
मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवादों और डिजिटल सबूतों को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल कायम की है। कोर्ट ने नासिक फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक पति को उसकी पत्नी से तलाक दे दिया गया था। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्याय का सिद्धांत तभी पूरा होता है जब दोनों पक्षों को सुना जाए। नासिक की फैमिली कोर्ट में पति ने अपनी पत्नी के खिलाफ तलाक की याचिका दायर की थी। पति का मुख्य आरोप था कि उसकी पत्नी उस पर अपने माता-पिता को छोड़कर पुणे शिफ्ट होने का दबाव बना रही थी।
पति ने अपने पक्ष में ये सबूत पेश किए
सबूत के तौर पर पति ने पत्नी के साथ हुई व्हाट्सएप चैट और एसएमएस पेश किए। दावा किया कि पत्नी ने ससुराल वालों के लिए अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया। इसे मानसिक प्रताड़ना का आधार बताया। फैमिली कोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार करते हुए पति के पक्ष में फैसला सुनाया था और तलाक की अनुमति दे दी थी।
हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी की, कि एकतरफा सबूत काफी नहीं है।जब यह मामला बॉम्बे हाई कोर्ट पहुँचा, तो माननीय न्यायालय ने निचली अदालत की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए।
हाई कोर्ट के फैसले के मुख्य बिंदु
– सफाई का मौका अनिवार्य : कोर्ट ने कहा कि पत्नी को उन संदेशों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने या उन्हें चुनौती देने का उचित अवसर नहीं दिया गया।
– डिजिटल चैट की सीमा : केवल व्हाट्सएप चैट के आधार पर किसी के चरित्र या व्यवहार का अंतिम फैसला नहीं किया जा सकता, जब तक कि दूसरा पक्ष उस पर अपना स्पष्टीकरण न दे दे।
– न्याय का प्राकृतिक सिद्धांत : कोर्ट ने दोहराया कि किसी भी पक्ष को अपनी बात रखने का पूरा मौका दिए बिना सुनाया गया फैसला कानूनी रूप से सही नहीं है।
अब इस मामले आगे यह होगा
बॉम्बे हाई कोर्ट ने नासिक फैमिली कोर्ट के पुराने फैसले को खारिज कर दिया और मामले को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया। अब इस मामले की नए सिरे से सुनवाई होगी, जहाँ पत्नी को भी अपने सबूत पेश करने और पति द्वारा लगाए गए आरोपों का जवाब देने का पूरा अधिकार मिलेगा। यह फैसला स्पष्ट करता है कि डिजिटल युग में भी ‘कानूनी प्रक्रिया’ और ‘पक्ष रखने की स्वतंत्रता’ सबसे ऊपर है।