
इंदौर। धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला एक बार फिर देश के सबसे संवेदनशील पुरातात्विक और कानूनी विमर्श के केंद्र में है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की मैसूर स्थित एपिग्राफी शाखा द्वारा वर्ष 2024 में किए गए वैज्ञानिक सर्वे की विस्तृत रिपोर्ट में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 12वीं से 16वीं शताब्दी के बीच के लगभग 244 शिलालेखों के अक्षरों को जानबूझकर छेनी से मिटाया गया था।
साक्ष्यों को नष्ट करने की इस कोशिश के बावजूद, पत्थरों पर उकेरी गई इबारतों ने सदियों पुराने इतिहास की उन परतों को खोल दिया, जो अब तक विवादों के घेरे में थीं। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में पेश की गई 2189 पृष्ठों की इस रिपोर्ट पर आगामी 16 मार्च को हाई कोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई होनी है।
फारसी भाषा में दर्ज कटु सत्य
एएसआई की रिपोर्ट के सबसे विवादित और निर्णायक हिस्से में मालवा सल्तनत के सुल्तान महमूद खिलजी के शासनकाल (1436-1469 ई) के एक शिलालेख का जिक्र है। यह शिलालेख वर्तमान में परिसर स्थित अब्दुल्ला शाह चंगाल के मकबरे के प्रवेश द्वार पर लगा है। इस शिलालेख की 17वीं और 18वीं पंक्तियों में फारसी भाषा में जो दर्ज है, वह इतिहास के एक कठिन सत्य की तस्दीक करता है।
एएसआई द्वारा किए गए हिंदी और अंग्रेजी अनुवाद के अनुसार, इसमें स्पष्ट रूप से लिखा गया है ‘एक बहादुर व्यक्ति बड़ी सेना के साथ धर्म के केंद्र से इस पुराने आश्रम (मठ) में पहुंचा, उसने देवताओं की मूर्तियों को तहस-नहस कर दिया और ताकत के बल पर पूजा के स्थान को नमाज पढ़ने की जगह यानी मस्जिद में तब्दील कर दिया।’ यह शिलालेख स्वयं इस बात का प्रमाण दे रहा है कि वहां पहले एक भव्य मंदिर और शैक्षणिक संस्थान मौजूद था।
शिलालेखों पर साहित्यिक रचनाएं दर्ज
सर्वे के दौरान विशेषज्ञों ने पाया कि जिन 244 शिलालेखों का अध्ययन किया गया, उनमें से कई खंड कभी बड़ी साहित्यिक रचनाओं का हिस्सा थे। इन पर नागरी लिपि में संस्कृत और प्राकृत भाषाओं के श्लोक अंकित हैं। इन शिलालेखों को जानबूझकर खंडित कर भवन के अलग-अलग हिस्सों में दोबारा इस्तेमाल किया गया था, ताकि उनकी मूल पहचान छिपाई जा सके। हालिया सर्वे में 50 नए शिलालेख खंड और एक खंडित प्रतिमा के आसन का टुकड़ा भी मिला है, जो इस स्थान की प्राचीन धार्मिक प्रकृति की ओर संकेत करते हैं। इस पुरातात्विक अन्वेषण में तीन विशेष शिलालेखों ने सम्राट भोज के काल की भव्यता को पुनर्जीवित किया है। इनमें ‘पारिजात मंजरी’ नाटिका का शिलालेख शामिल है, जिसकी रचना राजा अर्जुनवर्मन के गुरु मदन ने की थी।
बहुत कुछ दर्ज है शिलालेखों पर
इस शिलालेख के अनुसार, नाटक का प्रथम मंचन ‘शारदा देवी के सदन’ (सरस्वती मंदिर) में हुआ था। इसके अतिरिक्त, ‘अवनिकूर्मशतम’ शिलालेख में सम्राट भोज द्वारा रचित प्राकृत भाषा के 109-109 श्लोकों वाले दो काव्य मिले हैं। व्याकरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण ‘नागबंध’ शिलालेख भी प्राप्त हुआ है, जिसमें परमार वंश के राजा नरवर्मन का उल्लेख मिलता है। इतिहास की इस खोज में केवल राजाओं के ही नहीं, बल्कि उन शिल्पकारों के नाम भी उजागर हुए हैं जिन्होंने इन संरचनाओं को गढ़ा था। सर्वे में 34 छोटे उत्कीर्ण नाम मिले हैं, जिनमें 13वीं सदी के मदन, माधव और जकिजु तथा 16वीं सदी के मोहिला, कामदेव, सोमदेव और रणपाल जैसे कारीगरों के नाम शामिल हैं।
हाई कोर्ट की सुनवाई में सामने आएगा सच
भोजशाला का पहला आधिकारिक अध्ययन 1951 में हुआ था, जिसके बाद समय-समय पर हुए सर्वेक्षणों में अब तक 135 शिलालेखों की प्रतिलिपि तैयार की जा चुकी है। वर्तमान में यह मामला इंदौर हाई कोर्ट की खंडपीठ में विचाराधीन है, जहां कोर्ट ने एएसआई की इस व्यापक रिपोर्ट पर दोनों पक्षों से उनकी आपत्तियां मांगी हैं। 16 मार्च की सुनवाई यह तय करेगी कि सदियों से पत्थरों में कैद यह सच कानूनी रूप से क्या मोड़ लेता है।
