
नई दिल्ली। राजधानी में निजी स्कूलों की फीस निर्धारण को लेकर मामला फिर अदालत पहुंच गया है। मंगलवार, 24 फरवरी को दिल्ली हाईकोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान निजी स्कूलों ने दिल्ली सरकार द्वारा स्कूल-स्तरीय फीस रेगुलेशन कमेटी (SLFRC) के गठन से जुड़े नोटिफिकेशन पर रोक लगाने की मांग की।
स्कूल प्रबंधन का कहना है कि सरकार उनकी मंशा को मुनाफाखोरी मानकर चल रही है, जबकि वास्तविक स्थिति इससे अलग है। उनका तर्क है कि यदि 1 अप्रैल से पहले फीस संरचना तय नहीं होती, तो वे जो भी शुल्क वसूलेंगे, उसे ‘बिना मंजूरी वाली फीस’ माना जा सकता है, जिससे अनावश्यक विवाद खड़ा होगा।
अप्रूव्ड फीस से ज्यादा नहीं, पर फीस तो ले सकते
निजी स्कूलों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अखिल सिब्बल ने अदालत में दलील दी कि संबंधित कानून के सेक्शन 3 की व्याख्या गलत ढंग से की जा रही है। उन्होंने कहा कि प्रावधान यह कहता है कि स्कूल स्वीकृत (अप्रूव्ड) फीस से अधिक राशि नहीं ले सकते, लेकिन यह कहीं नहीं लिखा कि वे फीस ही न लें। यानी एक बार जो फीस निर्धारित हो जाती है, उससे ज्यादा वसूली नहीं की जा सकती—पर इसका अर्थ “शून्य फीस” नहीं है। यह सुनवाई मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ के समक्ष हुई।
सभी स्कूलों को एक नजर से देखना ठीक नहीं
स्कूलों की ओर से यह भी कहा गया कि सरकार सभी निजी संस्थानों को एक ही पैमाने से आंक रही है, जबकि हर स्कूल की वित्तीय संरचना, सुविधाएं और संचालन खर्च अलग-अलग होते हैं। अधिवक्ता ने मौजूदा हालात को चिंताजनक बताते हुए कहा कि यदि SLFRC लागू नहीं होता, तो सरकार का यह मानना कि कोई भी फीस “अप्रूव्ड” नहीं होगी, कानून की मूल भावना के विपरीत है।
सरकार का पक्ष: समितियां बनीं तो समय पर तय होगी फीस
दूसरी ओर, दिल्ली सरकार की तरफ से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने दलील दी कि यदि फीस नियमन समितियों के गठन पर रोक लगती है, तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। सरकार का कहना है कि इन समितियों का उद्देश्य स्कूलों को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि नए शैक्षणिक सत्र से पहले फीस निर्धारण की पारदर्शी प्रक्रिया सुनिश्चित करना है। इससे अभिभावकों और स्कूलों के बीच विवाद की स्थिति कम होगी।
सुनवाई जारी, 1 अप्रैल पर टिकी नजर
मामले की सुनवाई अभी जारी है। 1 अप्रैल से नए सत्र की शुरुआत से पहले अदालत का रुख तय करेगा कि निजी स्कूलों की फीस संरचना किस ढांचे के तहत तय होगी। फिलहाल, यह मामला केवल फीस निर्धारण का नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, संस्थागत स्वायत्तता और अभिभावकों के हितों के संतुलन का भी बन गया है।