
विक्रम सेन की विशेष रिपोर्ट
नई दिल्ली । भारत ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव में झुकने वाला नहीं है। आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च मानते हुए केंद्र सरकार की नीतियां आज विश्व मंच पर भारत को दृढ़, निर्णायक और सम्मानजनक स्थिति में स्थापित कर रही हैं।
व्यापार में दबाव की राजनीति पर भारत का दो-टूक रुख
बर्लिन में आयोजित Berlin Global Dialogue के मंच से केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने बेबाकी से कहा कि “कनपटी पर बंदूक तानकर कोई सौदा नहीं करा सकता।”
उन्होंने साफ शब्दों में स्पष्ट किया कि भारत किसी भी व्यापारिक समझौते में जल्दबाज़ी नहीं करेगा और दबाव में कोई डील साइन नहीं करेगा। गोयल ने यूरोपीय देशों के दोहरे रवैये की आलोचना करते हुए कहा कि भारत किसी तीसरे देश से अपने संबंधों को लेकर कोई बाहरी शर्त नहीं मानेगा — चाहे वह रूस ही क्यों न हो।
भारत ने ऊर्जा सुरक्षा के मामले में भी अपनी नीति पर अडिग रहते हुए यह स्पष्ट किया कि सस्ते तेल की खरीद कोई राजनीतिक कदम नहीं बल्कि 1.4 अरब भारतीयों की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने की प्रतिबद्धता है।
भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की वार्ताओं में भी भारत ने यह सुनिश्चित किया है कि किसी भी ऐसे कर या नीति को स्वीकार नहीं किया जाएगा जो भारतीय उद्योगों के लिए असमान प्रतिस्पर्धा का वातावरण तैयार करे।
संयुक्त राष्ट्र में भारत की सशक्त आवाज़
संयुक्त राष्ट्र की 80वीं वर्षगांठ पर विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने तीखा और सार्थक संदेश देते हुए कहा कि “संयुक्त राष्ट्र के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है।”
उन्होंने वैश्विक संस्थाओं में सुधार की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि वर्तमान प्रणाली दुनिया की वास्तविक आकांक्षाओं को नहीं दर्शाती।
भारत का यह रुख न केवल विकासशील देशों के हितों की रक्षा करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि भारत अब वैश्विक व्यवस्था के ‘सुधारक और संतुलनकारी शक्ति’ के रूप में उभर रहा है।
दक्षिण एशिया में भारत की रणनीतिक गूंज — पाकिस्तान की जल संकट पर नई चुनौती
भारत के सिंधु जल समझौते पर पुनर्विचार के बाद अब अफगानिस्तान ने भी पाकिस्तान को कड़ा संदेश दे दिया है।
तालिबान सरकार ने घोषणा की है कि वह कुनार नदी पर बड़े बांधों का निर्माण कर अपने जल संसाधनों का उपयोग स्वयं करेगी — और पाकिस्तान को अब ‘दूसरों के संसाधनों पर निर्भर रहने की आदत’ छोड़नी होगी।
तालिबान के इस निर्णय से पाकिस्तान के कृषि और ऊर्जा क्षेत्र में गंभीर संकट की आशंका है। यह कदम भारत की उस नीति के अनुरूप माना जा रहा है जिसमें पड़ोसी देशों को आत्मनिर्भरता के मार्ग पर प्रोत्साहित करते हुए आतंक समर्थक नीतियों के खिलाफ स्वाभाविक दबाव उत्पन्न किया जा रहा है।
भारत की वैश्विक नीति का मूल संदेश: “भारत सौदे नहीं, सहयोग चाहता है। भारत दबाव में नहीं, विश्वास पर चलता है।”
भारत का यह दृष्टिकोण स्पष्ट कर रहा है कि आज का भारत आत्मनिर्भरता के युग में प्रवेश कर चुका है — जहाँ कूटनीति राष्ट्रहित के आधार पर तय होती है, न कि किसी विदेशी दबाव पर।
आर्थिक, ऊर्जा और रणनीतिक मोर्चे पर दृढ़ता से आगे बढ़ता भारत आज वैश्विक शक्ति-संतुलन में निर्णायक भूमिका निभा रहा है।
भारत की ‘ट्रेड पॉलिसी’ अब संप्रभुता पर आधारित — दबाव या लॉबी पर नहीं।
संयुक्त राष्ट्र सुधार की मांग भारत की वैश्विक नेतृत्व क्षमता को रेखांकित करती है।
दक्षिण एशिया में जल-संतुलन और आतंकवाद विरोधी नीति भारत के दीर्घकालिक रणनीतिक दृष्टिकोण का हिस्सा है।