
नई दिल्ली। त्योहारों के दौरान हवाई किरायों में बेतहाशा बढ़ोतरी पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को चिंता व्यक्त की। अदालत ने कहा कि वह किरायों में अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव के मामले में दखल देगा। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने एयरलाइंस द्वारा हवाई किरायों में बेतहाशा बढ़ोतरी को शोषण करार दिया और एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार और नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) से जवाब दाखिल करने को कहा।
इसे यात्रियों का शोषण बताया
इस जनहित याचिका में भारत में निजी एयरलाइनों द्वारा लागू किए जाने वाले हवाई किरायों और अन्य शुल्कों में अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए बाध्यकारी नियामक दिशा-निर्देशों की मांग की गई। पीठ ने केंद्र की ओर से पेश एडिशनल सालिसिटर जनरल अनिल कौशिक से कहा कि हम निश्चित रूप से दखल देंगे। कुंभ और अन्य त्योहारों के दौरान यात्रियों का जो शोषण हुआ है, उसे देखिए। दिल्ली से प्रयागराज और जोधपुर के किराये देखिए।
अगली सुनवाई 23 फरवरी को होगी
जस्टिस मेहता ने हल्के-फुल्के अंदाज में अदालत कक्ष में मौजूद सालिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि हो सकता है कि अहमदाबाद के लिए हवाई किराए न बढ़े हों, लेकिन जोधपुर जैसी दूसरी जगहों के लिए किराये बहुत बढ़ गए हैं। केंद्र की ओर से जवाब दाखिल करने के लिए कौशिक द्वारा समय मांगे जाने के बाद शीर्ष अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 23 फरवरी को तय की है।
स्वतंत्र और मजबूत नियामक की जरूरत
यह मामला सामाजिक कार्यकर्ता एस लक्ष्मीनारायणन ने जनहित याचिका दायर करके उठाया है। इसमें नागरिक उड्डयन क्षेत्र के लिए एक मजबूत और स्वतंत्र नियामक स्थापित करने की मांग की गई। याचिका में कहा गया कि एयरलाइंस कंपनियां पारदर्शिता के बिना किराया तय कर रही हैं और यात्रियों के हितों की अनदेखी हो रही। याचिकाकर्ता का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में यात्रियों की सुरक्षा और अधिकारों की प्रभावी निगरानी नहीं हो पा रही है।
मुफ्त बैगेज भत्ते में कटौती पर सवाल
याचिका में यह मुद्दा भी उठाया गया है कि एयरलाइंस ने बिना ठोस कारण के इकोनॉमी क्लास यात्रियों के लिए मुफ्त चेक-इन बैगेज की सीमा 25 किलोग्राम से घटाकर 15 किलोग्राम कर दी। जो सुविधा पहले टिकट का हिस्सा थी, उसे अब अतिरिक्त कमाई का जरिया बना दिया गया। केवल एक बैग की अनुमति और अतिरिक्त शुल्क ने यात्रियों की परेशानियां और बढ़ाई हैं।
मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप
याचिका के अनुसार, एयरलाइंस का अपारदर्शी और शोषणकारी रवैया, जिसमें मनमानी किराया बढ़ोतरी, सेवाओं में एकतरफा कटौती और प्रभावी शिकायत निवारण की कमी शामिल है, नागरिकों के समानता, स्वतंत्र आवाजाही और गरिमापूर्ण जीवन के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। खासकर त्योहारों और मौसम खराब होने की स्थिति में गरीब और मजबूरी में यात्रा करने वाले यात्रियों को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ता है।
किराया नियंत्रण के लिए नियम बनाने की मांग
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष यह मांग भी रखी गई है कि हवाई किराए पर निगरानी रखने और मांग के नाम पर मनमाने दाम बढ़ाने से रोकने के लिए स्पष्ट और बाध्यकारी नियम बनाए जाएं. अदालत की टिप्पणी से यह साफ है कि आने वाले समय में विमानन कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति पर सख्त नजर रखी जा सकती है।
