
इंदौर। मालवा-निमाड़ की नर्मदा पट्टी में तेंदुओं की बढ़ती मौजूदगी वन विभाग की तैयारी और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। सरदार सरोवर और इंदिरा सागर परियोजना के विशाल बैकवॉटर ने जहां वन्यप्राणियों का प्राकृतिक आश्रय उजाड़ा, वहीं घटते जंगल और अवैध कटाई ने तेंदुओं को मजबूर कर दिया कि वे मानव बस्तियों की ओर बढ़ें। जिले में तेंदुओं की संख्या सौ से अधिक आंकी जा रही है, और हर वर्ष यह आंकड़ा बढ़ रहा है।
नई बसाहट तलाशते ये तेंदुए अब धार, अलीराजपुर, खरगोन-बड़वानी और पीथमपुर, धामनोद, मनावर, कुक्षी, निसरपुर जैसे नर्मदा किनारे बसे इलाकों में आम तौर पर देखे जा रहे हैं। लेकिन नए ठिकानों पर भी इनका जीवन सुरक्षित नहीं। कभी सड़क हादसे इनकी जान ले रहे हैं, तो कुछ मौतें संदिग्ध परिस्थितियों में सामने आ रही हैं, जिनमें शिकार की आशंका को नकारा नहीं जा रहा।
ओंकारेश्वर क्षेत्र में छोड़े गए कई तेंदुए बैकवॉटर बढ़ने से फिर से दूसरी जगहों का रुख करने को मजबूर हैं। स्थानीय लोग बताते हैं कि पीली मिट्टी के टीले, गन्ने के खेत, रेत खदानों के गड्ढे और पानी की उपलब्धता तेंदुओं के लिए नई सुरक्षित जगह बन गई है। भोजन के रूप में जंगली सुअर और अन्य जानवर आसानी से मिल जाने से भी तेंदुओं की आबादी बढ़ी है। अब तक जिले की सात रेंजों में दर्ज मामलों में कई तेंदुए करंट, सड़क हादसों, बीमारी और आपसी संघर्ष में मारे गए हैं, जबकि सात का रेस्क्यू किया जा चुका है। कुछ मामलों में आरोपी पकड़े गए, लेकिन कई अब भी फरार हैं।
सिर्फ सलाह, कार्रवाई नदारद
धार जिले के कई क्षेत्रों में तेंदुए नियमित दिखने के बावजूद वन विभाग के पास ठोस सुरक्षा व्यवस्था नहीं है। स्थानीय रहवासियों को सिर्फ सावधान रहने की सलाह दी जाती है, जबकि जमीनी स्तर पर कोई व्यापक कदम नहीं उठाए जा रहे। कई क्षेत्रों में कर्मचारियों की सक्रियता पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
शिकार की आशंका
पिछले वर्षों में कई घटनाएँ सामने आईं जहाँ तेंदुओं के शव संदिग्ध हालत में मिले, कुछ में पंजे और नाखून तक गायब थे। तांत्रिक क्रियाओं में इन अवयवों की मांग बढ़ने से शिकार की आशंका बलवती हो रही है। जबकि, वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत तेंदुए की हत्या या खाल निकालना गैर-जमानती अपराध है, जिसमें 3 से 7 वर्ष तक की सजा और 10 हजार से 1 लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है।