
इंदौर। देश में स्वच्छता में नंबर वन शहर इंदौर अब एक ऐसे निर्माण को लेकर चर्चा में है, जिसे जानकार ‘शहर का पहला यूजलेस ब्रिज’ करार दे रहे हैं। एलआईजी से भंवरकुआं तक बनने वाले इस 9.7 किलोमीटर लंबे एलिवेटेड कॉरिडोर का मामला अब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की दहलीज तक जा पहुंचा है। शहर के वरिष्ठ स्ट्रक्चरल इंजीनियर और प्लानर अतुल सेठ ने जनहित में एक याचिका दायर कर इस प्रोजेक्ट पर तुरंत रोक लगाने की मांग की है।
इसलिए खड़ा हुआ विवाद
इस प्रोजेक्ट की नींव साल 2018 में पड़ी थी, जब पूर्व सांसद सुमित्रा महाजन की पहल पर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने 250 करोड़ रुपए स्वीकृत किए थे। लेकिन, समय के साथ इसकी लागत बढ़कर अब 650 करोड़ रुपए के पार जा चुकी। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इतना भारी-भरकम निवेश करने के बावजूद शहर को इसका फायदा न के बराबर मिलेगा।
खामियां जो याचिका में गिनाई
– कम उपयोगिता : सर्वे के मुताबिक, इस लंबे ब्रिज की उपयोगिता महज 18.1% आंकी गई है। यानी अरबों रुपए खर्च करने के बाद भी ट्रैफिक का एक बड़ा हिस्सा नीचे की सड़कों पर ही फंसा रहेगा।
– बेहतर विकल्प मौजूद : इंजीनियर सेठ का कहना है कि 9.7 किमी का एक लंबा ब्रिज बनाने के बजाय यदि चुनिंदा चौराहों पर छोटे-छोटे फ्लाइओवर बनाए जाएं, तो कुल निर्माण सिर्फ 4 किमी का होगा और उपयोगिता बढ़कर 42% हो जाएगी।
– अतिरिक्त आर्थिक बोझ : 650 करोड़ की निर्माण लागत के अलावा, बिजली, पानी और ड्रेनेज लाइनों को शिफ्ट करने में ही करीब 225 करोड़ रुपए का अतिरिक्त खर्च आएगा।
– समय और असुविधा : एलिवेटेड ब्रिज को बनने में कम से कम 5 साल लगेंगे, जिससे शहर की लाइफलाइन माने जाने वाली सड़क पर जनता को नरक जैसी स्थिति झेलनी पड़ेगी। वहीं, छोटे ब्रिज ढाई साल में तैयार हो सकते हैं।
सर्वे में भी उठी थीं उंगलियां
हैरानी की बात यह है कि इंदौर विकास प्राधिकरण (आईडीए) ने इस संबंध में जो शुरुआती सर्वे कराए, उनमें भी इसकी उपयोगिता मात्र 3% से 8% के बीच बताई गई थी। उस वक्त जिला प्रशासन ने इसे व्यावहारिक न मानकर निरस्त भी कर दिया था और नए सिरे से सर्वे के लिए 72 लाख रुपए खर्च किए थे। बावजूद इसके, अब दोबारा उसी पुराने और ‘अनुपयोगी’ प्रोजेक्ट को अमलीजामा पहनाने की तैयारी है।
पर्यावरण और ट्रैफिक पर असर
याचिका में स्पष्ट किया गया है कि एलिवेटेड ब्रिज के भारी-भरकम पिलर और रोटरी के कारण सड़कों की चौड़ाई कम हो जाएगी, जिससे ट्रैफिक जाम की समस्या और बढ़ेगी। इसके विपरीत, टुकड़ों में बनने वाले ब्रिज पर्यावरण के लिहाज से भी सुरक्षित होंगे और उनसे निर्माण के दौरान यातायात बाधित नहीं होगा। अब शहर की नजरें हाईकोर्ट के फैसले पर टिकी हैं कि क्या विकास के नाम पर हो रहे इस भारी निवेश को हरी झंडी मिलती है या फिर इंजीनियरों के ‘प्लान बी’ पर विचार किया जाता है।