
भोपाल। पिछला विधानसभा चुनाव जीतने के लिए भाजपा सरकार ने जो ‘लाडली बहना योजना’ शुरू की गई उसने सरकार तो बनवा दी, मगर हर महीने अब 1836 करोड़ रुपए की राशि खातों में जमा कराना पड़ती है। इसके चलते शासन की वित्तीय स्थिति खस्ता है और लगातार लोन लेना पड़ रहा है। अब 1200 रुपए के बजाय 1500 रुपए की राशि लाडली बहनों को दी जा रही है।
लाड़लियों का आंकड़ा घटा
मध्यप्रदेश में भी जून-2023 से यह योजना शुरू की गई और हजार रुपए की किश्त लाडली बहनों के खातों में जमा होना शुरू हुई। उसके बाद मोहन सरकार ने योजना की राशि 1250 रुपए की और उसके बाद फिर अभी दीपावली से 1500 रुपए कर दिए गए। यह योजना जब शुरू हुई तब 1 करोड़ 31 लाख लाडली बहनों के खातों में राशि जमा हो रही थी, जो अब 1 करोड़ 26 लाख हो गई है।
ब्याज पर ही 27000 करोड़ खर्च
22 साल पहले 2003 में कांग्रेस शासन में मध्यप्रदेश पर कर्ज मात्र 20,000 करोड़ रुपये था। आज सिर्फ ब्याज चुकाने में ही सरकार को सालाना 27,000 करोड़ रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं। 2026-27 के वित्तीय वर्ष में इस योजना का खर्च 22,680 करोड़ रुपए पहुंचने का अनुमान है। लाखों बहनों के लिए यह पैसा रसोई, दवा और बच्चों की पढ़ाई का संबल तो है, लेकिन सवाल वही खड़ा है ‘पैसा कहां से आएगा?’ क्या कर्ज लेकर किया गया यह वादा स्थायी है, या भविष्य में राज्य को इसकी कोई बड़ी आर्थिक कीमत चुकानी होगी?
लाडलियों का पंजीयन फिलहाल बंद
पिछले एक साल में एक लाख लाडली बहनें घट भी गई और नई लाडली बहनें नहीं जुड़ सकी। क्योंकि, इसका पंजीयन ही फिलहाल बंद है। मध्यप्रदेश की तरह अन्य राज्यों ने भी इसी तरह की योजनाएं चुनाव जीतने के लिए शुरू कर दी। अभी बिहार चुनाव में ही 10-10 हजार रुपए की राशि एकमुश्त महिलाओं के खातों में जमा कराई गई। वहां भी सरकार बनाने में यह योजना लाभदायक साबित हुई। योजना का सफर आंकड़ों के रोमांचक उतार-चढ़ाव से भरा है। शुरुआत में 1.29 करोड़ महिलाएं इसके दायरे में थीं, जो अक्टूबर 2023 तक बढ़कर 1.31 करोड़ हो गई। लेकिन, अब यह आंकड़ा सिमटकर फिर 1.25 करोड़ पर आ गया।
