
विक्रम सेन
नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि अगर देश में रोहिंग्या शरणार्थी भारतीय कानूनों के तहत विदेशी पाए जाते हैं तो उन्हें निर्वासित किया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने शीर्ष अदालत के आदेश का हवाला दिया और टिप्पणी की कि शरणार्थियों के लिए संयुक्त राष्ट्र उच्चायुक्त (यूएनएचसीआर) द्वारा जारी किए गए पहचान पत्र कानून के तहत उनके लिए कोई मदद नहीं कर सकते हैं। न्यायमूर्ति दत्ता ने विभिन्न रोहिंग्या याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस और अधिवक्ता प्रशांत भूषण से कहा, “अगर वे विदेशी अधिनियम के अनुसार विदेशी हैं, तो उन्हें निर्वासित किया जाना चाहिए।”
बता दें कि रोहिंग्या समुदाय को म्यांमार में हो रहे कथित नरसंहार के चलते भारत में शरणार्थी बताकर याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की थी कि उन्हें भारत में रहने का अधिकार दिया जाए। ।
पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता कोलिन गोंसाल्विस और वकील प्रशांत भूषण की ओर से दायर याचिकाओं पर विचार करते हुए कहा कि मामले की विस्तृत सुनवाई 31 जुलाई को की जाएगी।
यूएनएचसीआर कार्ड का जिक्र करते हुए मेहता ने कहा कि भारत शरणार्थी सम्मेलन पर हस्ताक्षरकर्ता नहीं है। अप्रैल 2021 के आदेश में कहा गया है कि अनुच्छेद 14 और 21 के तहत गारंटीकृत अधिकार सभी व्यक्तियों को उपलब्ध हैं, जो नागरिक हो सकते हैं या नहीं भी हो सकते हैं, लेकिन निर्वासित न किए जाने का अधिकार अनुच्छेद 19(1)(ई) के तहत गारंटीकृत भारत के किसी भी हिस्से में निवास करने या बसने के अधिकार का सहायक या सहवर्ती है।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और अधिवक्ता कानू अग्रवाल ने कोर्ट को बताया कि पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने असम और जम्मू-कश्मीर में रोहिंग्या मुसलमानों के निर्वासन पर रोक लगाने से इनकार किया था। केंद्र सरकार ने उस समय राष्ट्रीय सुरक्षा पर गंभीर खतरा जताया था।
UNHCR ने दिया है शरणार्थी का दर्जा
गोंसाल्विस और भूषण ने तर्क दिया कि रोहिंग्या समुदाय को संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग (UNHCR) ने शरणार्थी के रूप में मान्यता दी है और उनके पास शरणार्थी कार्ड भी हैं। ऐसे में उन्हें भारत में रहने और जीवन जीने का अधिकार है।
सॉलिसिटर जनरल ने इसका जवाब देते हुए कहा कि भारत UN Refugee Convention (1951) का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है और UNHCR द्वारा दी गई शरणार्थी मान्यता भारत के लिए बाध्यकारी नहीं है। उन्होंने कहा, “रोहिंग्या विदेशी नागरिक हैं और सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि निर्वासन से सुरक्षा का अधिकार भारतीय नागरिकों को निवास अधिकार के तहत ही प्राप्त है।”
सुनवाई के दौरान भूषण ने पीठ से मामले की अंतिम सुनवाई करने का आग्रह करते हुए कहा कि केवल शरणार्थी सम्मेलन को ही नहीं बल्कि नरसंहार सम्मेलन को भी देखा जाना चाहिए, जिसे भारत ने अनुमोदित किया है। न्यायमूर्ति कांत ने कहा, “यह बेहतर होगा कि किसी भी तरह के अंतरिम आदेश पारित करने के बजाय हम इन मामलों को उठाएं और किसी भी तरह से निर्णय लें। अगर उन्हें यहां रहने का अधिकार है, तो उसे स्वीकार किया जाना चाहिए और अगर उन्हें यहां रहने का अधिकार नहीं है, तो उन्हें प्रक्रिया का पालन करना होगा और कानून के अनुसार निर्वासित होना होगा।” जब गोंजाल्विस ने फिर से आगे निर्वासन की आशंका व्यक्त की, तो न्यायमूर्ति कांत ने कहा कि मेहता ने आश्वासन दिया है कि निर्वासन भारतीय कानूनों के अनुरूप होगा।
रोहिंग्या कौन हैं जाने इस शरणार्थी संकट को
इसे दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ते शरणार्थी संकटों में से एक बताया गया है
रोहिंग्या लोग म्यांमार देश के रखाइन राज्य और बांग्लादेश के चटगाँव इलाक़े में बसने वाले राज्य विहीन रखाइन राज्य पर बर्मी क़ब्ज़े के बाद अत्याचार के माहौल से तंग आ कर बड़ी संख्या में रोहिंग्या लोग थाईलैंड में शरणार्थी हो गए। रोहिंग्या लोग आम तौर पर मुसलमान होते हैं। ये लोग रोहिंग्या भाषा बोलते हैं।
रोहिंग्या लोगों को नागरिक नहीं माना जाता है, वे जनगणना चुनावों में भाग नहीं ले पाए हैं और उन्हें देश की नींव रखने वाले 135 आधिकारिक जातीय समूहों में शामिल नहीं किया गया है।
यह जानना महत्वपूर्ण है कि शरणार्थी म्यांमार में अपने घरों और आवासों से क्यों भाग रहे हैं। वर्षों से चली आ रही हिंसा, भेदभाव और पूर्वाग्रह ने रोहिंग्या समुदाय में कुछ विद्रोहों को जन्म दिया है।
राखिने राज्य में कई रोहिंग्या गांवों को निशाना बनाया गया है और आग लगाकर नष्ट कर दिया गया है, जिससे रोहिंग्या आबादी जबरन विस्थापित हो गई है। रोहिंग्या शरणार्थी संकट उनकी मातृभूमि से शुरू हुआ, जिनमें से अधिकांश को नष्ट कर दिया गया है और वे जलते और नष्ट होते जा रहे हैं।
रोहिंग्याओं का इतिहास क्या है?
रोहिंग्या लोग दशकों से अनेक नागरिक विवादों में लिप्त रहे हैं, जिसके कारण अनेक बार शरणार्थियों को पलायन करना पड़ा है।
बंगाल (अब बांग्लादेश) के लोग सैकड़ों सालों से म्यांमार (राखिन राज्य) के साथ व्यापार करते रहे हैं। ये व्यापारी देश में बस गए और खुद को स्थापित कर लिया। 1800 के दशक में ब्रिटिश औपनिवेशिक काल के दौरान, भारत और बांग्लादेश से कई लोगों को ब्रिटिश नेतृत्व वाले प्रशासन में काम करने के लिए म्यांमार लाया गया था, जिससे 50 सालों में मुस्लिम समुदाय की संख्या दोगुनी हो गई। इस फैसले से स्थानीय म्यांमार के लोगों में नाराजगी थी और यह दुश्मनी की एक मूल वजह है।
द्वितीय विश्व युद्ध ने इस दुश्मनी को और बढ़ा दिया। मुसलमानों ने अंग्रेजों का समर्थन किया जबकि कई बौद्धों ने जापानियों का समर्थन किया। 1948 में म्यांमार को स्वतंत्रता मिलने के बाद, मुसलमानों ने समान अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी लेकिन वे हार गए, जिससे उनके समुदाय में विभाजन और भी गहरा हो गया।
रोहिंग्या शरणार्थियों के बांग्लादेश में आने का सबसे पहला मामला 1978 का है। 1990 के दशक की शुरुआत में एक और पलायन हुआ। इन दोनों मामलों में, 200,000 से ज़्यादा रोहिंग्या लोग म्यांमार और रखाइन प्रांत से भाग गए।
“शरणार्थी” की आधिकारिक स्थिति ऐसी चीज है जिसके लिए रोहिंग्या लोग वर्षों से संघर्ष कर रहे हैं। 1992 से पहले, बांग्लादेश में आने वाले लोग म्यांमार सीमा के पास कॉक्स बाजार के दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र में केंद्रित थे। लोगों की आमद का समर्थन करने के लिए दो आधिकारिक शरणार्थी शिविर स्थापित किए गए थे – कुटुपलोंग और नयापारा। हालाँकि, 1992 के बाद बांग्लादेश में आने वाले रोहिंग्या की बढ़ती संख्या के साथ, उन्हें अब देश की सरकार द्वारा आधिकारिक रूप से मान्यता नहीं दी जाती है। इसके बजाय उन्हें अपंजीकृत शरणार्थी के रूप में देखा जाता है और उन्हें पहले से स्थापित दो शिविरों की परिधि में अपने स्वयं के अस्थायी शिविर स्थापित करने के लिए छोड़ दिया जाता है।
रोहिंग्या विवाद क्यों बढ़ रहा है?
म्यांमार से आए रोहिंग्या शरणार्थी पिछले कई सालों से भारत में अवैध रूप से रह रहे हैं। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, दिल्ली, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, राजस्थान और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में रोहिंग्याओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। कई संगठनों और राजनीतिक दलों का आरोप है कि ये लोग फर्जी दस्तावेज बनवाकर यहां पर सरकारी योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं।
सरकार का क्या कहना है?
केंद्र सरकार पहले ही यह स्पष्ट कर चुकी है कि रोहिंग्या भारत की सुरक्षा के लिए खतरा हैं और इन्हें देश से बाहर भेजने की प्रक्रिया जारी है। गृह मंत्रालय ने यह भी कहा था कि रोहिंग्या घुसपैठियों को भारत में शरणार्थी का दर्जा नहीं दिया गया है, बल्कि ये अवैध रूप से यहां रह रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट में क्या होगा?
इस मामले में याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि वह सरकार से पूछे कि रोहिंग्याओं को दिल्ली में रहने की अनुमति किस आधार पर दी जा रही है? क्या इन लोगों को राशन कार्ड, आधार कार्ड और अन्य सरकारी सुविधाएं मिल रही हैं? इस पर कोर्ट में सोमवार को सुनवाई होगी और सरकार को इस पर अपना पक्ष रखना होगा।
दिल्ली में कितने रोहिंग्या हैं?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, दिल्ली में करीब 1,100 रोहिंग्या शरणार्थी (Rohingya Refugees) रह रहे हैं, जो ज्यादातर मदनपुर खादर, कालिंदी कुंज और ओखला के इलाकों में बसे हुए हैं। कुछ समय पहले केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने ट्वीट कर कहा था कि इन लोगों को फ्लैट्स में बसाया जाएगा, लेकिन बाद में सरकार ने इस दावे को खारिज कर दिया था।
क्या रोहिंग्याओं को भारत में शरण मिलनी चाहिए?
यह सवाल लगातार चर्चा में है। एक तरफ जहां मानवाधिकार संगठन (Human Rights Organizations) इन लोगों को शरण देने की वकालत कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कई संगठन और राजनीतिक दल इन्हें देश की सुरक्षा के लिए खतरा बता रहे हैं। सरकार का कहना है कि अवैध घुसपैठियों को देश में रहने की अनुमति नहीं दी जाएगी और उन्हें जल्द ही म्यांमार वापस भेजा जाएगा।
राजनीतिक घमासान तेज
रोहिंग्याओं को लेकर BJP और विपक्षी दलों के बीच घमासान तेज हो गया है। बीजेपी का कहना है कि रोहिंग्या अवैध घुसपैठिए (Illegal Immigrants) हैं और इन्हें बाहर भेजा जाना चाहिए, जबकि कुछ विपक्षी दलों का कहना है कि उन्हें शरणार्थी का दर्जा (Refugee Status) मिलना चाहिए।
क्या हो सकता है अगला कदम?
अगर सुप्रीम कोर्ट में सरकार के पक्ष में फैसला आता है, तो दिल्ली में रह रहे रोहिंग्याओं को बाहर निकालने की प्रक्रिया तेज हो सकती है। वहीं, अगर कोर्ट सरकार से विस्तृत रिपोर्ट मांगता है, तो यह मामला और लंबा खिंच सकता है।
दिल्ली में रोहिंग्याओं की मौजूदगी और उन्हें दी जा रही सुविधाओं को लेकर मामला गर्मा गया है। सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को इस पर सुनवाई होगी, जिससे यह तय होगा कि क्या रोहिंग्याओं को भारत में रहने की अनुमति मिलेगी या उन्हें वापस भेजा जाएगा? यह सुनवाई आने वाले समय में सरकार की नीति पर भी असर डाल सकती है।