
मध्यप्रदेश सहित पूरे देश में आदिवासी समाज अपनी विशिष्ट पहचान, परंपराओं और संस्कृति के साथ सदियों से जीवन जीता आया है। उनकी प्रकृति-आधारित जीवनशैली, लोक आस्थाएं और सामाजिक व्यवस्था मुख्यधारा के धर्मों से अलग और विशिष्ट रही हैं। इसके बावजूद आज तक जनगणना और सरकारी अभिलेखों में आदिवासी समाज को उनकी वास्तविक पहचान नहीं मिल पाई। यही कारण है कि अब समय आ गया है जब आदिवासी समाज को उसकी असली पहचान दिलाने के लिए एक अलग ‘धर्म कोड’ की व्यवस्था की जाए। यह केवल एक प्रशासनिक मांग नहीं है, बल्कि करोड़ों आदिवासियों के आत्मसम्मान, संस्कृति और अस्तित्व से जुड़ा हुआ सवाल है।
आदिवासी समुदाय की आस्था और जीवन पद्धति किसी एक संगठित धर्म की तरह नहीं है। उनका जीवन प्रकृति के साथ जुड़ा है। जंगल, पहाड़, नदियां और धरती उनके लिए केवल संसाधन नहीं बल्कि पूजनीय तत्व हैं। आदिवासी समाज में प्रकृति पूजा, सामुदायिक परंपराएं और लोक देवताओं की मान्यता रही है। ये परंपराएं पीढ़ियों से चली आ रही हैं और इनकी अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान है। लेकिन, जब जनगणना में उन्हें किसी अन्य धर्म के अंतर्गत गिना जाता है, तो उनकी यह अलग पहचान धीरे-धीरे धुंधली पड़ने लगती है। यही कारण है कि अब आदिवासी समाज अपनी अलग धार्मिक पहचान को मान्यता दिलाने की मांग कर रहा है।
यह मांग अचानक नहीं जन्मी। देश के कई राज्यों में आदिवासी समाज लंबे समय से अलग धर्म कोड की मांग करता रहा है। झारखंड, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में यह मुद्दा समय-समय पर उठता रहा है। आज जब हम आदिवासी अधिकारों और उनके सम्मान की बात करते हैं, तो यह जरूरी हो जाता है कि उनकी पहचान को भी संवैधानिक और प्रशासनिक रूप से स्वीकार किया जाए। अगर आदिवासी समाज को लगातार अन्य धर्मों की श्रेणी में रखा जाता रहेगा, तो आने वाले समय में उनकी पारंपरिक आस्थाएं और सांस्कृतिक पहचान कमजोर पड़ सकती है। यह केवल सांस्कृतिक नुकसान नहीं होगा, बल्कि यह उनके अस्तित्व पर भी असर डाल सकता है।
आदिवासी समाज की इस मांग को देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचाने के लिए एक व्यापक जन आंदोलन की जरूरत है। इसलिए आदिवासी समाज से अपील की गई है, कि वे राष्ट्रपति को बड़े पैमाने पर पत्र भेजें। यदि केवल मध्य प्रदेश से ही 50 लाख आवेदन राष्ट्रपति के पास पहुंचते हैं, तो यह एक मजबूत संदेश होगा कि आदिवासी समाज अपनी पहचान के लिए एकजुट है। यह कदम लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने का माध्यम है। जब करोड़ों लोगों की आवाज एक साथ उठेगी, तभी सरकार को इस मांग पर गंभीरता से विचार करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
दुर्भाग्य से कुछ राजनीतिक दल इस मुद्दे की गंभीरता को समझने के बजाय इसका विरोध कर रहे हैं। भाजपा के मंत्री विश्वास सारंग ने इस मांग को लेकर आपत्ति जताई है और इसे अनावश्यक विवाद बताने की कोशिश की है। लेकिन, सवाल यह है कि अगर आदिवासी समाज अपनी पहचान की बात कर रहा है, तो उसमें आपत्ति क्यों होनी चाहिए। क्या अपनी संस्कृति और परंपराओं को बचाने की मांग करना गलत है? इस तरह के विरोध से यह संदेश जाता है कि कुछ लोग आदिवासी समाज की वास्तविक चिंताओं को समझने के बजाय राजनीतिक दृष्टिकोण से देख रहे हैं। जबकि, यह मुद्दा राजनीति से ऊपर उठकर आदिवासी अस्मिता से जुड़ा हुआ है।
भारत का संविधान विविधता और सांस्कृतिक स्वतंत्रता का सम्मान करता है। देश में अनेक धर्मों और परंपराओं को मान्यता दी गई है। ऐसे में आदिवासी समाज की अलग धार्मिक पहचान को स्वीकार करना भी उसी संवैधानिक भावना का हिस्सा है। यह किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के अधिकारों और सम्मान के लिए उठाई गई मांग है। जब तक आदिवासी समाज की पहचान को आधिकारिक रूप से मान्यता नहीं मिलेगी, तब तक उनकी संस्कृति को पूरी तरह सुरक्षित नहीं रखा जा सकेगा।
आज जरूरत इस बात की है कि आदिवासी समाज की आवाज को गंभीरता से सुना जाए। अलग धर्म कोड की मांग किसी राजनीतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता और संस्कृति को बचाने के लिए उठाई गई है। अगर हम सच में आदिवासी समाज का सम्मान करना चाहते हैं, तो उनकी पहचान को स्वीकार करना ही होगा। यह कदम केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं होगा, बल्कि यह करोड़ों आदिवासियों के आत्मसम्मान और अधिकारों को मजबूत करने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल साबित हो सकता है।
