
भोपाल। लोकायुक्त ने भोपाल नगर निगम में बिना काम कराए फर्जी बिलों के जरिए करोड़ों रुपए निकालने के मामले में छापेमारी कर रिकॉर्ड जब्त किया। यह कार्रवाई एक शिकायत के आधार पर की गई। इस शिकायत में कहा गया कि अपर आयुक्त गुणवंत सेवतकर ने कुछ कर्मचारियों के साथ मिलकर सॉफ्टवेयर की मदद से फर्जी बिल तैयार कराए और बिना काम कराए ही परिचितों व रिश्तेदारों की बनाई फर्मों के नाम पर करोड़ों रुपए का भुगतान कराया। इसके बदले कमीशन के रूप में मोटी रकम ली।
एसपी दुर्गेश राठौर ने बताया कि शुक्रवार को लोकायुक्त पुलिस की टीम ने नगर निगम के डाटा सेंटर कार्यालय समेत संबंधित शाखाओं में पहुंचकर दस्तावेज और डिजिटल रिकॉर्ड जब्त किए। प्रारंभिक जांच में मोटर वर्क शाखा, जल कार्य विभाग और सामान्य प्रशासन विभाग से जुड़े कुछ कार्यों में गंभीर अनियमितताओं के मामले सही पाए गए हैं। लोकायुक्त पुलिस ने भुगतान से जुड़े सर्वर का डाटा भी जब्त कर लिया है। अब इस डाटा की जांच के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।
एक साथ तीन ठिकानों पर छापेमारी
नवंबर 2025 में शिकायत हुई थी। प्रारंभिक जांच के बाद 9 मार्च को एफआईआर दर्ज की गई। इसके बाद 12 मार्च को कोर्ट से सर्च वारंट जारी कराया गया और 13 मार्च को सुबह 10:30 बजे कार्रवाई की गई। कार्रवाई के दौरान एक साथ तीन स्थानों पर छापेमारी की गई। इनमें नगर निगम की लेखा शाखा, कंप्यूटर शाखा के दो कार्यालय, लिंक रोड नंबर-2 स्थित मुख्य कार्यालय और फतेहगढ़ स्थित पुराना कार्यालय, साथ ही नगर निगम मुख्यालय में स्थित वित्त शाखा का कार्यालय शामिल है।
वारंट के बाद कार्रवाई की
नगर निगम में भ्रष्टाचार से जुड़ी शिकायत लोकायुक्त पुलिस को मिली थी। शिकायत में करोड़ों रुपए के फर्जी भुगतान का आरोप लगाया गया था। लोकायुक्त पुलिस ने शिकायत का प्रारंभिक सत्यापन किया, जिसमें कुछ तथ्य सही पाए जाने के बाद न्यायालय से वारंट प्राप्त किया गया। इसके बाद टीम ने निगम कार्यालय और डाटा सेंटर में छापेमारी की कार्रवाई शुरू की।
दस्तावेज और डिजिटल रिकॉर्ड जब्त किया
छापेमारी के दौरान लोकायुक्त टीम ने पिछले करीब 10 वर्षों से जुड़े रिकॉर्ड और फाइलों को अपने कब्जे में लिया है। इसके साथ ही भुगतान से जुड़े एसएपी (एसएपी) सॉफ्टवेयर का डाटा भी जब्त किया गया है। जांच एजेंसी अब इन दस्तावेजों और डिजिटल डाटा का विश्लेषण कर यह पता लगाएगी कि किन-किन कार्यों के नाम पर भुगतान किया गया और वास्तव में वे काम हुए भी थे या नहीं। साथ ही इनमें कौन-कौन सी फर्म और अधिकारियों की मिलीभगत थी।