
न्यायालय की अवमानना के एक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने एक मामले में इस बात पर जोर दिया कि अवमानना के लिए सजा देने की शक्ति आलोचकों को चुप कराने या न्यायाधीशों को जांच से बचाने का कोई जरिया नहीं है। साथ ही यह घोषणा भी की कि अवमानना का अधिकार क्षेत्र कभी भी न्यायपालिका के लिए व्यक्तिगत कवच नहीं बनना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि सजा देने के अधिकार में माफ करने की शक्ति भी शामिल होती है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जब कोई अवमानना करने वाला व्यक्ति सच्ची पछतावा दिखाता है तो दया न्यायिक विवेक का मुख्य हिस्सा बनी रहनी चाहिए। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने कहा कि सजा देने की शक्ति में स्वाभाविक रूप से माफ करने की शक्ति भी शामिल होती है।
जब न्यायालय के सामने मौजूद व्यक्ति उस काम के लिए सच्ची पछतावा और पश्चाताप दिखाता है, जिसकी वजह से वह इस स्थिति में आया है तो अवमानना के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते समय न्यायालय को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि यह शक्ति न्यायाधीशों के लिए व्यक्तिगत कवच नहीं है और न ही आलोचना को चुप कराने की तलवार है। आखिरकार अपनी गलती के लिए पछतावा स्वीकार करने के लिए हिम्मत चाहिए और गलती करने वाले को माफ करने के लिए इससे भी बड़ा गुण चाहिए। इसलिए दया न्यायिक विवेक का एक जरूरी हिस्सा बनी रहनी चाहिए। इसे तब दिखाया जाना चाहिए, जब अवमानना करने वाला ईमानदारी से अपनी गलती स्वीकार करता है और उसके लिए प्रायश्चित करना चाहता है।
सर्वोच्च न्यायालय ने ये टिप्पणियां बॉम्बे उच्च न्यायालय का एक आदेश रद्द करते हुए की। इसमें विनीता श्रीनंदन को एनिमल बर्थ कंट्रोल नियमों से जुड़े विवाद के संदर्भ में न्यायपालिका के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियां वाले परिपत्र जारी करने के लिए एक हफ्ते की साधारण कैद की सजा सुनाई गई थी। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय इस बात से सहमत था कि परिपत्र अवमानना वाला था और न्यायालय की बदनामी करने में सक्षम था। लेकिन, उसने माना कि उच्च न्यायालय ने श्रीनंदन की बिना शर्त माफी को स्वीकार न करके गलती की। खंडपीठ ने कहा कि वह पहले मौके पर पेश हुई, पछतावा जाहिर किया और माफी मांगी, जो अवमानना अधिनियम की धारा 12 की जरूरतों को पूरा करती थी।
सर्वोच्च न्यायालय ने पाया कि उच्च न्यायालय का पहले के अवमानना के फैसलों पर भरोसा करना गलत था। उन मामलों में ज्यादा गंभीर आरोप या ऐसी स्थितियां शामिल थीं, जहां अवमानना करने वाले ने बिल्कुल भी माफी नहीं मांगी। यहां, तथ्यों का मामला काफी अलग था। कानूनी योजना के तहत न्यायालय को सच्ची पछतावा दिखाए जाने पर सजा कम करने पर विचार करना जरूरी था। यह दोहराते हुए कि अवमानना कानून के ढांचे के भीतर मानवीय गलतियों को पहचाना जाता है। खंडपीठ ने कहा कि जब पछतावा सच्चा हो तो न्यायालय को उदारता से काम करना चाहिए। यह निष्कर्ष निकालते हुए कि श्रीनंदन की माफी स्वीकार करने से न्याय का मकसद पूरा होगा, सर्वोच्च न्यायालय ने सजा रद्द कर दी और अपील मंजूर कर ली।
न्यायालय की अवमानना क्या होती है, यह भी जानना आवष्यक है। भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने एक साक्षात्कार में बताया था कि अवमानना के लिये कार्रवाई करने का संवैधानिक न्यायालयों का अधिकार न्यायालयों के सुचारू कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए है, न कि न्यायाधीशों को आलोचना से बचाने के लिए। संविधान उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों को अनुच्छेद 129 और 215 के माध्यम से अवमानना को दंडित करने का अधिकार देता है। इसमें न्यायालय अवमान अधिनियम, 1971 में अवमानना तथा उसकी प्रक्रिया को परिभाषित किया गया है।
न्यायालय की अवमानना एक विधिक अवधारणा है जो न्यायिक प्रणाली की गरिमा और अधिकार की रक्षा करती है। भारत में, न्यायालय को वर्ष 1971 के अधिनियम के तहत संबोधित किया जाता है, जो अवमानना पूर्ण कार्यों के लिये दंड को परिभाषित और निर्धारित करता है। इसका प्राथमिक उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया की शुचिता बनाए रखना है, साथ ही यह भी सुनिश्चित करना है कि न्यायपालिका के अधिकार का सम्मान और बरकरार रखा जाए। यद्यपि, अवमानना विधि की व्याख्या और अनुप्रयोग अक्सर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर संभावित उल्लंघन के बारे में चिंता पैदा करते हैं, जिससे एक नाजुक संतुलन बना रहता है जिसे बनाए रखना चाहिए।
भारत में न्यायालय अवमान को मोटे तौर पर दो प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है। इसे दिवानी अवमान और आपराधिक अवमान के रूप में हम विभाषित कर सकते हैं। वर्ष 1971 के अधिनियम की धारा 2 (बी) के तहत, सिविल अवमान का तात्पर्य न्यायालय के किसी भी निर्णय, डिक्री, निर्देश, आदेशिका या अन्य प्रक्रियाओं के प्रति जानबूझकर अवज्ञा करना है, जबकि आपराधिक अवमान में ऐसे कार्य शामिल हैं जो कलंकित करते हैं या कलंकित करने की प्रवृत्ति रखते हैं। किसी भी न्यायालय के अधिकार को कम करने की प्रवृत्ति रखते हैं। किसी भी न्यायालय के अधिकार को कम करने की प्रवृत्ति रखते हैं। वर्ष 1971 के अधिनियम की धारा 2 (सी) के तहत ‘आपराधिक अवमान’ का अर्थ है किसी भी ऐसे बात का (चाहे बोले गए या लिखे गए शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा या दृष्यरूपणों द्वारा या अन्यथा) का प्रकाशन या कोई अन्य कार्य करने से अभिप्रेत है। इसमें किसी न्यायालय को कलंकित करना या जिसकी प्रवृत्ति उसे कलंकित करने की है।
न्यायालय अवमान अधिनियम, 1971 में अवमानना से बचाव भी बताए गए हैं। अधिनियम की धारा 3 के तहत यदि प्रकाशन करने वाले व्यक्तियों के पास इसके प्रकाशन के समय यह मानने का कोई उचित आधार नहीं था कि कार्यवाही लंबित थी, तो प्रकाशन को निर्दोष के रूप में वर्णित किया गया है। साथ ही अधिनियम की धारा 4 के तहत कोई व्यक्ति न्यायिक कार्यवाही या उसके किसी भी चरण की निष्पक्ष और सटीक रिपोर्ट प्रकाशित करने के लिए न्यायालय अवमान का दोषी नहीं होगा। साथ ही धारा 5 के तहत यह भारतीय नागरिक का विशेषाधिकार प्राप्त अधिकार है कि वह जिसे सत्य मानता है।
इसके अलावा पीठासीन अधिकारी के खिलाफ शिकायत धारा 6 के तहत कोई व्यक्ति किसी भी अधीनस्थ न्यायालय के पीठासीन अधिकारी के संबंध में सद्भावना से दिए किसी भी बयान के संबंध में न्यायालय अवमान का दोषी नहीं होगा। अधिनियम की धारा 13 न्यायालय को किसी भी अवमान कार्यवाही में वैध बचाव के रूप में सत्य द्वारा औचित्य की अनुमति देने में सक्षम बनाती है यदि यह सार्वजनिक हित या सद्धावना है। साथ ही धारा 12 (1) के प्रावधान में कहा गया है कि न्यायालय की संतुष्टि के अनुसार माफी मांगने पर आरोपी को बरी किया जा सकता है या दी गई सजा माफ की जा सकती है।
न्यायालय अवमानना का वर्तमान परिदृश्य भी देखा जाना चाहिए। अप्रैल 2018 में, विधि आयोग की एक रिपोर्ट से पता चला कि उच्च न्यायालयों में 568 आपराधिक अवमानना मामले और 96,310 सिविल मामले लंबित थे। इसके अलावा 10 अप्रैल, 2018 को, उच्चतम न्यायालय में 683 सिविल अवमान मामले और 15 आपराधिक अवमान मामले समाधान की प्रतीक्षा में थे। यह प्रतीत होता है कि वर्ष 1971 के अधिनियम में सावधानीपूर्वक जांच की आवश्यकता है। यदि आवश्यक हो, तो वर्षों से उठाई गई अस्पष्टताओं और चिंताओं को दूर करने के लिये सुधार किया जाना चाहिये। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सहित लोकतंत्र के सिद्धांतों को बनाए रखने के लिए न्यायपालिका की प्रतिबद्धता, आने वाले वर्षों में न्यायालय के अधिकार की रक्षा और नागरिकों के अधिकारों के संरक्षण के बीच नाजुक संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण होगी।
