
नई दिल्ली: उच्चतम न्यायालय ने 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े “बड़ी साजिश” (larger conspiracy) के मामले में आज अपना निर्णय सुनाया है। शीर्ष न्यायालय ने इस मामले में स्टूडेंट एक्टिविस्ट उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएँ खारिज कर दी हैं, जबकि अन्य पाँच आरोपियों को क्रमशः शर्तों के साथ जमानत प्रदान की गई है। यह फैसला दिल्ली हाई कोर्ट के 2 सितंबर 2025 के उसी आदेश के खिलाफ दायर अपील पर सुनाया गया था, जिसमें पहले भी जमानत न देने का आदेश था।
मुख्य निर्णय बिंदु
1. उमर खालिद व शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएँ खारिज कर दीं।
अदालत ने कहा कि उपलब्ध सबूत और जांच सामग्री से प्रथम दृष्टया आरोपियों के खिलाफ UAPA समेत आपराधिक साजिश के आरोप स्पष्ट रूप से लागू होते हैं, जिससे उन्हें जमानत देने का मानक पूरा नहीं होता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोनों की भूमिका अन्य आरोपियों की तुलना में अलग और गंभीर है, इसलिए अभी उन्हें रिहा नहीं किया जा सकता।
जमानत का शर्त पूरा होने तक प्रत्यक्ष रिहाई संभव नहीं
कोर्ट ने उल्लेख किया कि दोनों के खिलाफ साजिश के आरोपों की गंभीरता और UAPA की विशेष प्रावधानों के कारण मानक कठोर हैं, और इस स्थिति में जमानत देना उचित नहीं है। अदालत ने संकेत दिया कि दोनों आरोपियों को कम से कम एक वर्ष जेल में रहने के बाद ही पुनः जमानत पर विचार किया जा सकता है।
2. पाँच अन्य आरोपियों को जमानत
न्यायालय ने इन पाँच आरोपियों को शर्तों के साथ जमानत प्रदान की है:
गुलफिशा फातिमा
मीरान हैदर
शिफा-उर-रहमान
मोहम्मद सलीम खान
शादाब अहमद
कोर्ट ने माना कि इन लोगों की कुल भूमिका उमर और शरजील की तुलना में अलग और कम सीधे तौर पर साजिश में शामिल प्रतीत होती है, जिससे उन पर जमानत देने के पक्ष में फैसले का आधार बनता है।
क्या कोर्ट ने किन आधारों से यह निर्णय दिया?
UAPA की सख्त प्रकृति:
UAPA (Unlawful Activities Prevention Act) की धारा 43D(5) में जमानत के लिए कठोर मानक निर्धारित हैं, जिसमें यह कहा गया है कि अभियुक्त के मामले में प्राथमिक रूप से आरोप सटीक और गंभीर हों तो जमानत देना कठिन होता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी आधार को अपनाया।
जिम्मेदारी व culpability का विभाजन:
कोर्ट ने कहा कि प्रतिवादियों को एक समान रूप से नहीं देखा जा सकता, बल्कि उनकी भूमिका, साक्ष्यों की स्थिति और आरोपों की गंभीरता के हिसाब से अलग-अलग देखा जाना चाहिए। उधर पाँच आरोपियों के मामले में यह पाया गया कि उनकी भागीदारी की गंभीरता कम थी और इसलिए उन्हें सांविधानिक अधिकारों के तहत जमानत दी जा सकती है।
पृष्ठभूमि और मामला संक्षेप में
● 2020 के फरवरी में दिल्ली के उत्तर-पूर्वी भाग में हुए दंगों में 50 से अधिक लोगों की मौत और सैकड़ों घायल होने की घटनाओं के बाद मामला दर्ज हुआ था।
● पुलिस ने आरोप लगाया था कि यह एक संगठित, पूर्व नियोजित साजिश थी, जो नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिंसा फैलाने की योजना के तहत की गई थी।
● उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य को UAPA समेत विभिन्न धाराओं के तहत आरोपित किया गया था, और उन्हें ‘masterminds’ की संज्ञा दी गई थी।
● अभियुक्तों ने अपनी लंबी हिरासत तथा आगे के परीक्षण की देरी को आधार बनाकर जमानत की मांग की थी, जिसे उच्चतम न्यायालय ने आज खारिज कर दिया।
दूसरे पहलू और आगे की संभावनाएँ
अनुभवी विधिक विश्लेषकों के अनुसार, यह निर्णय न्यायपालिका की सख्त स्थिति और गंभीर आपराधिक आरोपों के प्रति उसकी संवेदनशीलता को दर्शाता है।
कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे भविष्य में ऐसे मामलों में बेल पर पुनर्विचार के लिए एक कठिन मानक स्थापित हो सकता है, खासकर जब UAPA जैसे प्रावधान लागू हों।
सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत से इनकार कर उन्हें अभी भी जेल में रहने के निर्देश दिए हैं, जबकि अन्य पाँच आरोपियों को शर्तों के साथ जमानत प्रदान की है। यह फैसला इस गहन और लंबे चले मामले के न्यायिक क्रम में एक निर्णायक मोड़ माना जा रहा है।