
विक्रम सेन
नई दिल्ली । कैथोलिक चर्च के धर्माध्यक्ष 88 वर्षीय पोप फ्रांसिस का निधन हो गया, पोप फ्रांसिस जिनका जन्म अर्जेंटीना में जॉर्ज मारियो बर्गोग्लियो के नाम से हुआ था, इतिहास के पहले लैटिन अमेरिकी पोप थे और 2013 से 12 वर्षों तक विश्व के करीब 1.4 बिलियन कैथोलिकों का मार्गदर्शन करते रहे।
वेटिकन ने एक वीडियो संदेश में उनके निधन की जानकारी देते हुए बताया कि
‘पोप फ्रांसिस, जो रोमन कैथोलिक चर्च के पहले लैटिन अमेरिकी धर्माध्यक्ष थे, का 21 अप्रैल को स्थानीय समयानुसार सुबह 7:35 बजे अंतिम सांस ली निधन हो गया। अपने 12 साल के कार्यकाल में उन्होंने करुणा, सहिष्णुता और मानवता के संदेश को दुनिया तक पहुंचाया। उनकी अंतिम सार्वजनिक अपील में उन्होंने धार्मिक स्वतंत्रता, विचार की आज़ादी और सहनशीलता की बात की थी और गाज़ा की स्थिति को ‘निंदनीय’ बताया था।’
भारत ने सोमवार को पोप फ्रांसिस के निधन पर सम्मान के तौर पर दिवसीय राजकीय शोक की घोषणा की है। राजकीय शोक की अवधि के दौरान, पूरे भारत में उन सभी इमारतों पर राष्ट्रीय ध्वज आधा झुका रहेगा, जहाँ नियमित रूप से राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है और कोई आधिकारिक मनोरंजन नहीं होगा।
गृह मंत्रालय ने एक बयान में कहा, “पवित्र धर्मगुरु पोप फ्रांसिस का 21 अप्रैल को निधन हो गया। सम्मान के प्रतीक के रूप में, पूरे भारत में तीन दिवसीय राजकीय शोक मनाया जाएगा।”
विदित हो कि पोप फ्रांसिस अपने जीवन की तरह मृत्यु में भी परंपराओं से अलग एक नई मिसाल छोड़ गए हैं। वे 100 वर्षों में पहले ऐसे पोप होंगे जिन्हें वेटिकन के बाहर दफनाया जाएगा। यह फैसला किसी आधिकारिक प्रक्रिया का नहीं, बल्कि उनकी व्यक्तिगत अंतिम इच्छा का सम्मान है।
उनकी यह इच्छा बताती है कि वे केवल कैथोलिक चर्च के धर्मगुरु नहीं थे, बल्कि एक विनम्र और आध्यात्मिक पथिक भी थे, जिन्होंने जीवनभर सादगी, करुणा और मानवता की बात की – और अंत तक उसी दर्शन पर अडिग रहे। उनका यह फैसला न केवल कैथोलिक चर्च के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ है, बल्कि उन लाखों लोगों के दिलों में भी जगह बना गया है जो उन्हें केवल एक धर्मगुरु नहीं, बल्कि आधुनिक युग के संत की तरह मानते थे।
13 मार्च 2013 को, जब उन्हें 76 वर्ष की आयु में पोप चुना गया, तो वे न केवल इतिहास में दर्ज हो गए बल्कि कई लोगों को चौंकाकर भी रख दिया। वे पहले ऐसे जेसुइट थे जो पोप बने और पहले व्यक्ति भी जो अमेरिका से (लैटिन अमेरिका) से पोप की गद्दी तक पहुंचे। चर्च के कई जानकारों ने उन्हें उस समय एक ‘बाहरी उम्मीदवार’ माना था-एक ऐसा नाम जिसकी चर्चा कम थी, लेकिन जिसकी उपस्थिति गहरी थी।
जब पोप फ्रांसिस ने पदभार संभाला, तो उन्होंने एक ऐसे चर्च की कमान संभाली जो बाल यौन शोषण कांडों, घटती विश्वसनीयता, और वेटिकन की आंतरिक खींचतान से जूझ रहा था। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। अपने विनम्र, करुणाशील और जनोन्मुख स्वभाव से उन्होंने एक ज़्यादा खुला, मानवीय और संवादधर्मी चर्च बनाने की दिशा में कदम बढ़ाए। उनकी शैली पारंपरिक सत्ता के ढांचे से अलग थी-वे प्रोटोकॉल से ज़्यादा प्रार्थना, पश्चाताप और जनसंवाद में यकीन रखते थे। उन्होंने चर्च को एक ऊँचे सिंहासन से उतारकर आम लोगों के बीच लाने की कोशिश की-और यही उन्हें बाकी पोप्स से अलग बनाता है।
अपने 12 साल के पोपत्व में फ्रांसिस ने वेटिकन के जटिल प्रशासनिक तंत्र को पूरी तरह से बदल दिया। उन्होंने चार महत्त्वपूर्ण शिक्षण दस्तावेज़ जारी किए, 65 से अधिक देशों के दौरे पर 47 बार विदेश यात्रा की, और 900 से ज़्यादा नए संतों की घोषणा करके चर्च की आध्यात्मिक विरासत को समृद्ध किया।
उनके नेतृत्व में चर्च ने पाँच बड़े अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलनों की मेज़बानी की, जहाँ महिलाओं को चर्च के संगठनात्मक काम में और यौन शिक्षाओं की समीक्षा जैसे संवेदनशील विषयों पर दुनिया भर के बिशपों ने खुलकर बहस की।
पोप फ्रांसिस के निधन की खबर के बाद देश और दुनिया भर में शोक संदेश दिए जा रहे है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने X (पूर्व में ट्विटर) पर पोप फ्रांसिस के निधन पर गहरा दुख जताया और उन्हें ‘करुणा और आध्यात्मिक साहस के प्रतीक’ के रूप में याद किया। उन्होंने एक्स पोस्ट में लिखा, “पोप फ्रांसिस का भारत के लोगों के प्रति स्नेह हमेशा संजोकर रखा जाएगा। परम पूज्य पोप फ्रांसिस के निधन से बहुत दुख हुआ। दुख और स्मरण की इस घड़ी में वैश्विक कैथोलिक समुदाय के प्रति मेरी हार्दिक संवेदनाएं। पोप फ्रांसिस को हमेशा दुनिया भर के लाखों लोगों द्वारा करुणा, विनम्रता और आध्यात्मिक साहस के प्रतीक के रूप में याद किया जाएगा। छोटी उम्र से ही उन्होंने प्रभु ईसा मसीह के आदर्शों को साकार करने के लिए खुद को समर्पित कर दिया। उन्होंने गरीबों और दलितों की पूरी लगन से सेवा की। जो लोग पीड़ित थे, उनके लिए उन्होंने आशा की भावना जगाई।”
उन्होंने अपने पोस्ट में आगे कहा, “मुझे उनके साथ हुई मुलाकातें याद आती हैं और मैं समावेशी एवं सर्वांगीण विकास के प्रति उनकी प्रतिबद्धता से बहुत प्रेरित हुआ हूं। भारत के लोगों के प्रति उनका स्नेह हमेशा मेरे मन में बना रहेगा। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे।”
विदित हो कि पिछले साल जून के महीने में प्रधानमंत्री जी7 शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए जब इटली गए तो वहां उन्होंने सम्मिट से इतर पोप फ्रांसिस से मुलाकात की थी, तब प्रधानमंत्री मोदी ने पोप फ्रांसिस की सराहना भी की थी। साथ ही, धरती को बेहतर बनाने में उनकी की गई सेवा का जिक्र किया था।
प्रधानमंत्री मोदी ने उनको भारत आने का न्योता भी दिया था। इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी ने पोप फ्रांसिस से 2021 में वेटिकन में मुलाकात की थी। तब उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के साथ ढेरों मुद्दों पर बात की थी जिसमें तब की दुनिया की सबसे बड़ी संकट कोरोना का भी जिक्र था।
पोप फ्रांसिस के पार्थिव शरीर को कार्डिनल्स के एक समूह की स्वीकृति मिलने तक बुधवार, 23 अप्रैल को सेंट पीटर्स बेसिलिका भेजा जा सकता है। 9-दिवसीय शोक के दौरान उनके पार्थिव शरीर को सेंट पीटर्स बेसिलिका में रखा जाएगा, जहां लोग पोप को अंतिम श्रद्धांजलि दे सकेंगे। इसके बाद उनका अंतिम संस्कार होगा, जो छह दिनों के भीतर होगा।
पोप फ्रांसिस को जानें
पोप फ्रांसिस, जिनका जन्म अर्जेंटीना में जॉर्ज मारियो बर्गोग्लियो के नाम से हुआ था, इतिहास के पहले लैटिन अमेरिकी पोप थे और 2013 से 12 वर्षों तक विश्व के करीब 1.4 बिलियन कैथोलिकों का मार्गदर्शन करते रहे।
कैथोलिक चर्च प्रमुख पोप फ्रांसिस में हुआ था। इनके माता- पिता मारियो (अकाउंटेंट) और रेजिना सिवोरी (गृहिणी), इतालवी अप्रवासी थे। इनके माता पिता के पांच संतान थे। वो ईसाई धर्म के सर्वोच्च धर्मगुरु हैं और इस पद तक पहुंचने वाले पहले लैटिन अमेरिकी व्यक्ति भी हैं। उनका चयन साल 2013 में पोप के रूप में किया गया था। वे पहले जेसुइट सदस्य हैं जिन्हें पोप की उपाधि प्राप्त हुई। उनका जन्म 17 दिसंबर 1936 को अर्जेंटीना की राजधानी ब्यूनस आयर्स में हुआ था। अपने 12 वर्षों के पोप कार्यकाल में उन्होंने न केवल चर्च में सुधारों की पहल की, बल्कि समाज और मानवता की भलाई के लिए कई महत्वपूर्ण कदम भी उठाए।
पोप फ्रांसिस का प्रारंभिक जीवन न केवल आध्यात्मिक खोज से भरा रहा, बल्कि ज्ञान और सेवा की दिशा में भी उन्होंने कई अहम पड़ाव तय किए। उन्होंने शुरुआत में रासायनिक तकनीशियन बनने के लिए अध्ययन किया। परंतु जल्द ही उनका झुकाव धार्मिक जीवन की ओर हुआ और उन्होंने एक धार्मिक विद्यालय, यानी सेमिनरी में दाखिला ले लिया। 1958 में उन्होंने जेसुइट समुदाय से जुड़कर आध्यात्मिक जीवन की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया। इसके बाद उन्होंने चिली और अर्जेंटीना में अपनी पढ़ाई जारी रखी, जहां उन्होंने धर्म और दर्शन की गहरी समझ विकसित की।
1963 में उन्होंने दर्शनशास्त्र में डिग्री प्राप्त की। शिक्षा के क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। 1964 से 1966 तक उन्होंने अर्जेंटीना के विभिन्न स्कूलों में साहित्य और मनोविज्ञान जैसे विषय पढ़ाए। इस दौरान उन्होंने न केवल ज्ञान बांटा, बल्कि अनेक छात्रों के जीवन को भी दिशा दी।
पोप फ्रांसिस की आध्यात्मिक यात्रा गहराई और समर्पण से भरी रही। 1967 से 1970 के बीच उन्होंने धर्मशास्त्र का गहन अध्ययन किया और इस विषय में डिग्री प्राप्त की, जिससे उनके धार्मिक ज्ञान को और अधिक मजबूती मिली। 1969 में वे पुजारी के रूप में अभिषिक्त किए गए, जो उनके समर्पित धार्मिक जीवन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। इसके बाद उन्होंने 1970 से 1971 के बीच स्पेन में विशेष प्रशिक्षण प्राप्त किया, जिससे उनकी आध्यात्मिक समझ और पादरी कार्यों में दक्षता और भी निखरी।
अपने ज्ञान की खोज को उन्होंने यहीं नहीं रोका-1986 में उन्होंने जर्मनी से डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की। यह शिक्षा उनके विचारों की गहराई और आध्यात्मिक दृष्टिकोण को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में और अधिक समृद्ध बनाने में सहायक रही। पढ़ाई और प्रशिक्षण के बाद उन्होंने अर्जेंटीना के कॉर्डोबा शहर में लोगों को आध्यात्मिक मार्गदर्शन देना शुरू किया। यहां उन्होंने न केवल शिक्षा दी, बल्कि लोगों के मन, आत्मा और जीवन की दिशा बदलने का कार्य भी किया।
पोप फ्रांसिस इतिहास के पहले लैटिन अमेरिकी पोप थे, जिन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान चर्च में कई सुधारों की पहल की और सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण और आपसी भाईचारे की वकालत की। बीते कुछ महीनों से उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती जा रही थी। उन्हें 14 फरवरी को रोम के जेमेली अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां उनका इलाज निमोनिया और एनीमिया के लिए चल रहा था। इसके अलावा, उन्हें फेफड़ों में संक्रमण के कारण भी करीब 5 सप्ताह तक अस्पताल में रहना पड़ा।
इलाज के दौरान वेटिकन की ओर से दी गई जानकारी के मुताबिक, ब्लड टेस्ट रिपोर्ट में किडनी फेल होने के संकेत मिले थे और प्लेटलेट्स की कमी भी देखी गई थी। हालांकि स्थिति में सुधार के बाद उन्हें 14 मार्च को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई थी। लेकिन आज उनकी हालत फिर से बिगड़ गई और उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन से दुनियाभर के करोड़ों कैथोलिक अनुयायियों के बीच गहरा शोक व्याप्त है। वेटिकन ने आधिकारिक रूप से उनके निधन की पुष्टि करते हुए श्रद्धांजलि अर्पित की है।
पोप फ्रांसिस को एक ऐसे प्रेरक के रूप में जाना गया, जिन्होंने विश्व की पारंपरिक संस्था को आज की चुनौतियों के अनुकूल बनाने में बिल्कुल भी पीछे नहीं हिचकिचाए। उन्होंने पुजारियों को यह विवेकपूर्ण अधिकार दिया कि वे समान-लिंग वाले जोड़ों को व्यक्तिगत मामलों के आधार पर आशीर्वाद दें, और पहली बार वेटिकन प्रशासन में महिलाओं को पदाधिकारी नियुक्त कर, लैंगिक समावेशिता की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया। इन पहलुओं ने पोप फ्रांसिस को उस धर्मनायक के रूप में स्थापित किया जो ‘स्थिर’ चर्च की दीवारों को तोड़कर उसे खुले समाज के करीब लाने का साहस रखता था।
राजकीय शोक के बारे में जानें
राजकीय शोक तब घोषित किया जाता है जब देश किसी महत्वपूर्ण राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय व्यक्ति के निधन पर आधिकारिक रूप से शोक प्रकट करता है।
राजकीय शोक के दौरान क्या-क्या होता है?
1.झंडा आधा झुका दिया जाता है :
पूरे देश या राज्य की सरकारी इमारतों पर राष्ट्रीय ध्वज आधा झुकाया जाता है।
केवल स्मरण या श्रद्धांजलि हेतु झंडा झुकाया जाता है, कोई अन्य कार्य नहीं किया जाता।
2. आधिकारिक समारोह और सरकारी कार्यक्रम रद्द:
सभी प्रकार के सरकारी समारोह, सांस्कृतिक, मनोरंजन और उद्घाटन कार्यक्रम स्थगित या रद्द कर दिए जाते हैं।
अगर, कोई सार्वजनिक रूप से निर्धारित कार्यक्रम पहले से तय हो, तो उसे भी टालने का प्रयास किया जाता है।
3. मनोरंजन पर रोक
सिनेमा हॉल, थिएटर और अन्य मनोरंजन से जुड़ी गतिविधियाँ कुछ स्थानों पर बंद रहती हैं।
टेलीविजन और रेडियो चैनल्स भी उस दिन सांस्कृतिक या मनोरंजन कार्यक्रम नहीं दिखाते, बल्कि श्रद्धांजलि से जुड़ी सामग्री प्रसारित करते हैं।
4. सरकारी स्कूल, कॉलेज, ऑफिस:
आमतौर पर सरकारी दफ्तर और स्कूल/कॉलेज खुले रहते हैं, जब तक कि विशेष आदेश न हों।
लेकिन किसी शीर्षस्थ नेता के निधन पर इन्हें भी एक दिन के लिए बंद किया जा सकता है।
भारत एक धार्मिक विविधता वाला देश है, जहां ईसाई समुदाय भी बड़ी संख्या में मौजूद है। पोप फ्रांसिस की वैश्विक भूमिका और भारत के साथ उनके संबंधों को देखते हुए, भारत सरकार ने कैथोलिक चर्च के धर्माध्यक्ष पोप फ्रांसिस के निधन पर राजकीय शोक सम्मान घोषित किया है।