
विशेष विश्लेषण विक्रम सेन
नई दिल्ली । भारत की ऊर्जा सुरक्षा में कच्चे तेल की भूमिका निर्णायक है। देश अपनी कुल ज़रूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, वहीं रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भारत न केवल एक बड़ा उपभोक्ता, बल्कि रिफाइंड ऑयल का वैश्विक सप्लायर भी बनकर उभरा है। भारत आज 40 से अधिक देशों को रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पाद निर्यात कर रहा है। ऐसे में सबसे अहम सवाल यह है कि भारत के लिए रूसी कच्चा तेल सस्ता पड़ेगा या वेनेज़ुएला का?
वेनेज़ुएला ऑयल: अवसर या अनिश्चितता?
अमेरिकी हस्तक्षेप और सत्ता परिवर्तन के बाद वेनेज़ुएला का तेल एक बार फिर वैश्विक चर्चा में है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की थी कि अमेरिका को वेनेज़ुएला से 50 मिलियन बैरल तेल मिलेगा, जिसे मार्केट प्राइस पर बेचा जाएगा।
तेल बाज़ार के विशेषज्ञों के अनुसार:
यदि वेनेज़ुएला का तेल WTI बेंचमार्क पर बेचा गया, तो कीमत लगभग 60 डॉलर प्रति बैरल हो सकती है।
अगर Brent Crude के आधार पर कीमत तय हुई, तो यह 63 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जा सकती है।
एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि:
क्या भारत को वेनेज़ुएला का तेल सीधे वेनेज़ुएला से मिलेगा,
या फिर अमेरिका के ज़रिए (वाया यूएस) सप्लाई होगी?
यदि सप्लाई अमेरिका से होती है, तो शिपमेंट कॉस्ट काफ़ी बढ़ जाएगी, जिससे तेल महँगा पड़ सकता है। हालांकि सीधे वेनेज़ुएला से सप्लाई होने पर शिपिंग सस्ती होगी, लेकिन कीमत फिर भी अमेरिकी नियंत्रण पर निर्भर करेगी।
बीते एक दशक में वेनेज़ुएला के तेल की औसत कीमत लगभग 55 डॉलर प्रति बैरल रही है, जबकि 2024 में यह 65 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच चुकी थी। वर्तमान हालात में भारत के लिए वेनेज़ुएला ऑयल की कीमत पूरी तरह अमेरिकी नीति और व्यापारिक शर्तों पर निर्भर करती दिख रही है।
रूसी कच्चा तेल: डिस्काउंट का लाभ
दूसरी ओर रूस का कच्चा तेल भारत को लगातार डिस्काउंट पर मिलता रहा है। मौजूदा समय में:
भारत को रूसी तेल मार्केट प्राइस से 10–15 डॉलर प्रति बैरल सस्ता मिल रहा है।
यदि ब्रेंट क्रूड की कीमत 63 डॉलर है, तो भारत को रूसी तेल 50–53 डॉलर प्रति बैरल पड़ता है।
शिपमेंट कॉस्ट जोड़ने के बाद भी कुल कीमत 54 डॉलर प्रति बैरल से अधिक नहीं बैठती।
हालाँकि, अमेरिका और यूरोपीय यूनियन द्वारा लगाए गए कड़े प्रतिबंधों के कारण रूस से सप्लाई में उतार-चढ़ाव आया है। विश्लेषण फर्म Kpler के अनुसार दिसंबर में रूसी तेल की सप्लाई घटकर 12 लाख बैरल प्रतिदिन तक आ गई, जो तीन साल का निचला स्तर है।
इसके बावजूद CMIE के आंकड़े बताते हैं कि 2025 में रूस भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बना रहा और कुल आयात में उसकी हिस्सेदारी 27 से 39 प्रतिशत के बीच रही।


अमेरिका से आयात भी बढ़ा
दिलचस्प बात यह है कि भारत ने संयुक्त राज्य अमेरिका से भी कच्चे तेल का आयात तेज़ी से बढ़ाया है।
नवंबर 2025 में अमेरिका से आयात बढ़कर 27 लाख टन हो गया, जो भारत के कुल तेल आयात का 13.2 प्रतिशत है। अप्रैल से नवंबर 2025 के बीच अमेरिकी तेल आयात में करीब 92 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
विशेषज्ञों की राय: कौन सस्ता पड़ेगा?
केडिया एडवाइजरी के डायरेक्टर अजय केडिया के अनुसार:
“मौजूदा परिस्थितियों में भारत को रूसी कच्चा तेल लगभग 54 डॉलर प्रति बैरल में पड़ रहा है। वहीं अगर वेनेज़ुएला का तेल अमेरिका के नियंत्रण में WTI रेंज (60 डॉलर) पर भी मिलता है, तो वह रूसी तेल से 6–7 डॉलर प्रति बैरल महँगा होगा।”
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अभी वेनेज़ुएला ऑयल को लेकर कीमत, सप्लाई रूट और अमेरिकी नीति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, इसलिए आकलन अनुमान पर आधारित हैं।
वर्तमान परिदृश्य में:
रूसी कच्चा तेल भारत के लिए सबसे सस्ता और व्यावहारिक विकल्प बना हुआ है।
वेनेज़ुएला का तेल भविष्य में विकल्प बन सकता है, लेकिन उसकी कीमत और सप्लाई अमेरिकी नियंत्रण और भू-राजनीति से जुड़ी अनिश्चितताओं पर निर्भर करेगी।
भारत के लिए आने वाले समय में ऊर्जा नीति का संतुलन आर्थिक लाभ, रणनीतिक स्वायत्तता और वैश्विक दबावों के बीच साधना सबसे बड़ी चुनौती रहेगा।