
रायपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर में लंबे समय से जारी नक्सल संघर्ष अब अपने निर्णायक मोड़ पर बताया जा रहा। खूंखार नक्सली देवजी के तेलंगाना पुलिस के सामने आत्मसमर्पण के बाद संगठन की जड़ें कमजोर पड़ने का दावा किया जा रहा है। देवजी पर बस्तर में 131 से अधिक जवानों की हत्या का आरोप था और उसे ताड़मेटला व रानीबोदली हमलों का मास्टरमाइंड माना जाता रहा है। उसके सरेंडर के बाद नक्सली नेटवर्क में बिखराव की बात सामने आ रही है।
31 मार्च नक्सलवाद के खात्मे की तय डेडलाइन
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने नक्सलवाद के समूल खात्मे के लिए 31 मार्च की समयसीमा तय की है। बताया जा रहा है कि बस्तर के अलग-अलग इलाकों में अब करीब 200 नक्सली ही सक्रिय बचे हैं। महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ जोन लगभग खत्म हो चुका है। उत्तर बस्तर और माड़ डिवीजन में भी नक्सल गतिविधियों को गहरी चोट पहुंची है। हालांकि, दक्षिण बस्तर के घने जंगलों में अब भी कुछ टॉप माओवादी लीडर सक्रिय बताए जाते हैं। सुरक्षा बलों के लगातार अभियानों के कारण इनके भूमिगत होने की खबर है।
3.5 करोड़ के इनामी गणपति की तलाश तेज
नक्सली संगठन का सबसे बड़ा नाम मुपल्ला लक्ष्मण राव है, जिसे गणपति, रमन्ना और राजन्ना जैसे कई नामों से जाना जाता है। अलग-अलग राज्यों को मिलाकर उसके सिर पर करीब 3.5 करोड़ रुपये का इनाम घोषित है। गणपति 1992 में पीपुल्स वॉर ग्रुप का महासचिव बना था। 2004 से 2018 तक वह सीपीआई (माओवादी) का महासचिव रहा और वर्तमान में सेंट्रल कमेटी में एडवाइजर की भूमिका में बताया जाता है। सुरक्षा बलों के खिलाफ कई बड़े हमलों की साजिश रचने का आरोप उस पर है। सुकमा के कड़गम गांव में हुए ब्लास्ट में 35 आदिवासियों की मौत हुई थी। इस हमले का मास्टरमाइंड भी उसे ही माना जाता है।
रक्तरंजित हमले जिनसे दहला था बस्तर
गणपति का नाम जिन बड़े हमलों से जोड़ा जाता है, उनमें शामिल हैं :
– 2006 बीजापुर (उपलेटा कैंप) जिसमें 22 पुलिसकर्मी मारे गए।
– मार्च 2007, रानीबोदली (दंतेवाड़ा) में 55 जवान शहीद।
– 2010, ताड़मेटला हमले में सीआरपीएफ के काफिले पर हमले में 76 जवान शहीद।
– झीरम घाटी हमला : कांग्रेस के शीर्ष नेताओं समेत 30 लोगों की मौत।
इन हमलों ने पूरे देश को झकझोर दिया था और बस्तर लंबे समय तक दहशत में रहा।
भास्कर पर 1 करोड़ से ज्यादा का इनाम
गणपति के बाद मिशिर बेसरा उर्फ भास्कर को संगठन का अहम चेहरा माना जाता है। वह पोलित ब्यूरो और सेंट्रल कमेटी का सदस्य बताया जाता है। उसके सिर पर 1 करोड़ रुपये से अधिक का इनाम घोषित है। भास्कर को एंबुश की रणनीति, लड़ाकों का घेरा बनाने और बंकर तैयार करने में माहिर माना जाता है। बस्तर और झारखंड में हुए कई हमलों की साजिश रचने का आरोप उस पर है। वह अपने प्रभाव क्षेत्र में नई भर्तियां कराने के लिए भी जाना जाता है। फिलहाल वह भूमिगत है और सुरक्षा बल लंबे समय से उसकी तलाश में जुटे हैं।
क्या सचमुच अंत की ओर है लाल आतंक
देवजी के आत्मसमर्पण के बाद संगठन में गणपति और भास्कर जैसे कुछ बड़े नाम ही शेष बताए जा रहे हैं। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इनके आत्मसमर्पण या मुठभेड़ में ढेर होने के बाद बस्तर नक्सल हिंसा से मुक्त हो सकता है। हालांकि जमीन पर हालात अभी पूरी तरह सामान्य नहीं कहे जा सकते। दक्षिण बस्तर के जंगलों में गतिविधियां जारी हैं। मगर सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव और तय समयसीमा को देखते हुए यह साफ है कि आने वाले महीने निर्णायक साबित हो सकते हैं। बस्तर में वर्षों से जारी संघर्ष अब अपने अंतिम अध्याय की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। लेकिन, यह अंत कब और कैसे होगा, यह आने वाला समय ही तय करेगा।
