
करनाल। हरियाणा के करनाल जिले में सरकारी जमीन को अवैध रूप से निजी हाथों में पहुंचाने के बहुचर्चित मामले में अदालत ने एक ऐतिहासिक और कड़ा फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट श्रीमती खुशबू गोयल की अदालत ने तहसीलदार सहित कुल 13 दोषियों को 5 से 7 वर्ष के कठोर कारावास एवं भारी जुर्माने की सजा सुनाई है। अदालत ने इस पूरे प्रकरण को सुनियोजित आपराधिक साजिश करार देते हुए स्पष्ट कहा कि आरोपियों ने फर्जी दस्तावेजों के माध्यम से सरकारी भूमि को हड़पने का गंभीर प्रयास किया।
फर्जी दस्तावेजों से सरकारी जमीन हड़पने की साजिश
अदालत के अनुसार इस मामले में पंचायत स्तर से लेकर राजस्व विभाग तक के अधिकारियों की मिलीभगत उजागर हुई है। दोषियों ने योजनाबद्ध तरीके से फर्जी आवंटन पत्र, झूठे खरीद-फरोख्त के दस्तावेज तैयार किए और सरकारी रिकॉर्ड में अवैध बदलाव कर सरकारी भूमि को निजी स्वामित्व में दर्शाने का प्रयास किया।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह केवल लापरवाही का मामला नहीं, बल्कि पूर्व नियोजित आपराधिक षड्यंत्र है, जिसमें शासन व्यवस्था की जड़ों को कमजोर करने का प्रयास किया गया।
पंचायत से राजस्व विभाग तक मिलीभगत
न्यायालय ने माना कि इस घोटाले में निचले स्तर से लेकर उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों की सहभागिता रही। सरकारी अभिलेखों में जानबूझकर छेड़छाड़ कर वास्तविक स्थिति को छिपाया गया और नियमों को ताक पर रखकर जमीन को निजी व्यक्तियों के नाम दर्ज कराया गया।
मॉडल गांव अरजाहेड़ी के बहुचर्चित सरकारी भूमि घोटाले में 12 साल बाद अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए नायब तहसीलदार समेत 13 दोषियों को 5 से 7 वर्ष की साधारण कैद और जुर्माने की सजा सुनाई है। साथ ही प्रत्येक दोषी पर 40 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया है। दोषियों में तत्कालीन सरपंच, सरपंच प्रतिनिधि, बीडीपीओ, नायब तहसीलदार, नंबरदार, दस्तावेज लेखक, प्रॉपर्टी डीलर और निजी व्यक्ति भी शामिल हैं। अदालत ने आदेश दिया कि सभी सजाएं एक साथ चलेंगी और जांच व ट्रायल के दौरान जेल में बिताई गई अवधि को सजा में समायोजित किया जाएगा।
कोर्ट ने कहा कि साजिश पंचायत स्तर से लेकर राजस्व और दस्तावेजी प्रक्रिया से जुड़े लोगों की मिलीभगत से रची गई थी। इस मामले में जिन 13 लोगों को दोषी ठहराया गया उनमें जय सिंह, ईश्वरी देवी, हरीश कुमार, कुलजीत सिंह डाहिया, करमबीर उर्फ करमवीर, राजेंद्र पाल, ईश्वर सिंह पुत्र दीप चंद, करम सिंह, जसपाल, डालेल सिंह, देश राज, ईश्वर सिंह नंबरदार और राज कुमार उर्फ राजू के नाम शामिल हैं।
दोषियों पर सरकारी जमीन हड़पने, फर्जी दस्तावेज बनाने और रिकॉर्ड में हेरा-फेरी करने के आरोप सिद्ध होने पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट खुशबू गोयल की अदालत ने अपने विस्तृत आदेश में कहा कि सरकारी जमीन से जुड़े घोटाले विकास को बाधित करते हैं। आम लोगों और निवेशकों का भरोसा तोड़ते हैं और समाज में अराजकता को जन्म देते हैं। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई अहम फैसलों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि ऐसे अपराधों पर कठोर दंड ही प्रभावी रोक साबित हो सकता है।
नरमी समाज और शासन के लिए घातक : अदालत
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट खुशबू गोयल ने अपने निर्णय में स्पष्ट शब्दों में कहा कि ऐसे मामलों में यदि अदालत नरमी बरतती है, तो यह समाज और शासन व्यवस्था दोनों के लिए गलत संदेश होगा। सरकारी संपत्ति की रक्षा करना राज्य की जिम्मेदारी है और इसमें सेंध लगाने वालों के साथ सख्ती आवश्यक है।
5 लाख 20 हजार रुपये का जुर्माना और क्षतिपूर्ति
अदालत ने दोषियों पर कुल 5 लाख 20 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है, जिसे क्षतिपूर्ति के रूप में अदा करने के निर्देश दिए गए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि जुर्माना न चुकाने की स्थिति में दोषियों को अतिरिक्त सजा भी भुगतनी होगी।
न्यायालय इसे राज्य को हुए नुकसान की आंशिक भरपाई के रूप में माना है। सजा के वारंट तुरंत तैयार करने और दोषियों को फैसले की प्रति निशुल्क उपलब्ध कराने के निर्देश भी दिए गए। पब्लिक प्रोसिक्यूटर अमृतपाल सिंह ने बताया कि इस पूरे मामले में कुल 16 लोगों में से दो आरोपियों रामप्रसाद और नानकी देवी की मृत्यु हो चुकी है, जबकि एक आरोपी पृक्षित फरार है जिसे पीओ घोषित किया जा चुका है। शेष 13 दोषियों को अदालत ने सजा सुनाई है।
भ्रष्टाचार पर सख्त संदेश
इस फैसले को प्रशासनिक और न्यायिक हलकों में भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ा संदेश माना जा रहा है। यह निर्णय उन अधिकारियों और दलालों के लिए चेतावनी है, जो सरकारी संपत्तियों को निजी लाभ के लिए हड़पने की साजिश रचते हैं।