

विक्रम सेन
आलीराजपुर। वर्तमान में आलीराजपुर रियासत की पुश्तैनी संपत्तियों की वसीयत पर रक्त वंशज हाईकोर्ट में माननीय डबल बैंच के समक्ष याचिका दायर कर चुके हैं।
इस संदिग्ध वसीयत को वैलिड बनाने में कथित रूप से विश्वनीय सहयोग देने वाले एक वरिष्ठ राजस्व अधिकारी का कहना हैं कि आज़ादी के बाद आलीराजपुर रियासत की संपत्ति महाराजा सुरेन्द्र सिंह के नाम हुई हैं वह नियमानुसार निजी संपत्ति कहलाती हैं।
अतः रियासत कालीन पुश्तैनी संपत्ति को सुरेन्द्र सिंह की निजी संपत्ति घोषित करने का मतलब है कि वे इसे किसी को भी बेच सकते थे, वसीयत कर सकते थे और उनके निधन के बाद स्वामी बने कमलेंद्र सिंह को यह अधिकार प्राप्त था इसलिए फर्जी वसीयत पर नामांतरण आदेश भी सही हैं और अन्य किसी उत्तराधिकारी के होने वाले दावेदारों की मांग भी गलत है।
अब इस महा भ्रष्ट, पदेन दायित्व की शक्तियों का दुरुपयोग करने के आदि राजस्व अधिकारी ने निजी स्वार्थ के खातिर जागीरा गैंग को यह नहीं बताया है कि पूर्व रियासतों की संपत्ति, जो पहले रियासत शासकों के स्वामित्व में थी, को अब व्यक्तिगत संपत्ति के रूप में मान्यता दी जाए, इसका मतलब है कि इन संपत्तियों पर शासकों के वंशज या उत्तराधिकारी अब अपना दावा कर सकते हैं और उन पर पूरी तरह से स्वामित्व रख सकते हैं। यानी आज़ादी के बाद भारतीय संघ में विलय हुए रियासतों की संपत्ति के स्वामी राजा ही होंगे, उनसे सिर्फ राज्य सत्ता का हस्तांतरण भारतीय संघ में विलय किया है उसके बदले भी उन्हें सरकार से प्रिवी पर्स प्राप्त होता था।
प्रिवी पर्स का अर्थ है “निजी पर्स” या “निजी कोष”। यह एक वित्तीय व्यवस्था थी जो भारत की स्वतंत्रता के बाद रियासतों के विलय के समय लागू की गई थी।
प्रिवी पर्स पूर्ववर्ती रियासतों के शासक परिवारों को दिया जाने वाला एक भुगतान था, जो भारत की स्वतंत्रता के बाद 1947 में पहली बार भारत के साथ एकीकृत होने और बाद में 1949 में अपने राज्यों को भारत में विलय करने के उनके समझौतों के हिस्से के रूप में दिया जाता था, जिससे उनके शासक अधिकार समाप्त हो जाते थे।
इस व्यवस्था के पीछे का तर्क यह था कि रियासतों के शासकों ने अपने राज्यों के विलय के लिए अपनी रियासतों को भारत में विलय करने के लिए समझौते किए थे, जिससे उन्हें शासक अधिकार खोने पड़ते थे। इसलिए, उन्हें इस समझौते के तहत एक वार्षिक भत्ता दिया जाता था ताकि उन्हें वित्तीय रूप से सुरक्षित रखा जा सके। भारतवर्ष में राजभत्ता देने की परियोजना की शुरुआत सन 1950 में लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना के बाद हुई थी।
इस प्रकार शासकों ने अपनी संप्रभुता समर्पित कर दी और बदले में उन्हें आकर्षक प्रिवी पर्स और अन्य विशेषाधिकार प्रदान किये गये
हालाँकि, बाद में इस व्यवस्था को भारत के संविधान में। सन् 1971 में 26वें संशोधन द्वारा समाप्त कर दिया गया।
इस संशोधन ने प्रभावी रूप से मौजूदा उपाधियों को अमान्य कर दिया, जो इस प्रकार था:
राजकुमार, प्रमुख या अन्य व्यक्ति, जो संविधान (छब्बीसवां संशोधन) अधिनियम, 1971 के प्रारंभ से पहले किसी भी समय राष्ट्रपति द्वारा किसी भारतीय राज्य के शासक के रूप में मान्यता प्राप्त था या कोई व्यक्ति, जो ऐसे प्रारंभ से पहले किसी भी समय राष्ट्रपति द्वारा ऐसे शासक के उत्तराधिकारी के रूप में मान्यता प्राप्त था, ऐसे प्रारंभ से ही ऐसे शासक या ऐसे शासक के उत्तराधिकारी के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं रहेगा।
इसका मुख्य कारण यह था कि प्रिवी पर्स को वंशानुगत विशेषाधिकार के रूप में देखा जाता था, जो संविधान में निर्धारित समानता, सामाजिक और आर्थिक न्याय के सिद्धांत के अनुरूप नहीं था।
प्रिवी पर्स की समाप्ति से पूर्व शासकों के सभी अधिकार और विशेष दर्जा समाप्त हो गए।
साथ ही उन्हें उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति जो पैतृक यानी पुश्तैनी शाही संपत्ति थीं जिस पर उनका अकेले का नाम हुआ करता था, उसमें सभी वंशजों तथा परिजनों के अधिकार भी समाविष्ट रहे।

मध्य प्रदेश कृषक जोत उच्चतम सीमा अधिनियम, सीलिंग एक्ट 1960 में खाता खसरा में प्रताप सिंह के एक पुत्र माधव सिंह के परिवार का नाम सुरेन्द्र सिंह के साथ दर्ज था, पर आलीराजपुर रियासत की 600 वर्ष पुरानी समस्त शाही संपत्ति के कथित वसीयत कर्ता कमलेंद्र सिंह का नाम नहीं था
मध्यप्रदेश सरकार द्वारा 15 नवम्बर, 1961 में यह कानून सम्पूर्ण राज्य में लागू किया गया। इस कानून में यह बताया गया है कि कोई भी भूमि स्वामी या किसान व्यक्ति 7 मार्च 1974 के बाद आवश्यकता से अधिक कृषि योग्य भूमि का मालिक नहीं होगा। अगर वह रखता है तो उसकी अधिकतम सीमा से ज्यादा भूमि राज्य सरकार द्वारा अधिग्रहित कर ली जायेगी।
इस कानून के अनुसार परिवार में पाँच से अधिक सदस्य होने पर अधिकतम 108 एकड़ असिंचित सहित कृषि भूमि रख सकता है इसके अतिरिक्त नहीं। इसी कारण महाराजा सुरेन्द्र सिंह ने अपनी फैमिली में अपने दादा प्रताप सिंह जी की पत्नी सकरी बाई से उत्पन्न पुत्रों में से एक माधव सिंह पिता प्रताप सिंह यानी अपने काका साहब तथा काकीजी एवं उनके परिवार के नाम भी खाता खसरा में दर्ज कराए थे। हालांकि बाद में राजस्व विभाग के तत्कालीन अधिकारी द्वारा साजिशन ये नाम कम कर दिए गए। परंतु यहां बता दें कि तब भी कमलेंद्र सिंह का नाम शाही संपत्ति पर नहीं था। यहां पुनः बता दें कि 1909 में राजा बनाए गए प्रताप सिंह को ब्रिटिश सरकार ने 1891 में आलीराजपुर राजपरिवार की ही शाखा सोंडवा से चयनित कर पढ़ाया लिखाया और राजा बनाया था। प्रताप सिंह की पहली और दूसरी पत्नी का शीघ्र निधन हो गया था इनसे एक पुत्र फतेह सिंह थे, वहीं तीसरी पत्नी सकरी बाई से तीन पुत्र माधव सिंह, विजय सिंह तथा दिलीप सिंह थे।
राजकुमार फतेह सिंह के पांच पुत्र तथा तीन पुत्री थी। फतेह सिंह की 1941 में संदिग्ध स्थिति में मृत्यु हो गई थी, जबकि प्रताप सिंह की मृत्यु आजादी के बाद के वर्षों में हुई थी।
प्रताप सिंह के वरिष्ठ पुत्र फतेह सिंह के वरिष्ठ पुत्र सुरेन्द्र सिंह थे अतः उन्हें प्रताप सिंह ने राज काज सौंपा था।
इसी कारण सुरेंद्र सिंह प्रिवी पर्स की बैठक में आलीराजपुर रियासत के राजपरिवार की और से शामिल हुए थे तथा उन्हें प्रिवी पर्स प्राप्त होता था। चुकी वे ज्येष्ठ पुत्र थे अतः शाही संपत्ति भी आज़ादी के बाद स्वाभाविक राज परंपरा अनुसार उन्हीं के नाम से दर्ज हुई थी।
न्यायिक दृष्टांत हैं कि राज्य संपत्ति की प्रथा को स्वीकार और मानते हुए कि ज्येष्ठता का सिद्धांत (प्राइमोगेनिचर का नियम) राजसत्ता का शासन सभी रियासतों में उत्तराधिकार का एक सामान्य नियम था। हमें इस प्रथा की न्यायिक सूचना लेना चाहिए, जो साक्ष्य अधिनियम 1872 की धारा 48 के माध्यम से राजोचित राज्य पर लागू होता है।
यानी कि सुरेंद्र सिंह को प्राप्त शाही संपत्ति कानूनन निजी संपत्ति नहीं थी।
लेफ्टिनेंट कर्नल जेम्स टॉड ने अपने कार्य को एनल्स एंड एंटीक्विटीज ऑफ राजस्थान’ (Oxford University Press, 1920. Reprinted in 1978 by M.N. Publishers, New Delhi) में शीर्षक के पृष्ठ 307 में कहा है:-
“ज्येष्ठता का सिद्धांत (प्राइमोगेनिचर का नियम) सभी राजपूत संप्रभुता में व्याप्त है; दुर्लभ उदाहरण जिसमें इसे अपास्त किया गया है, केवल नियम के अपवाद हैं।”
न्यायमूर्ति जी. के. मित्तर ने माधव राव जीवाजी राव सिंधिया बनाम भारत संघ और अन्य 5 ((1971)1 SCC B5) के अपने निर्णय में अवलोकित किया थाः
“अपरिवर्तनीय रूप से ऐसा प्रतीत होता है कि पैतृक पुरुष ज्येष्ठता का सिद्धांत (प्राइमोगेनिचर का नियम) एक पुत्र के अपनाने की प्रथा के साथ युग्मित है जो हिंदू शासकों के मामले में जो शरीर के ढेर के साथ पृकृतिस्थ है।”
भारत सरकार के समक्ष सुरेन्द्र सिंह जी ने प्रिवी पर्स का अनुबंध या विलय समझौता आलीराजपुर रियासत के राजकुमार या मुखिया के रूप में मान्य राजनीतिक प्रतिनिधि के रूप में किया था।
राज्य नीति के कारण यह केवल उत्तराधिकार के कानून तक ही सीमित था, समझौते की यह शक्ति रियासत की शाही संपत्ति को क़ानूनी तौर पर सुरेन्द्र सिंह की निजी संपत्ति सिद्ध करने के लिए कानूनन रूप से कोई बाध्यकारी शक्ति नहीं थीं।
यानी कि राज वंशी प्रताप सिंह पिता भगवान सिंह निवासी सोंडवा जिन्हें आलीराजपुर रियासत के राजा के रूप में ब्रिटिश सरकार ने चयनित किया था के सभी परिजन और वंशज
पैतृक शाही संपत्ति में उत्तराधिकार रखते हैं।
सुरेन्द्र सिंह को आलीराजपुर रियासत की और से राजा के रूप में संधि करने मात्र से उन्हें रियासत पर शासन की मान्यता प्राप्त हुई थीं, न तो कानूनी अधिकार और न ही
यह शाही संपत्ति पर एकमेव अधिकार था।
यह भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि प्रिवी पर्स पर भी उनका अकेले का कोई कानूनी अधिकार नहीं था।
बावजूद इसके कमलेंद्र सिंह के नाम से रियासत कालीन शाही पुश्तैनी संपत्तियों की निजी स्व अर्जित संपत्ति बता कर वसीयत बना ली गई तथा इसका नामांतरण आदेश तहसील न्यायालय अलीराजपुर से लेकर अब इस संपत्ति को जागीरा गैंग बेच खाने की कोशिश कर रही हैं।
इस आपराधिक साज़िश को रचने वालों ने आलीराजपुर रियासत का इतिहास भी नहीं देखा। इसे 1437 में आली राजवंश की स्थापना से देखने की बजाय जरूरी वंश वृक्ष को जानते हैं;
आलीराजपुर रियासत पर जिनका राज रहा उनकी तथ्यात्मक परन्तु संक्षिप्त जानकारी इस 1000 करोड़ की संपत्ति की फर्जी वसीयत को जानने के लिए जरूरी हैं।
आलीराजपुर रियासत पर 1862 से 1869 तक राणा गंग देव ने शासन किया था। जिनका जन्म 1845 में हुआ था तथा मृत्यु 1871 में हुई।

राणा रूप देव
ने सन 1869 से 29 अक्टूबर 1881 तक रियासत पर राज किया। इनका जन्म 1847 में हुआ था तथा इनकी मृत्यु 1881 में हुई। मृत्यु पर्यंत इन्होंने राज किया। परंतु ये अविवाहित थे इनकी भी अपने भाई गंग देव की तरह कोई संतान नहीं थी।
आलीराजपुर रियासत राजा विहीन हो गई थी, कोई रानी भी नहीं थी जो किसी को गोद लेती , ऐसी स्थिति में सन 1881 में सोंडवा जागीर से जो आली राजवंश की ही शाखा थी से चन्द्र सिंह के पुत्र विजय सिंह जो छोटे बच्चे थे को ब्रिटिश सरकार ने चयनित किया तथा वे 16 अगस्त 1890 मृत्यु पर्यंत राज किया। परंतु ये अविवाहित थे इनका भी कोई संतान नहीं थी।
विजय सिंह की आकस्मिक मृत्यु के बाद रियासत पर ब्रिटिश सरकार के कर्नल ने प्रतिनिधि के रूप में क़रीब 7 माह तक राज काज संभाला। यह अवधि 16 अगस्त सन 1890 से 14 फरवरी 1891 तक रही।
फिर सोंडवा जागीर के चन्द्र सिंह के भाई भगवान सिंह के पुत्र प्रताप सिंह को
14 फरवरी 1891 को ब्रिटिश सरकार ने चयनित कर मार्च 1892 को स्थापित किया। इनकी पढ़ाई लिखाई ब्रिटिश सरकार ने राजकुमार कॉलेज में कराई। सन 1911 में इन्हें आलीराजपुर रियासत का राजा घोषित किया गया। इससे पहले वे प्रशिक्षण काल में नानपुर खट्टाली परगना के काम काज को राजस्व अधिकारी के रूप में देखते रहे।
सन 1911 से 1941 तक प्रताप सिंह द्वितीय (3 जून 1933 से, सर प्रताप सिंह द्वितीय) (1941 तक महाराजा के रूप में वे पूर्ण रूप से शासन करते रहे।)
उनके प्रिय पुत्र फतेह सिंह का निधन संदिग्ध परिस्थिति में 23 अक्टूबर 1941 को हो गया था, तब से प्रताप सिंह सक्रिय राजकाज से दूर हो गए थे। फतेह सिंह जी का जन्म 1904 में हुआ था और जन्म के बाद इनकी माता का निधन हो गया था।
प्रताप सिंह जी का जन्म सन 1881 में हुआ था, तथा इनकी मृत्यु सन 1950 में हुई।
फतेह सिंह जी की मृत्यु के बाद उनके पांच पुत्र और 3 पुत्रियों में ज्येष्ठ पुत्र सुरेंद्र सिंह को रियासत का राजा बनाया गया था। ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत देश को स्वतंत्र करने यानी 15 अगस्त 1947 तक वे राजा रहे।
सुरेन्द्र सिंह जी का जन्म सन 1923 में हुआ था तथा इनकी मृत्यु भी संदिग्ध परिस्थिति में इंदौर के श्रीमाया होटल में सन 1996 में 29 – 30 मार्च की दरम्यानी रात हो गई थी।
23 अक्टूबर 1941 से 15 अगस्त 1949 तक सर प्रताप सिंह रीजेंट के तौर पर आलीराजपुर रियासत का राज काज संभालते थे।
कमलेंद्र सिंह की बिना जानकारी के निकाले गए फर्जी स्टाम्प पर पुश्तैनी शाही संपत्तियों को हड़पने और बेच खाने के लिए बनाई गई वसीयत की धांधलियों के बारे में जाने
वसीयत तैयार करने की प्रक्रिया के दौरान कानूनी सलाह तो ली गई थी परन्तु एकतरफा हड़पने और बेच खाने की साज़िश के चलते रियासत कालीन पुश्तैनी संपत्तियो की वसीयत को इस तरह बनाया गया जैसे कि कमलेंद्र सिंह एक सामान्य नागरिक हैं और उनकी निजी स्व अर्जित कमाई की संपत्ति की वसीयत की गई है।
इस वसीयत में प्रासंगिक कानूनों और विनियमों के अनुपालन को सतही तौर पर काम चलाऊ स्तर पर उपयोग किया गया हैं।
अचल संपत्तियों का स्पष्ट विवरण: अचल संपत्तियों/परिसंपत्तियों का व्यापक और सटीक विवरण प्रदान करें, जो प्रायः वसीयत के साथ संलग्न एक अलग अनुसूची में होना चाहिए था जो नहीं हैं।
जैसी की कमलेंद्र सिंह जी के बैंक खातों और डीमैट खातों के सटीक विवरण के साथ सूची शामिल की गई हैं।
इसका कारण यह है कि कमलेंद्र सिंह के सहायक वैतनिक मैनेजर, बैंक तथा आयकर विवरणिका का हल्का फुल्का काम देखते थे तो उनके पास जो जानकारी थी वह वसीयत बनाते समय सही से भर दी, परन्तु अचल संपत्तियो का मात्र सर्वे नंबर ही लिखा उनका रकबा, उनके न्यायालयीन विवाद, बिल्डिंग्स के बारे में कोई जानकारी नहीं हैं। राजस्व में रिश्वत देकर और दबाव प्रभाव से नामांतरण हुआ तो बिल्डिंग्स का नामांतरण तो नगरीय निकाय में होता हैं तो वहां बिना परिषद की सहमति और प्रोबेट वसीयत के बिना हो नहीं सकता हैं। इसलिए नपा परिषद में आज दिनांक तक तक जागीरा गैंग ने आवेदन तक नहीं दिया।
अविवाहित श्रीमंत कमलेंद्र सिंह की सम्पत्ति ऐसे ही कुछ हस्ताक्षर फर्जी स्टाम्प उनके नाम से जारी कराकर, शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति फिट बताने का प्रमाण पत्र, नोटरी की तस्दीक मात्र से सच्ची साबित नहीं हो जाएगी।
कैंसर से जूझ रहें कमलेंद्र सिंह की देह को बिना जरूरत वाले, बिना मोर्चरी वाले, बिना छात्रों वाले, किराए की बिल्डिंग में लगने वाले बिल्कुल नए मेडिकल कॉलेज में फर्जी दस्तावेजों के आधार पर 48 घंटे बाद दान कर देना, जर खरीद नौकरो को गवाह बना लेना, रिश्वत देकर नामांतरण आदेश जारी करने की ऑडियो कॉल में स्वीकारोक्ति वाले राजस्व अधिकारी अपना हिस्सा लेकर लोटपोट हो रहे हैं पर आखिर कब तक?
वसीयत में वसीयत कर्ता कमलेंद्र सिंह द्वारा स्पष्ट रूप से उस तिथि का उल्लेख होना चाहिए था, जिस दिन इसे उन्होंने निष्पादित किया था।
संदिग्ध वसीयत को प्रोबेट नहीं करने की अनावश्यक और टिप्पणी भी फर्जी वसीयत की साज़िश उजागर करने वाली हैं जिसे कोर्ट को विवाद का कारण मानना ही है।
रियासत कालीन पुश्तैनी संपत्ति की वसीयत पर कानून क्या कहता हैं?
रियासत कालीन पुश्तैनी संपत्ति पर स्वामी वही होते हैं जो उत्तराधिकार के कानूनी नियमों के अनुसार उत्तराधिकारी होते हैं।
उत्तराधिकारियों के कानूनी अधिकारों को वसीयत द्वारा तब तक समाप्त नहीं किया जा सकता जब तक कि विभाजन पहले ही न हो चुका हो।
सुप्रीम कोर्ट ने पैतृक संपत्ति पर दावा करने की समय सीमा भी स्पष्ट की है। इसने फैसला सुनाया है कि जब तक संपत्ति अविभाजित रहती है, तब तक पैतृक संपत्ति पर दावा करने की कोई निश्चित समय सीमा नहीं है।
पैतृक संपत्ति को वसीयत के माध्यम से तब तक नहीं दिया जा सकता जब तक कि विभाजन के बाद व्यक्ति के पास उस पर एकमात्र स्वामित्व न हो। यह सुनिश्चित करता है कि सभी वैध उत्तराधिकारियों के हितों की रक्षा की जाए और कोई भी परिवार का सदस्य पैतृक संपत्ति के भाग्य का एकतरफा फैसला न कर सके।
किसी उत्तराधिकारी को विशिष्ट कारणों से वसीयत से कब बाहर किया जा सकता हैं?
किसी उत्तराधिकारी को उत्तराधिकार प्राप्त करने से बाहर रखा जाना है, तो वसीयत में इस बहिष्कार को स्पष्ट रूप से बताना था और संभवतः इस निर्णय के लिए संक्षिप्त स्पष्टीकरण भी देना था।
जबकि कमलेंद्र सिंह के दो सगे भाई और एक बहन उनके परिवार सहित, कमलेंद्र सिंह के सगे काका साहब माधवसिंह, विजय सिंह जी, दिलीप सिंह जी, एवं उनके पितामह प्रताप सिंह जी पिता भगवान सिंह जी के परिजन तख्त सिंह जी के परिवार में कई सदस्य जीवित हैं तो उनके नाम उत्तराधिकारी होने से क्यों हटाए तथा बाहरी तत्वों को कैसे वसीयत कर दी गई इस संबंध में फर्जी वसीयत एक शब्द नहीं लिखा हैं। यानि कि कमलेंद्र सिंह ने इस वसीयत को लिखा तो इसे लिखते समय अपने आपको मालिक कैसे बता सकते थे।
किसी हिन्दू को अपने पिता, पिता के पिता या पिता के पिता के पिता से विरासत में मिली संपत्ति पैतृक संपत्ति होती है। हिंदू परदादा द्वारा अर्जित कोई भी संपत्ति, जो अगली तीन पीढ़ियों तक अविभाजित रूप से परपोते/पुत्री की वर्तमान पीढ़ी तक जाती है। यह संपत्ति चार पीढ़ी पुरानी होनी चाहिए।
पुश्तैनी यानी पैतृक जमीन पर, चार पीढ़ियों तक, हर सदस्य का अधिकार होता है। इसमें पिता, दादा, परदादा और उनकी संतानें शामिल हैं. जन्म से ही, सभी का बराबर का हिस्सा होता है. 2005 के बाद, बेटियों को भी पैतृक संपत्ति में समान अधिकार दिया गया है.
पैतृक संपत्ति में आपका जो हिस्सा है उसको पिता वसीयत करके भी नही छीन सकते। इसको ऐसे भी कह सकते है कि पैतृक संपत्ति में जो आपका हिस्सा बनता है उसकी वसीयत करने का अधिकार आपके पिता को है ही नही।
अब अगर आपके पिता ने आपको अपनी वसीयत में बेटा माना हो या ना माना हो। परंतु यदि आपके पास सबूत है तो आप बेटे ही रहेंगे चाहे आपके पिता कुछ भी लिख जाए।
आपके पिता केवल अपनी यानी उनकी खुद की कमाई से बनाई संपत्ति से बेदखल कर सकते है, पैतृक संपत्ति यानी दादा लाई संपत्ति से नही।
इसलिए आपको पैतृक संपत्ति में अपना हिस्सा जरूर मिलेगा।
यानी कि महाराजा प्रताप सिंह जी की तीन पत्नियों के सभी पुत्रों तथा पुत्रियों के वंशजों को तथा उनके परिजनों को प्रताप सिंह जी के जीवित रहते जो सम्पत्ति सुरेंद्र सिंह को उत्तराधिकारी होने के नाते प्राप्त हुई उसमें सभी वंशजों तथा परिजनों का यथा योग्य उत्तराधिकार प्राप्त हैं।
इसलिए
कमलेंद्र सिंह की रियासत कालीन पुश्तैनी संपत्तियो को फर्जी वसीयत के आधार पर बेच नहीं सकते
कानून कायदों के तहत पैतृक संपत्ति में हिस्सा रखने वाले व्यक्ति, यानी जन्म के समय अर्जित की गई संपत्ति जो चार पीढ़ियों से अविभाजित है (उदाहरण के लिए, HUF में सहदायिक) को यानि खानदान के किसी अकेले व्यक्ति को संपत्ति के अपने हिस्से पर पूर्ण स्वामित्व नहीं होता है। इसलिए, वे ऐसी पैतृक संपत्ति को वसीयत द्वारा अपने उत्तराधिकारियों या किसी अजनबी बाबे को नहीं दे सकते।
कानून कायदों के अनुसार पुश्तैनी भूमि की रजिस्ट्री के लिए बंटवारा जरूरी होगा। लोग तभी जमीन बेच पायेंगे, जब उनके नाम जमाबंदी होगी। पुश्तैनी भूमि बेचने से पहले या वसीयत करने से पहले पारिवारिक बंटवारा करना पड़ता है, जमीन की दाखिल-खारिज सबके नाम करानी होती हैं। नए प्रावधान में दाखिल-खारिज रसीद पर बेचने वाली जमीन का नया और पुराना खाता, खसरा नंबर जरूरी है। परंतु आज दिनांक तक आलीराजपुर रियासत की संपत्ति का कभी कोई बंटवारा होकर उत्तराधिकारीयो के नाम से दाखिल ख़ारिज नहीं हुआ हैं, अतः सभी उत्तराधिकारीयो की संपत्ति एक अकेले कमलेंद्र सिंह कर ही नहीं सकते थे।
श्रीमंत कमलेंद्र सिंह द्वारा की गई वसीयत की वैधता को चुनौती देने से, कोर्ट जाने से बचने हेतु वसीयत में कमलेंद्र सिंह द्वारा कथित तौर पर निर्देश दिए गए हैं कि इस वसीयत की प्रोबेट नहीं होंगी। यानी कि अदालत में वसीयत की सच्चाई साबित करने की जरूरत नहीं हैं।
कोई वैध वसीयत कर्ता क्या ऐसा लिख सकता हैं?
अगर नहीं तो वसीयत कर्ता अवैध संपत्ति की वसीयत कर रहा था। या फिर उसने वसीयत की ही नहीं है।
और पुश्तैनी संपत्तियों को स्व अर्जित कहने पर, और उसके एकमात्र स्वामी के रूप में पेश करते ही यह अवैध संपत्ति हो गई, जिसकी वसीयत नहीं की जा सकती थी।
या फिर वसीयत कर्ता ने ये फर्जी वसीयत बनाई ही नहीं हैं तो फिर किसने इसे साजिशन बनाया है?
मिताक्षरा सहदायिक संपत्ति में हिंदू के हित को आईएसए की परवाह किए बिना निपटाने योग्य नहीं माना जाता है। सरल शब्दों में, हिंदू की पैतृक संपत्ति वसीयत के माध्यम से नहीं दी जा सकती।
सब रजिस्ट्रार का कार्यालय संपत्ति हस्तांतरित करते समय प्रोबेट या प्रशासन पत्र की मांग कर सकता है, और बैंक अक्सर प्रोबेटेड वसीयत प्रस्तुत करने की मांग करते हैं।
और जिस दिन यह वसीयत प्रोबेट हेतु न्यायालय में पेश हुई, इसकी सच्चाई साबित करने वालों के सभी पाप सामने आ जाएंगे। जाली दस्तावेज़ को अधिकारी द्वारा सही साबित करने की साज़िश का पर्दाफाश हो जाएगा। क्योंकि पूर्ववर्ती स्थानों पर इसने नियम कानून कायदों को धता बताते हुए निर्णय पारित किए हैं वे सब एक एक कर बाहर आ रहें हैं, पचासों आदेश तथ्यात्मक रूप से इसने गलत किए हैं। इस बात को ये जानता भी हैं, पर इसकी भ्रष्टाचार की आदत से ये मजबूर हैं।
महत्वपूर्ण विभाग के इस सबसे भ्रष्ट, घोर स्वार्थी, पनौती, अधिकारी के बताए आइडिया और सहयोग से जागीरा गैंग ने जो आपराधिक साज़िश रची थीं, उनके कानूनी अंजाम के बारे में ये गहरी अनुभूति वाले, संवेदनशील, विश्व विख्यात लेखक ऑस्कर वाइल्ड के विचार को अक्सर याद करता होगा;
“We’re all in the gutter, but some of us are looking up at the stars.”