

हिमालयी राज्य उत्तराखंड अपनी रजत जयंती मना रहा है। 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड के लोगों में जहां राज्य के बलिदानियों के लिए भावपूर्ण यादें थीं वहीं आंखों में सपने थे। यह एक राज्य का मिल जाना भर का उत्साह नहीं था। इसके पीछे कुछ दशक नहीं बल्कि सदियों की कसक थी। कठिन चुनौतियों के बीच कुहासा छंटने की उम्मीद में लोगों ने अपने नए राज्य का स्वागत किया था। उत्साह और करतल ध्वनि के बीच संदेश यही था कि अलग उत्तराखंड अपने संसाधनों के अनुरूप विकास करेगा और यह स्वाभाविक भी था।
जब उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने का आंदोलन चला, तो यही कहा जाता था कि नया राज्य अपने संसाधनों पर विकास करेगा। उत्तराखंड आंदोलन की यादों में रह रहकर वह दृश्य नजर आता है, जिसमें दिल्ली के जंतर मंतर में छोटे छोटे बच्चे हाथों में तख्तियां लिए दिखे थे। कोदा झंगोरा खाएंगे उत्तराखंड राज्य बनाएंगे। यह चित्र उस स्वयंस्फूर्त आंदोलन का एक प्रतीक चित्र की तरह था। उत्तराखंड जिसे शुरू में उत्तरांचल नाम दिया गया था, वहां के लोग किसी नए सवेरे के साथ राज्य प्राप्ति का उद्घोष कर रहे थे। तब पच्चीस साल का यह सफर कुछ पलट कर देखने के लिए प्रेरित करता है। हम उन लक्ष्यों को कितना हासिल कर सके। लेकिन, क्या हमारे सरोकार या विकास की प्रक्रिया आंखों की नमी को किसी हद तक दूर कर पाई है। सियासत की एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है कि जो सत्ता में है, वो अपनी उपलब्धियों को बखान करता है। विपक्ष का सत्ता की कमियों को निशाना बनाना भी स्वाभाविक है। आंकड़े भी अपनी तस्वीर दिखाते हैं। लेकिन, आंकड़ों की बहस भी कई बार यथार्थ को सामने नहीं ला पाती। यही वजह है कि कई बार चमकते आंकड़ों से व्यक्ति थाह नहीं ले पाता और ठीक इसके विपरीत कई बार आंकड़े फैलाई गई व्याप्त निराशा को ध्वस्त करते नजर आते हैं।
उत्तराखंड के संदर्भ में कहें, तो यहां राजनीतिक अनिश्चितता बनी रही। उत्तराखंड में 25 साल के इस सफर में दस लोग सीएम की कुर्सी पर बैठे। इसलिए जब उत्तराखंड की अपेक्षाओं की बात होती है, तो बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही जवाबदेही बनते हैं। जहां राज्य की अपनी उपलब्धियों की बात है, तो निश्चित है कि दोनों सियासी दल उसका श्रेय अपनी अपनी तरह से लेना चाहेंगे। यह जरूर है कि लगातार दो बार चुनाव जीतने और वर्तमान में सत्ता में होने के कारण अलग अलग संदर्भों में बीजेपी से ज्यादा अपेक्षा और सवाल होना स्वाभाविक है। उत्तराखंड आंदोलन के समय यह सवाल भी उठता था कि आखिर इस पहाड़ी राज्य के पास आखिर है क्या। राज्य बन तो जाएगा, लेकिन इसे संभालने में कई तरह की दिक्कत आएगी।
इसके अपने संसाधन बहुत कम है। इसका वित्तीय आधार डगमगाएगा। लेकिन, इन दलीलों को नकारते हुए राज्य की कल्पना करने वाले कहा करते थे कि राज्य बनने पर यह आदर्श राज्य होगा। पर्यटन, बिजली, पानी, वन यहां का आधार होगा। य़ूपी जैसे बड़े राज्य का एक पर्वतीय इलाका भर रह जाने से इसकी जो उपेक्षा हुई, उससे हटकर यह राज्य अपने हौसले की उड़ान भरेगा। उत्तराखंड जिन पगडंडियों से होता हुआ आज अपनी रजत जयंती मना रहा है उसमें उपलब्धियों को मापने का आधार आर्थिक विकास भी होता है। साथ ही समाज संस्कृति और परंपरा भाषा स्तर पर आकलन भी होता है। लेकिन, यह भी देखा जाता है कि हमारे सामने तब जो चुनौतियां थीं उनसे किस स्तर पर समाधान कर पाए हैं। साथ ही यह भी देखा जाता है कि आज के समय हमारे सामने नई चुनौतियां क्या हैं।
चलताऊ मुहावरों में यह कहना गलत होगा कि कुछ हुआ ही नहीं। ज्यादा दूर न जाएं तो नब्बे के उत्तराखंड में और आज के उत्तराखंड की बीच के अंदर की कुछ चीजें साफ स्पष्ट नजर आती है। बेहतर होती सड़क, हवाई सेवा का विस्तार, पहाड़ों तक रेल पहुंचाने का तेजी से होता उपक्रम, लोगों का अपने स्तर पर छोटा मध्यम कारोबार शुरू करना, होमस्टे योजना को बढ़ावा, पर्यटकों का तेजी से उमड़ना, गांव में नल-जल की सुविधा, पीएम आवास योजना राज्य में निवेश का आना इसके सकारात्मक पहलू हैं। नीति आयोग के एसडीजी रैंकिंग में पहला स्थान उत्तराखंड ने पाया है। वर्ष 2024 -25 के आंकड़ों को आधार माने तो प्रति व्यक्ति आय में पिछले दो वर्षों में 26% बढोतरी हुई है। निवेशकों का भी कुछ रुझान दिखा है। राज्य में पांच हजार से ज्यादा होम स्टे का पंजीकरण हुआ। राज्य की जीडीपी बढ़ी है। केंद्र के दो लाख करोड़ के प्रोजेक्ट चल रहे हैं। बीजेपी सरकार दावा करती है कि राज्य में नकल रोकने के लिए वह देश का सबसे कड़ा कानून लेकर आई है। देहरादून में सैन्य धाम का बनना, तीर्थ धामों का विकास, सड़क सेवाओं का विस्तार, केदारनाथ में रोपवे लगाने की योजना राज्य के विकास के उजले पक्ष के साथ है।
कांग्रेस अपने समय की उपलब्धियों का चार्ट सामने रखती हैं। कांग्रेस कहती है कि उसने राज्य की पहली चुनी सरकार के समय विकास का एक आधार खड़ा कर दिया था। और निश्चित विकास के इस सोपान में कांग्रेस के भी अपने काम है। शायद ही बीती शताब्दी के आखिरी वर्षों में भी किसी ने कल्पना की होगी कि कभी रेल पटरियों पर ऋषिकेश से चलकर कर्णप्रयाग तक पहुंचेगे। बदले उत्तराखंड में आज अपनी संस्कृति खान पान की शैली को उत्साह से बताया ही नहीं जाता बल्कि अपनाया भी जा रहा है। कुछ स्टार्ट अप भी शुरू हुए। जहां राज्य की बदली हुई छवि दिखती हैं वहीं कुछ चुनौतियां भी दिखती है। कुछ समस्याएं नए सिरे से सामने खड़ी हुई। कुछ नए दंश भी नजर आते हैं। समर्थ भू-कानून को लेकर आवाज उठ रही है। बेशक 1950 का दायरा शायद संभव न हो, लेकिन राज्य की स्थापना को आधार तो बनाया ही जा सकता है। बार बार आती आपदाएं डराती हैं। बेहतर आपदा प्रबंध तंत्र हमारी प्राथमिकता में होना चाहिए था। इस हिमालयी क्षेत्र में जापान स्वीटजरलैंड या नार्वे की तरह सिस्टम खड़ा नहीं कर पाए हैं। कानून व्यवस्था में भी कुछ बड़े झोल दिखे हैं। और लोगों को इसके खिलाफ सड़क पर आने के लिए मजबूर होना पड़ा है।
जिस विकास की हम बात करते हैं उसकी सुदूर ग्रामीण इलाकों तक पहुंच होनी चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में विकास की दरकार बनी हुई है। जिसे विकास कहा जा रहा है वह घूम फिर कर तीन जिलों तक सिमट कर रह जाता है। पहाड़ों में सीमांत इलाके आज भी चिकित्सा आधुनिक शिक्षा के लिए बाट जोह रहे हैं। ग्रामीण इलाकों कस्बों से में सामान्य इलाज के लिए भी लोगों को देहरादून आना पड़ता है। जंगली जानवरों का संकट बढ़ा है। अकेले 2025 में भालुओं के 90 हमलों की रिपोर्ट है। गुलदार का आतंक भी बढा है। बंदर खेत खलियानों को नुकसान पहुंचाते हैं। मैदानी क्षेत्रों और पहाड़ के बीच एक बड़ा अंतर साफ झलकता है। राज्य से पलायन भी थमा नहीं है। बेशक कुछ लोगों ने अपने स्तर पर गांव को संवारने का रुझान दिखाया। लेकिन, उत्तराखंड में गांव से मैदानी क्षेत्रों में होता पलायन कई गलत अंदेशों के साथ है। पेपर लीक का मामले जिस तरह उठते रहे हैं, उसमें सरकार केवल यह कहकर संतुष्ट नहीं हो सकती कि इसमें लिप्त लोगों को पकड़ा जा रहा है। इस पूरे सिस्टम पर नकेल डालनी होगी। युवाओं को रोजगार की दरकार है। रोजगार के अभाव ही पलायन का कारण बनता है। रिवर्स पलायन की कल्पना अभी पूरी तरह साकार नहीं हुई है। आंकड़े भले बेहद रंगीन हों, पर युवाओं को रोजगार चाहिए।
उत्तराखंड बनने के बाद जनप्रतिनिधियों और राज्य की जनता के बीच संवादहीनता की स्थिति देखी गई है। आशय यही है कि उत्तराखंड राज्य में स्थितियां बदली है। लेकिन, लोग जिस तरह अपेक्षा करते हैं उसमें वह महसूस करते हैं कि हालात इससे भी बेहतर हो सकते थे। आंदोलन की आंच में नए राज्य में राजनीति में जिस शुचिता की लोग अपेक्षा कर रहे थे, उसमें हताशा के स्वर भी उभरते दिखे हैं। सवाल उत्तराखंड की आबोहवा जमीन और खुशबू को बचाने का भी है। इसे लपलपाती नजरों से भी बचाना है। प्रकृति उत्तराखंड की असली धरोहर है। राज्य बनने के साथ ही देहरादून को अस्थाई राजधानी बनाकर भविष्य में गैरसैंण को राज्य की राजधानी बनाने की बात अब पहली की तरह उलझी हुई है। वही विस्तार पाती राजधानी देहरादून की खूबसूरती मिट रही है। ऐसे तमाम सवालों के बीच उत्तराखंड को अब आगे का सफर शुरू करना है।
