
भोपाल। वॉटर ऑडिट, सीएजी, एडीबी और इंदौर नगर निगम की रिपोर्ट्स के आधार पर दो सप्ताह की गहन पड़ताल के बाद यह तथ्य सामने आया कि कैसे स्वच्छ पानी जैसी मूलभूत जरूरत नगर निगम और सरकार की लापरवाही की भेंट चढ़ गई। इससे 24 लोगों की जान चली गई और सैकड़ों लोग बीमार हुए। प्रदेश के ग्राउंडवाटर की स्थिति की सच्चाई बताती है कि असलियत क्या है! पड़ताल में कई ऐसे चौंकाने वाले तथ्य सामने आए, जो बताते हैं कि सतह से जो दिखाई दे रहा सच्चाई उसके विपरीत है।
मध्य प्रदेश में भूजल में नाइट्रेट का स्तर खतरनाक सीमा तक पहुंच गया। केंद्र सरकार की रिपोर्ट में राज्य को यूपी के बाद दूसरा सबसे प्रभावित राज्य बताया गया है। राज्य के 55 में से 39 जिलों में पीने का पानी असुरक्षित पाया गया है। नाइट्रेट युक्त पानी शिशुओं और बच्चों के लिए बेहद खतरनाक माना जाता है।
175 जगहों पर जहरीले केमिकल ज्यादा मिले
जुलाई 2025 में जारी ‘ग्राउंड वॉटर क्वालिटी ईयरबुक: मध्य प्रदेश (2024-2025)’ रिपोर्ट के अनुसार, राज्य भर में 614 जगहों पर प्री-मानसून सैंपल लिए गए थे। इनमें से 175 जगहों पर विभिन्न जहरीले केमिकल बहुत ज्यादा पाए गए। नाइट्रेट, यूरेनियम, आयरन, फ्लोराइड जैसे केमिकल बीआईएस के मानकों से काफी ज्यादा थे। इसका मुख्य कारण है औद्योगिक कचरा, अनट्रीटेड मानव अपशिष्ट और उर्वरकों का अत्यधिक इस्तेमाल। इनकी मात्रा ज्यादा होने से किडनी, बाल झड़ना, डायबिटीज, कैंसर (कोलन, ब्लैडर, किडनी) जैसी बीमारी हो सकती है। इससे बच्चों के विकास पर भी गहरा बुरा असर पड़ सकता है।
कहां-कहां का पानी दूषित मिला
सर्वे के दौरान नीमच के कुकड़ेश्वर और सीधी के सपानी दुवारी में नाइट्रेट बहुत ज्यादा मिली। वही शिवपुरी के सिकंदरा में यूरेनियम की मात्रा ज्यादा थी। सागर के रेहपुरा और जरुआखेड़ा में आयरन ज्यादा पाया गया। सीनी के अरी और गोरखपुर कला में फ्लोराइड के स्तर बहुत ऊंचे थे।
केंद्र सरकार ग्राउंड वाटर रिचार्ज के लिए हजारों करोड़ रुपए विभिन्न योजनाओं के तहत राज्य सरकार को भेज रही है। लेकिन, भ्रष्टाचार की वजह से सब कागजों पर ही सिमट गया। असल में तालाब-कुएं सिर्फ काग़ज़ों पर ही बने। जैसे हाल ही में खंडवा में वाटर कंजर्वेशन प्रोजेक्ट के नाम पर ‘एआई’ से बनी फेक इमेजेस अपलोड करके जिला प्रशासन ने नेशनल अवॉर्ड तक जीत लिया।
समस्या सही प्रबंधन और गुणवत्ता की
मध्य प्रदेश एक कृषि प्रधान राज्य है, यहां कई नदियां हैं जो ग्राउंडवाटर को रिचार्ज करती हैं। लेकिन, इंडस्ट्रियल और मानव कचरे से पानी लगातार गंदा होता जा रहा है। प्रदेश में पानी की कमी नहीं है, समस्या है सही प्रबंधन और गुणवत्ता की। राज्य सरकार को अब सीवेज और इंडस्ट्रियल वेस्ट को ठीक से ट्रीट करने की पुख्ता व्यवस्था करनी चाहिए। फर्टिलाइजर के इस्तेमाल पर सख्त निगरानी रखनी चाहिए और मॉनिटरिंग डेटा पर असली फॉलो-अप करना चाहिए। वरना अगली पीढ़ी के लिए ये ग्राउंडवाटर जहर बन जाएगा।
