
संपादकीय विक्रम सेन
गोवा के अर्पोरा में नाइटक्लब “Birch by Romeo Lane” में सिलेंडर ब्लास्ट से लगी आग ने 25 ज़िंदगियाँ निगल लीं।
कहा गया “दुर्भाग्यपूर्ण दुर्घटना।”
लेकिन सच्चाई कहीं ज्यादा भयावह है: यह दुर्घटना नहीं, प्रशासनिक लापरवाही की वैधानिक हत्या है।
भारत में हर वर्ष लगभग 1,10,000 से अधिक अग्निकांड दर्ज होते हैं, जिनमें हजारों जानें जाती हैं और अरबों की संपत्ति जलकर राख हो जाती है। अधिकतर घटनाओं में एक ही पैटर्न सामने आता है;
सुरक्षा मानकों की अनदेखी, प्रशासनिक लापरवाही, भ्रष्ट निरीक्षण प्रणाली और कानूनों की अप्रभावी क्रियान्वयन।
हर नए अग्निकांड के साथ पुरानी आग में हुई जांच की फाइलें, सबक और सुधार हर आग के साथ जलकर राख हो जाते हैं।
मामला केवल आग का नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था का है जो अनुमति तो देती है, लेकिन अनुपालन नहीं देखती।
यही वजह है कि हादसा नया नहीं, पैटर्न पुराना है।
लाइसेंस के नाम पर राजनीति, निरीक्षण के नाम पर रिश्वत और सुरक्षा के नाम पर शून्य।
“लाइसेंस मिल जाना यानि जिम्मेदारी खत्म” की संस्कृति
भारत में बड़े क्लब, मॉल, होटल, फैक्ट्री, पब और बहुमंज़िला इमारतें
कागज़ों पर अग्निशमन मानकों का पालन करती हैं।
वास्तविकता में 90% संस्थान
अग्निशामक यंत्र की सर्विस
आपातकालीन निकास
किचन में गैस सेफ्टी
फायर अलार्म
ड्राई राइज़र और स्प्रिंकलर को गंभीरता से नहीं लेते।
लाइसेंसिंग प्राधिकरण की भूमिका भ्रष्टाचार के कारण
सुरक्षा प्रहरी से “परमिट ट्रेडर” में बदल चुकी है।
और परिणाम?
प्रत्येक हादसे के बाद वही बयान, वही ट्वीट, वही जांच, पर ज़िम्मेदार बच जाते हैं, सिर्फ़ लोग मरते हैं।
अर्पोरा की भयावह घटना : चेतावनी नहीं, सबक है
सीएम प्रमोद सावंत ने प्राथमिक जांच में माना कि क्लब ने फायर सेफ्टी नियमों का पालन नहीं किया था और इसके बावजूद उसे संचालन की अनुमति मिली।
अर्थ साफ है;
मुनाफ़ा सुरक्षा पर जीत गया,
और रात दहशत में बदल गई।
इससे पहले भी, इतिहास में आग लगने के भयानक उदाहरण दर्ज हैं;
1984 दिल्ली, उपहार सिनेमा 59 आपातकालीन गेटों का ताला, फायर सिस्टम बंद,
2016 मुंबई, वन अबव पब 14 अवैध निर्माण, अग्नि सुरक्षा की अनदेखी,
2017 राजस्थान, सरदारशहर पैट्रोल पंप 8 गैस वेपर विस्फोट,
2019 सूरत कोचिंग सेंटर 22 छात्र लकड़ी की सीढ़ी, फायर सेफ्टी पूर्णतः अनुपस्थित,
2022 मोर्ली, गुजरात हॉस्पिटल 8 मरीज ICU में शॉर्ट सर्किट, फायर कंट्रोल नहीं,
2023 हिसार, नगर नाइट क्लब 11 गैस पाइपलाइन लीक और ब्लास्ट।
इन हादसों पर नज़र डाले तो लगता हैं हर बार आग लगी नहीं,
नीति, निगरानी और जिम्मेदारी जलती रही।
असली सवाल यह है कि
अर्पोरा में
फायर ब्रिगेड तुरंत आई या नहीं
धमाका कितना बड़ा था
राहत कितनी तेजी से हुई?
यह आज का मुद्दा है,
कल का मुद्दा यह होना चाहिए:
क्लब बिना सुरक्षित निकासी और ऑपरेशनल फायर अलर्ट सिस्टम के खुला कैसे?
और असली अपराधी कौन है;
क्लब मालिक?
निगरानी अधिकारी?
या वह भ्रष्ट प्रणाली जो निरीक्षण को औपचारिकता मानती है?
वास्तव में समाधान कागज़ी नहीं, ज़मीनी होना चाहिए
यदि इस बार भी जांच और मुआवजे पर कहानी समाप्त हो गई तो अगली आग आने में देर नहीं लगेगी।
आवश्यक है;
राष्ट्रीय स्तर पर “अग्नि सुरक्षा अनुपालन ऑडिट”
लाइसेंस जारी करने वाले अधिकारियों की आपराधिक ज़िम्मेदारी
हर 6 महीने अनिवार्य फायर ड्रिल और निरीक्षण
क्लब / मॉल / होटल के लिए पब्लिक सेफ्टी रेटिंग सिस्टम
उल्लंघन पर सील + गिरफ्तारी, न कि जुर्माना भरकर पुनः संचालन
सुरक्षा की कीमत मौतें नहीं हो सकतीं।
अर्पोरा में मारे गए 25 लोग बदकिस्मत नहीं थे
वे ऐसे सिस्टम के शिकार थे, जिसमें अनुमति बिकती है और सुरक्षा बिखर जाती है।
अगर इस हादसे से भी देश ने नहीं सीखा,
तो याद रहे आग फिर लगेगी, जगह बदलेगी, लोग बदलेंगे…
लेकिन ज़िम्मेदार वही रहेंगे।