
जयपुर। पति-पत्नी के बीच लगातार मुकदमेबाजी और अभित्यजन के आधार पर अदालत ने 1994 का विवाह विघटित करने की अनुमति दी। जयपुर पारिवारिक न्यायालय संख्या प्रथम की अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए वैवाहिक विवाद मामले में पति से लगातार अलग रहने अभित्यजन (डेज़र्शन) और एक दर्जन से अधिक मुकदमे दर्ज करने को क्रूरता मानते हुए 32 साल पुराने विवाह को समाप्त घोषित किया।
पारिवारिक न्यायालय की जज आरती भारद्वाज ने अपने फैसले में कहा कि पति-पत्नी पिछले करीब आठ साल से अलग रह रहे थे। अक्टूबर 2017 के बाद उनके साथ रहने का कोई विश्वसनीय प्रमाण भी प्रस्तुत नहीं किया गया। पत्नी ने भी लंबे समय से अलग रहने की बात स्वीकार की, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि वैवाहिक संबंध बनाए रखने की वास्तविक इच्छा का अभाव था।
पत्नी ने 9 से अधिक मुकदमे दर्ज कराए
अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और साक्ष्यों के आधार पर 29 अप्रैल 1994 को संपन्न विवाह को विघटित करते हुए पति की ओर से दायर विवाह विच्छेद याचिका स्वीकार की। अदालत में सुनवाई के दौरान पति की ओर से अधिवक्ता डॉ डीएस शेखावत ने बताया कि पत्नी ने समय-समय पर पति के विरुद्ध करीब 9 आपराधिक और दीवानी मुकदमे दर्ज कराए इससे पारिवारिक संबंध अत्यंत तनावपूर्ण और कटु हो गए। अधिवक्ता ने कहा कि विवाह के शुरुआती समय के बाद से ही वैवाहिक संबंधों में लगातार तनाव बना रहा। समय के साथ पत्नी का व्यवहार पति के प्रति अत्यंत कठोर एवं असहयोगात्मक होता चला गया।
पति ने पैतृक संपत्ति में से हिस्सा दिया
अधिवक्ता डीएस शेखावत ने बताया कि सवाई माधोपुर निवासी युवक और मुंबई की रहने वाली युवती की शादी साल 1994 में हुई थी। पति के अनुसार पत्नी शादी के कुछ माह बाद ही अपने मायके मुंबई चली गई। वहां से वापस आने के बाद माता-पिता से अलग रहने का दवाब बनाने लगी। इसके बाद पति, पत्नी को लेकर जयपुर आ गया।
यहां साल 2005 में खुद का मकान भी ले लिया। लेकिन, पत्नी लगातार पारिवारिक संपत्ति में से हिस्सा लेने का दबाव बनाती। बात नहीं मानने पर दोनों बच्चों को जहर देकर आत्महत्या करने की धमकी देती। विवश होकर पति ने अपनी पैतृक संपत्ति के दो मकान की पावर ऑफ अटॉर्नी पत्नी के नाम कर दी। इसमें से पत्नी ने एक प्लॉट अपनी बहन को दे दिया।
पति को मानसिक तनाव और आर्थिक नुकसान
अदालत में पति ने भी कहा कि पत्नी ने कई अवसरों पर बिना पर्याप्त आधार के उसके विरुद्ध आपराधिक एवं दीवानी मुकदमे दर्ज कराए, जिनकी संख्या लगभग 9 से अधिक थी। इन मुकदमों और आरोपों के कारण उसे मानसिक तनाव, सामाजिक बदनामी तथा आर्थिक हानि का सामना करना पड़ा, जिसे उसने मानसिक क्रूरता बताया।
दोनों के बीच संबंध सुधरने के आसार नहीं
अदालत ने भी कहा कि विवाह केवल कानूनी औपचारिकता नहीं, बल्कि आपसी विश्वास, सम्मान और साथ रहने की इच्छा पर आधारित सामाजिक संस्था है। जब दोनों पक्ष लंबे समय तक अलग अलग रहते हैं, लगातार विवाद और मुकदमेबाजी चलती रहती है तथा संबंध सुधारने की कोई वास्तविक संभावना नहीं रहती, तो ऐसे विवाह को केवल औपचारिक रूप से बनाए रखना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
पति की याचिका मंजूर करते हुए विवाह विच्छेद
अदालत ने माना कि पत्नी के व्यवहार, लंबे समय तक अलगाव, लगातार मुकदमेबाजी तथा वैवाहिक संबंध बनाए रखने की इच्छा के अभाव से क्रूरता और अभित्यजन दोनों ही आधार सिद्ध होते हैं। इन परिस्थितियों में पति द्वारा दायर विवाह विच्छेद की याचिका स्वीकार करना न्यायोचित है। अदालत ने इस आधार पर 29 अप्रैल 1994 को संपन्न विवाह को विघटित घोषित करते हुए विवाह विच्छेद की डिक्री पारित कर दी और कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों से यह स्पष्ट है कि वैवाहिक संबंध लंबे समय से समाप्त हो चुके हैं तथा उनके पुनर्स्थापन की कोई वास्तविक संभावना शेष नहीं बची।
