
भोपाल। मध्यप्रदेश की आर्थिक स्थिति पर बढ़ते कर्ज़ और ब्याज बोझ का सीधा असर अब सरकारी खर्चों पर दिखने लगा है। बजट सत्र से ठीक पहले राज्य सरकार ने सख्त वित्तीय अनुशासन लागू करते हुए अफसरों के लिए नए वाहन, दफ्तरों में एसी, फर्नीचर और अन्य उपकरणों की खरीद पर फिलहाल रोक लगा दी है। वित्त विभाग ने स्पष्ट निर्देश जारी किए हैं कि 31 मार्च 2026 से पहले इस तरह के किसी भी प्रस्ताव के लिए बजट आवंटन नहीं किया जाएगा।
यह फैसला ऐसे समय लिया गया है जब राज्य सरकार पर कर्ज़ का दबाव लगातार बढ़ रहा है और राजस्व का बड़ा हिस्सा केवल ब्याज चुकाने में खर्च हो रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, मध्यप्रदेश का कुल सार्वजनिक कर्ज़ अब लाखों करोड़ के स्तर को छू चुका है और हर साल बजट का बड़ा भाग ऋण सेवा (Debt Servicing) में जा रहा है, जिससे विकास कार्यों के लिए उपलब्ध संसाधन सीमित हो रहे हैं।
वित्त विभाग के सख्त निर्देश
वित्त विभाग ने सभी अपर मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव और सचिव स्तर के अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि चालू वित्त वर्ष के तीसरे अनुपूरक बजट में इस तरह के किसी भी गैर-जरूरी खर्च से जुड़े प्रस्ताव नहीं भेजे जाएं। साफ कहा गया है कि सरकारी दफ्तरों के आधुनिकीकरण से जुड़े खर्च फिलहाल प्राथमिकता सूची से बाहर रहेंगे।
तीसरा अनुपूरक बजट होगा पेश
16 फरवरी से शुरू हो रहे विधानसभा के बजट सत्र में वर्ष 2026-27 के लिए तीसरा अनुपूरक बजट पेश किया जाएगा। सरकार इस बार जीरो बेस्ड बजट प्रणाली के आधार पर बजट तैयार कर रही है, जिसमें हर योजना और खर्च की नई सिरे से समीक्षा की जा रही है। इसका उद्देश्य यह है कि केवल अत्यावश्यक और उत्पादक खर्चों को ही मंजूरी दी जाए।
23 जनवरी तक ऑनलाइन प्रस्ताव
वित्त विभाग ने निर्देश दिए हैं कि 23 जनवरी 2026 तक सभी प्रस्ताव केवल ऑनलाइन माध्यम से ही स्वीकार किए जाएंगे। साथ ही यह भी अनिवार्य किया गया है कि कोई भी प्रस्ताव पहले संबंधित प्रशासकीय विभाग से अनुमोदित हो, उसके बाद ही वित्त विभाग को भेजा जाए।
केवल इन्हीं मामलों में मिलेगी मंजूरी
वित्त विभाग ने साफ किया है कि तीसरे अनुपूरक बजट में केवल निम्न श्रेणियों के प्रस्ताव ही स्वीकार किए जाएंगे:
जिन कार्यों को राज्य के इमरजेंसी फंड से एडवांस स्वीकृति मिल चुकी हो।
जिन प्रस्तावों पर वित्त विभाग की पूर्व सहमति हो।
केंद्र सरकार या अन्य एजेंसियों से वित्तीय सहायता/केंद्रांश स्वीकृत हो और जिसे मौजूदा बजट मद से अलग नहीं किया जा सकता हो।
विशेष पूंजीगत सहायता योजना के तहत केंद्र को भेजे गए या भेजे जाने वाले प्रस्ताव, जिनके लिए नई बजट लाइन खोलना आवश्यक हो।
इसके अलावा यह भी स्पष्ट किया गया है कि किसी विभाग को अधिक धन की आवश्यकता होने पर वह अन्य योजनाओं की राशि काटकर या वहां से बची हुई रकम का उपयोग नहीं कर सकेगा।
कर्ज़ और घाटे की मजबूरी
वित्तीय जानकारों के अनुसार, यह सख्ती सरकार की मजबूरी भी है। राज्य का राजकोषीय घाटा नियंत्रित करने का दबाव केंद्र सरकार और आरबीआई दोनों स्तर पर है। यदि खर्चों पर नियंत्रण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे जैसी मूलभूत सेवाओं के लिए भी संसाधन जुटाना कठिन हो सकता है।
संकेत साफ: विकास से पहले वित्तीय अनुशासन
सरकार का यह कदम संकेत देता है कि अब “सुविधा आधारित खर्च” की जगह “जरूरत आधारित खर्च” को प्राथमिकता दी जाएगी। अफसरों की सुविधाओं पर रोक भले ही छोटी बात लगे, लेकिन यह निर्णय राज्य की बिगड़ती वित्तीय सेहत और बढ़ते कर्ज़ के दबाव की गंभीरता को उजागर करता है।
कुल मिलाकर, मध्यप्रदेश सरकार अब विकास और प्रशासनिक खर्चों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश में है, जहां हर रुपया सोच-समझकर खर्च करने की नीति अपनाई जा रही है। आने वाला बजट सत्र यह तय करेगा कि सरकार कर्ज़ के जाल से निकलने के लिए कितनी दूर तक सख्त फैसले लेने को तैयार है।