनन करता है, और इस इकतरफा प्रभुत्व ने आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षा के बारे में चिंताएँ बढ़ा दी हैं. व्हाइट हाउस का कहना है कि “खनिज आयात पर अमेरिका की निर्भरता देश को “जबरजस्त आर्थिक दबाव” के पहलू को उजागर करती है. वैसे भी दुर्लभ खनिज की कमी इलेक्ट्रॉनिक्स और स्वच्छ ऊर्जा से लेकर रक्षा और चिकित्सा निदान उपकरणों तक सब कुछ प्रभावित कर सकती है.
दुर्लभ खनिज जैसा कुछ होता नहीं हैं ये सब जगह है, कहीं ज्यादा, कहीं कम
विदित हो कि दुर्लभ पृथ्वी खनिज वास्तव में एक मिथ्या नाम है, क्योंकि वे दुर्लभ नहीं हैं. वे वास्तव में हर जगह पाए जाते हैं, लेकिन बहुत सी जगहों पर बहुत कम मात्रा में. दो प्रकार के दुर्लभ पृथ्वी हैं – हल्के दुर्लभ पृथ्वी और भारी दुर्लभ पृथ्वी – और उन्हें वस्तुतः उनके वजन के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है. अब, ये प्रतिबंध भारी दुर्लभ पृथ्वी पर लक्षित हैं. कठिनाई यह है कि चीन वास्तव में इनमें से लगभग 100% को संसाधित करता है, जिसका अर्थ है कि न केवल वे उनका खनन करते हैं, बल्कि वे दुनिया भर से भारी दुर्लभ पृथ्वी का स्रोत बनाते हैं, उन्हें वापस लाते हैं और उन्हें अलग करते हैं. इसलिए वे चीन में शेष चट्टान से वास्तविक दुर्लभ पृथ्वी को निकालते हैं, जो दुनिया के बाकी हिस्सों को उनके द्वारा लगाए गए किसी भी प्रतिबंध के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाता है.
ट्रंप का क्या कहना है-ट्रंप ने कहा कि पूरा समझौता अगले हफ्ते साइन हो सकता है.उन्होंने कहा कि अमेरिका को यूक्रेन के खनिज संसाधनों तक विशेष पहुंच मिलेगी, जो अमेरिकी सैन्य मदद के बदले में होगी.ट्रंप के अनुसार, “ये एक बड़ा डील है, करीब 80 पेज का एग्रीमेंट है, और हम उसी पर साइन करने जा रहे हैं.
आगे क्या होगा?समझौते के लिए अभी यूक्रेन की संसद की मंजूरी आवश्यक होगी.यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने कहा कि यह मेमोरेंडम “सकारात्मक इरादों” को दर्शाता है.अब दोनों देश समझौते के विस्तृत नियम और निवेश की शर्तें तय करेंगे.
यूक्रेन और अमेरिका के बीच यह खनिज समझौता युद्धग्रस्त यूक्रेन के पुनर्निर्माण और अमेरिका के लिए रणनीतिक खनिजों तक पहुंच सुनिश्चित करने की एक रणनीतिक डील बन सकता है. ट्रंप प्रशासन इसे सैन्य समर्थन के बदले आर्थिक हिस्सेदारी की तरह देख रहा है. आने वाले हफ्तों में इस डील के दस्तावेजीकरण और संसदीय मंजूरी पर नजर रहेगी.
अमेरिका को चाहिए लिथियम, टाइटेनियम, ग्रेफाइट और रेयर अर्थ एलिमेंट्स जैसे खनिज, जो बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा और ग्रीन एनर्जी के लिए जरूरी हैं. अब तक अमेरिका इन खनिजों के लिए चीन पर निर्भर था.अमेरिका अब यूक्रेन को नया सप्लायर बनाना चाहता है, ताकि चीन की पकड़ कमजोर की जा सके.
यूक्रेन को क्या मिलेगा? बिलियन डॉलर की वित्तीय मदद और सैन्य उपकरण. युद्ध के बाद सुरक्षा की गारंटी की उम्मीद.उसके खनिज संसाधनों को ग्लोबल मान्यता.
अमेरिका को क्या मिलेगा-यूक्रेन के खनिज संसाधनों तक विशेष पहुंच है. सप्लाई चेन मज़बूत करने का मौका है.चीन से कम आयात करके व्यापार संघर्ष को संतुलित करना है.
अगर डील सफल रही तो
अमेरिका की चीन पर निर्भरता घटेगी
ग्रीन एनर्जी को मिलेगा बूस्ट
तकनीकी उत्पाद सस्ते हो सकते हैं
वैश्विक बाजार स्थिर होगा
सोने की कीमतें गिर सकती हैं
अगर डील फेल हुई या युद्ध बढ़ा…
सोने की कीमतें बढ़ सकती हैं
निवेशक सेफ हेवन यानी सोना खरीदेंगे
टेक्नोलॉजी प्रोडक्ट्स होंगे महंगे
महंगाई का दबाव बढ़ेगा
भारत पर क्या असर होगा-भारत की इलेक्ट्रॉनिक्स इंडस्ट्री को नई सप्लाई चेन से फायदा हो सकता है. चीन का प्रभुत्व कम हुआ तो कम लागत में खनिज मिल सकते हैं. सोने और मेटल की कीमतों में उलटफेर संभव है.
चीन की पकड़ कमजोर होगी-वर्तमान में, चीन दुनिया के 90% REEs को रिफाइन करता है. अगर अमेरिका और यूक्रेन मिलकर इसका उत्पादन बढ़ाते हैं, तो चीन की ताकत कम हो सकती है.
रूस का क्या रुख होगा- अगर अमेरिका यूक्रेन के खनिजों पर दावा करता है, तो रूस इस पर कड़ा विरोध जता सकता है. इससे या तो युद्ध तेज होगा या शांति वार्ता की संभावना बढ़ेगी.
ग्रीन एनर्जी को मिलेगा बूस्ट-अधिक लिथियम और REEs मिलने से इलेक्ट्रिक वाहनों, सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा प्रोजेक्ट्स को गति मिलेगी, जिससे कार्बन उत्सर्जन कम होगा.