
भोपाल। मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव को अभी 3 साल हैं। लेकिन, भाजपा और कांग्रेस के नेता अभी से चुनावी तैयारी में जुट गए। खासकर कांग्रेस दलित और आदिवासी समाज को फिर से अपने पाले में लाने के लिए आक्रामक रुख अपनाती दिख रही है। ग्वालियर में डॉ भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा स्थापना को लेकर हुए विवाद से लेकर आदिवासी संगठनों के मुद्दों तक, कांग्रेस लगातार संदेश देने की कोशिश कर रही है कि वह इन वर्गों के साथ खड़ी है।
हाल ही में ग्वालियर हाई कोर्ट खंडपीठ परिसर में डॉ आंबेडकर की प्रतिमा लगाने को लेकर हुए विवाद ने दलित राजनीति को नया मुद्दा दे दिया। कांग्रेस विधायक फूल सिंह बरैया समेत कई नेता खुलकर दलित संगठनों के समर्थन में सामने आए। कांग्रेस ने इस मुद्दे पर प्रशासन और सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए दलित अस्मिता से जोडकर इसे बड़ा राजनीतिक प्रश्न बना दिया।
दोनों ही दलों की इन मतदाताओं पर नजर
ग्वालियर-चंबल अंचल में अनुसूचित जाति वर्ग की निर्णायक भूमिका को देखते हुए कांग्रेस का यह रुख महज संयोग नहीं माना जा रहा। प्रदेश की 230 सदस्यीय विधानसभा में अनुसूचित जाति के लिए 35 और अनुसूचित जनजाति के लिए 47 सीटें आरक्षित हैं। इसके अलावा करीब 40 सामान्य सीटों पर भी इन वर्गों का प्रभाव निर्णायक माना जाता है। यही कारण है कि कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही दल इन मतदाताओं को नजरअंदाज नहीं कर सकते।
आदिवासी मुद्दों पर रणनीति
कांग्रेस का मौजूदा फोकस सिर्फ दलित नहीं, बल्कि आदिवासी समाज पर भी है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार का अधिकांश राजनीतिक जोर आदिवासी क्षेत्रों पर दिखाई देता है। हाल के दिनों में आईएएस अधिकारी संतोष वर्मा के विवादित बयान को लेकर कांग्रेस की चुप्पी को भी इसी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। वर्मा आदिवासी समाज से आते हैं और अजाक्स के अध्यक्ष हैं, जिसे कांग्रेस का पारंपरिक समर्थन रहा है।
कई आदिवासी संगठन एकजुट
वर्मा को दिए गए कारण बताओ नोटिस के विरोध में जय युवा आदिवासी संगठन (जयस) समेत कई आदिवासी संगठन एकजुट हैं, जबकि ब्राह्मण समाज सरकार की निष्क्रियता से नाराज है। प्रदेश में दलित राजनीति को धार देने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की अगुआई में नया दलित एजेंडा तैयार किया जा रहा है। अगले एक वर्ष तक प्रदेश सहित अन्य राज्यों में इस एजेंडे को लेकर गतिविधियां चलाई जाएंगी और 13 जनवरी 2027 को इसे औपचारिक रूप से घोषित किया जाएगा।
दलित एजेंडा का हश्र
इससे पहले वर्ष 2002 में भी दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्री रहते दलित एजेंडा लागू हुआ था, हालांकि उसके बाद हुए चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा था। भाजपा कांग्रेस की इस सक्रियता को महज एजेंडा की राजनीति बता रही है।