
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सहमति, विवाह-वादे एवं आपराधिक दायित्व से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रकरण में स्पष्ट किया है कि यदि वयस्कों के बीच दीर्घकालिक प्रेम संबंध एवं सहमति से शारीरिक संबंध स्थापित हुए हों, तो केवल विवाह न हो पाने या वादा पूरा न होने मात्र से उसे आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता। न्यायालय ने विवाह के कथित झूठे प्रलोभन के आधार पर दर्ज आपराधिक प्रकरण में दाखिल चार्जशीट, संज्ञान आदेश तथा संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया।
यह आदेश न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना की एकलपीठ द्वारा अलीगढ़ निवासी जितेंद्र पाल एवं दो अन्य की याचिका पर पारित किया गया। याचिका दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के अंतर्गत प्रस्तुत की गई थी, जिसमें प्राथमिकी एवं आपराधिक कार्यवाही निरस्त करने की प्रार्थना की गई थी।
प्रकरण का विवरण
मामला अलीगढ़ जनपद के गांधी पार्क थाना क्षेत्र में दर्ज हुआ था। प्राथमिकी में पीड़िता ने आरोप लगाया कि याची ने विवाह का झूठा वादा कर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। साथ ही याची के भाई एवं भाभी पर आपराधिक धमकी देने का आरोप भी लगाया गया था।
पुलिस द्वारा जांच उपरांत भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 तथा धारा 351(2) के अंतर्गत आरोपपत्र दिनांक 30 मार्च 2025 को न्यायालय में प्रस्तुत किया गया, जिस पर 22 मई 2025 को संज्ञान लिया गया था।
संबंधों की पृष्ठभूमि
एफआईआर एवं केस डायरी के अनुसार दोनों पक्ष वर्ष 2015-16 से एक-दूसरे को जानते थे तथा कॉलेज काल से ही उनके बीच प्रेम संबंध स्थापित थे। वर्ष 2021 से नवंबर 2024 तक दोनों के बीच सहमति से शारीरिक संबंध बने रहे। संबंध दीर्घकालिक एवं पारस्परिक सहमति पर आधारित पाए गए।
पीड़िता द्वारा जबरन गर्भपात संबंधी आरोप भी लगाए गए थे, किंतु जांच में उनकी पुष्टि न होने से उक्त धारा में आरोपपत्र प्रस्तुत नहीं किया गया।
न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियाँ
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने कहा कि दोनों पक्ष वयस्क एवं शिक्षित हैं तथा संबंध लंबे समय तक सहमति से चला। न्यायालय के अनुसार ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया जिससे यह सिद्ध हो सके कि विवाह का वादा प्रारंभ से ही धोखाधड़ीपूर्ण या दुर्भावनापूर्ण था।
न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का संदर्भ देते हुए कहा कि दीर्घकालिक सहमति आधारित शारीरिक संबंधों को केवल बाद में विवाह न होने के आधार पर आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता।
सहअभियुक्तों पर आरोप असिद्ध
याची के भाई एवं भाभी पर लगाए गए आपराधिक धमकी के आरोपों के समर्थन में कोई स्वतंत्र, प्रत्यक्ष अथवा ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं पाया गया। इस आधार पर न्यायालय ने उनके विरुद्ध कार्यवाही को भी निरस्त कर दिया।
अंतिम आदेश
उपलब्ध साक्ष्यों, विधिक सिद्धांतों एवं न्यायिक दृष्टांतों के परीक्षण के उपरांत न्यायालय ने
दिनांक 30.03.2025 की चार्जशीट,
दिनांक 22.05.2025 का संज्ञान आदेश,
तथा संबंधित आपराधिक मुकदमे की संपूर्ण कार्यवाही
को निरस्त (Quash) कर दिया।
विधिक महत्व
यह निर्णय सहमति, विवाह-वादे एवं आपराधिक अभियोजन से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण मार्गदर्शक सिद्धांत स्थापित करता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि असफल प्रेम संबंधों या अपूर्ण वैवाहिक वादों को आपराधिक रंग देकर दंड विधि का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता।