
सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में यह स्पष्ट किया है कि विश्वविद्यालयों पर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के दिशा-निर्देशों का पालन करना अनिवार्य है। यह टिप्पणी सर्वोच्च न्यायालय ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से जुड़े एक मामले का निपटारा करते हुए की। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्र और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की खंडपीठ सन 2013 में सहायक प्रोफेसरों की नियुक्तियों से संबंधित मामले पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ता धर्मेंद्र कुमार और बृजेश कुमार तिवारी ने इन नियुक्तियों को पारदर्शिता के अभाव और अनुदान आयोग विनियम, 2013 के अनुरूप न होने के आधार पर चुनौती दी थी।
सन् 2013 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ने वाणिज्य विभाग में सहायक प्रोफेसरों की भर्ती हेतु इंटरव्यू आयोजित किए थे। याचिकाकर्ता बृजेश के अनुसार चार सौ उम्मीदवारों में वे सभी मेरिट मापदंडों में पहले स्थान पर थे। इसके बावजूद उन्हें नियुक्त नहीं किया गया और इन्हें प्रतीक्षा सूची में रखा गया। इसके अलावा कम मेरिट वाले उम्मीदवारों को साक्षात्कार के आधार पर नियुक्त किया गया। कृषि विभाग में भी याचिकाकर्ता धर्मेंद्र के मामले में यही आरोप था। दूसरे याचिकाकर्ता बृजेश ने सन 2014 में रिट दायर की थी। इसे सन 2016 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया। इसके बाद उन्होंने विशेष अनुमति याचिका दायर की। सन् 2016 में सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायमूर्ति जे चेलमेश्वर और न्यायमूर्ति एएम सप्रे की पीठ ने नोटिस जारी कर नियुक्तियों पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की वकील ने सर्वोच्च न्यायालय में बताया कि बृजेश अब जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं और धर्मेंद्र बांदा यूनिवर्सिटी ऑफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी में प्रोफेसर हैं। इसलिए वे अब इस मुकदमे को आगे नहीं बढ़ाना चाहते। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के हालिया आदेश का हवाला देते हुए कहा कि एक बार राज्य उच्च अनुदान आयोग विनियम अपना ले, तो उसका पालन अनिवार्य होता है। उन्होंने बताया कि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ने सन 2010 में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के न्यूनतम योग्यता विनियम अपनाए थे और समय-समय पर संशोधित विनियम भी अपनाए। इन प्रस्तुतियों को ध्यान में रखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने अपीलें निपटा दी और यह टिप्पणी की कि आगे से बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में चयन प्रक्रिया विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के विनियमों के अनुसार ही संचालित होनी चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि उत्तरदाता विश्वविद्यालय या कोई अन्य विश्वविद्यालय, जो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग विनियम, 2013 (समय-समय पर संशोधित) के अधीन संचालित होते हैं, उन विनियमों और दिशा-निर्देशों का पालन करने के लिए वे बाध्य हैं।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग क्या है, यह भी जानना चाहिए। भारत में, राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली तैयार करने का पहला प्रयास वर्ष 1944 में भारत में द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत शैक्षिक विकास पर केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड की रिपोर्ट के साथ हुआ। इसे सार्जेंट रिपोर्ट के नाम से भी जाना जाता है। इस रिपोर्ट में अलीगढ़, बनारस एवं दिल्ली के तीन केंद्रीय विश्वविद्यालयों के काम की देखरेख के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के गठन की अनुशंसा की गई थी।
वर्ष 1947 में, समिति को सभी तत्कालीन मौजूदा विश्वविद्यालयों की समस्याओं से निपटने का काम सौंपा गया था। वर्ष 1952 में, केंद्र सरकार ने निर्णय लिया कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों एवं अन्य विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों को सार्वजनिक निधियों से अनुदान आवंटन से संबंधित सभी मामलों को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को भेजा जा सकता है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को औपचारिक रूप से नवंबर 1956 में संसद के एक अधिनियम के माध्यम से एक सांविधिक निकाय के रूप में स्थापित किया गया था।
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के उद्देश्यों में विश्वविद्यालय शिक्षा को बढ़ावा देना एवं समन्वय करना, विश्वविद्यालयों में शिक्षण, परीक्षा एवं अनुसंधान के मानकों का निर्धारण और रखरखाव करना है। साथ ही शिक्षा के न्यूनतम मानकों पर विनियम बनाना, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय शिक्षा के क्षेत्र में विकास की निगरानी करना तथा विश्वविद्यालयों एवं कॉलेजों को अनुदान वितरित करना, संघ एवं राज्य सरकारों और उच्च शिक्षा संस्थानों के मध्य एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करना तथा विश्वविद्यालय शिक्षा में सुधार के लिए आवश्यक उपायों पर केंद्र एवं राज्य सरकारों को सलाह देना सम्मिलित है।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 की धारा 5 के अनुसार आयोग में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष एवं दस अन्य सदस्य केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त किए जाते हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 की धारा 12 विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के कार्यों को निर्धारित करती है।
इसके कार्यों में विश्वविद्यालयों की वित्तीय आवश्यकताओं की जांच करना, आयोग की निधि से, केंद्रीय सरकार द्वारा धारा के अधीन की गई घोषणा के अनुसरण में विश्वविद्यालय माने जाने वाले संस्थानों को ऐसे अनुदान आवंटित और वितरित करना, जैसा वह आवश्यक समझे तथा विशेष मामलों में रखरखाव के लिए, विकास के लिए, किसी अन्य सामान्य या निर्दिष्ट उद्देश्य के लिये है। किसी विश्वविद्यालय को विश्वविद्यालय शिक्षा के सुधार के लिए आवश्यक उपायों की अनुशंसा करना तथा ऐसी अनुशंसा के कार्यान्वयन के लिये की जाने वाली कार्यवाही के संबंध में विश्वविद्यालय को सलाह देना शामिल है।
इन सबके अलावा आयोग ‘नीट’ परीक्षा भी करवाता है। राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा नीट, आयोग की ओर से राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (एनटीए) द्वारा आयोजित एक प्रतियोगी परीक्षा है। यह परीक्षा वर्ष में दो बार, आमतौर पर जून एवं दिसंबर में आयोजित की जाती है। इसका उपयोग जूनियर रिसर्च फेलोशिप सहायक प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति एवं भारतीय विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में पीएचडी में प्रवेश के लिए उम्मीदवारों की पात्रता निर्धारित करने के लिए किया जाता है।
यह जानना भी उपयोग होगा कि आखिर राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी क्या है! राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी की स्थापना उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश/फेलोशिप के लिये प्रवेश परीक्षा आयोजित करने हेतु एक प्रमुख, विशेषज्ञ, स्वायत्त एवं आत्मनिर्भर परीक्षण संगठन के रूप में की गई है। यह भारत के शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग के अंतर्गत एक स्वायत्त एजेंसी है। इसकी स्थापना नवंबर 2017 में प्रवेश परीक्षा एवं भर्ती आयोजित करने के लिये की गई थी। राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी दिसंबर 2018 से नीट का आयोजन कर रहा है।