
खुलासा लाईव के संपादक विक्रम सेन की विशेष रिपोर्ट
मुंबई । इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की भू-राजनीतिक बिसात पर एक बड़ा कदम उठाते हुए अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया ने 8.5 बिलियन डॉलर (करीब ₹71,000 करोड़) की रेयर अर्थ (दुर्लभ खनिज) और क्रिटिकल मिनरल्स डील पर हस्ताक्षर किए हैं।
व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज़ की मौजूदगी में हुए इस समझौते को विशेषज्ञ चीन की सप्लाई चेन पर सीधी चोट के रूप में देख रहे हैं।
अमेरिका की रणनीति: चीन से दूरी, ऑस्ट्रेलिया से मजबूती
यह समझौता केवल आर्थिक पहल नहीं, बल्कि एक रणनीतिक चाल है — जिसका उद्देश्य रेयर अर्थ मिनरल्स के उत्पादन और प्रोसेसिंग में चीन की पकड़ को कमजोर करना है।
अब तक दुनिया के 90% से अधिक रेयर अर्थ मिनरल्स की प्रोसेसिंग चीन में होती है, जिनका इस्तेमाल इलेक्ट्रिक वाहनों, मिसाइल सिस्टम, रडार, सोलर पैनल और सेमीकंडक्टर जैसे उद्योगों में होता है।
समझौते के तहत,
अगले 6 महीनों में अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया 3 अरब डॉलर की परियोजनाओं में निवेश करेंगे।
क्रिटिकल मिनरल्स के लिए न्यूनतम मूल्य (Price Floor) तय किया गया है।
ऑस्ट्रेलियाई कंपनी “Lynas” टेक्सास में प्रोसेसिंग प्लांट स्थापित करेगी।
यह डील चार से पांच महीनों की गहन बातचीत के बाद पूरी हुई, जिसे ट्रंप प्रशासन ने “आर्थिक पाइपलाइन और सामरिक साझेदारी का नया अध्याय” बताया है।
चीन के लिए झटका, वैश्विक निर्भरता में बदलाव
चीन के पास दुनिया के सबसे बड़े रेयर अर्थ रिज़र्व्स हैं और वह वैश्विक निर्यात का प्रमुख केंद्र है।
लेकिन अमेरिका-ऑस्ट्रेलिया डील के बाद पश्चिमी देशों की चीन पर निर्भरता घटने के संकेत मिल रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह डील चीन की “खनिज-राजनीति” को चुनौती देती है, क्योंकि बीजिंग ने हाल के महीनों में इन खनिजों के निर्यात पर कड़े नियंत्रण लगाए हैं।
ऑस्ट्रेलिया लीथियम, कोबाल्ट और मैंगनीज उत्पादन में विश्व में शीर्ष 5 देशों में शामिल है।
इन खनिजों का उपयोग रक्षा उपकरणों, इलेक्ट्रिक वाहनों, पवन टर्बाइनों और चिप निर्माण तक में होता है।
भारत के लिए सबक: संसाधन कूटनीति का नया अवसर
भारत के लिए यह घटनाक्रम अत्यंत महत्वपूर्ण है।
जब अमेरिका अपने क्वाड सहयोगी ऑस्ट्रेलिया से खनिज ले सकता है, तो यह सवाल उठता है कि “क्या भारत भी अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए चीन या अन्य देशों से संसाधन समझौते नहीं कर सकता?”
भारत की ऊर्जा, रक्षा और इलेक्ट्रॉनिक क्षेत्र की ज़रूरतें लगातार बढ़ रही हैं, जबकि देश अभी भी कई महत्वपूर्ण खनिजों के लिए चीन पर निर्भर है।
ऐसे में विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को भी “स्ट्रैटेजिक रिसोर्स डिप्लोमेसी” के तहत अपने हितों के अनुरूप स्वतंत्र समझौते करने चाहिए।
भू-राजनीतिक असर: इंडो-पैसिफिक में शक्ति संतुलन का नया दौर
यह डील न केवल आर्थिक, बल्कि भू-राजनीतिक संतुलन का संकेत है।
अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया की यह पहल चीन की सप्लाई चेन डोमिनेशन को चुनौती देती है और क्वाड देशों के बीच औद्योगिक सहयोग का नया अध्याय खोलती है।
अब निगाहें भारत पर हैं —
क्या वह पश्चिमी रणनीति के अनुरूप चलेगा या अपने हितों की दिशा में स्वतंत्र नीति अपनाएगा?
यह तय है कि अमेरिका-ऑस्ट्रेलिया की यह डील केवल दो देशों के बीच आर्थिक समझौता नहीं, बल्कि रेयर अर्थ पॉलिटिक्स का नया अध्याय है।
यह न सिर्फ चीन की पकड़ को चुनौती देती है, बल्कि भारत जैसे उभरते राष्ट्रों के लिए भी यह संदेश है “वैश्विक राजनीति में संसाधन ही भविष्य की शक्ति हैं।”