
इंदौर / भोपाल। साइबर ठगों का जाल तेजी से फैलता जा रहा है। ये ठग हर दिन नए-नए तरीकों से लोगों को शिकार बना रहे हैं। हालत यह है कि सिर्फ अनपढ़ या ग्रामीण ही नहीं, पढ़े-लिखे और तकनीक से जुड़े लोग भी इन जालसाजों के शिकार बन रहे हैं। पुलिस लगातार कार्रवाई कर रही है, लेकिन ठगी के मामले भी बढ़ते जा रहे हैं। लोगों को देशद्रोह-ड्रग्स आदि का डर दिखाकर सायबर ठग अपने जाल में फंसाकर लाखों रूपए ऐठ रहे हैं। खास बात यह कि कई लोग इनके जाल में फंसकर लाखो रुपए गंवाकर भी मुंह नहीं खोलते।
तकनीक के दौर में डिजिटल अरेस्ट एक तरह की मनोवैज्ञानिक गिरफ्तारी है, जिसमें डर का धंधा चलता है। डर और सामाजिक छवि धूमिल करने का झांसा देकर पैसे ऐंठने का आपराधिक तरीका है। ऐसे कई प्रतिष्ठित लोग हैं, जिनकी समाज में अच्छी-खासी प्रतिष्ठा है, वे भी इनके जाल में फंस रहे हैं। क्योंकि, जालसाल उन्हें इज्जत गंवाने का भय दिखा रहे हैं।
इंदौर में एक बड़े डॉक्टर का परिवार इस तरह के साइबर ठगों के जाल में फंसे और करोड़ों रुपए गंवा दिए। इसका नतीजा यह हुआ कि उन्हें अपना अस्पताल तक बेचना पड़ा। इसी तरह एक बड़े रिटायर अधिकारी जो साइबर ठगों के जाल में फंसे थे, वे इसलिए बच गए कि एक बैंक अधिकारी ने उनकी घबराहट को समय पर भांप लिया था। जब वे बैंक पहुंचकर अपनी एफडी तुड़वाकर ठग के खाते में पैसे ट्रांसफर करवा रहे थे। उन्हें धमकी दी गई थी कि वे एक बड़े ड्रग रैकेट का हिस्सा हैं और पुलिस उन्हें अरेस्ट करने आ रही है। ये दोनों प्रसंग सामाजिक प्रतिष्ठा से जुड़े हैं।
जहांगीराबाद इलाके के सीनियर एडवोकेट ने छवि धूमिल होने यानी देशद्रोही कहलाने के डर से खुदकुशी कर ली। डिजिटल अरेस्ट के चलते आत्महत्या का जालसाजी का यह पहला मामला है, जिसे पुलिस अधिकारियों को भी झकझोर दिया है। इस मामले में जहांगीराबाद पुलिस ने दो मोबाइल नंबर धारकों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया, पर क्या यह पर्याप्त है।
डर दिखाकर किसी की जान लेना समाज के लिए खतरा है और सामाजिक चिंता का विषय भी है। पुलिस, कोर्ट, सीबीआई, आईबी, ईडी, कस्टम आफिस, ड्रग पार्सल आदि का डर दिखाकर इस साल राजधानी में अब तक 25 लोगों से करीब डेढ़ करोड़ की ठगी की उकसाने का केस दर्ज किया है।
जालसाजी का शिकार होने से बचे एक रिटायर्ड वरिष्ठ अधिकारी ने पुलिस कमिश्नर हरिनारायणाचारी मिश्र को बताया कि जालसाजों का सेटअप यानी ऑफिस असली पुलिस के ऑफिस से कहीं अच्छा था। यह बात सुनकर पुलिस कमिश्नर भी हैरान हो गए। पुलिस कमिश्नर मिश्र का कहना है कि डिजिटल अरेस्ट में सायबर अपराधी हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट या सरकारी एजेंसियों के नाम पर वीडियो कॉल के माध्यम से फर्जी नोटिस और आदेश दिखाते हैं। जबकि कोई भी अदालत या एजेंसी वीडियो कॉल के जरिए आदेश जारी नहीं करती।
