
मुंबई। आज मध्य-पूर्व की धरती पर इतिहास रचा जा रहा है। 28 फरवरी 2026 को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने संयुक्त अभियान “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” शुरू किया। ईरान की राजधानी तेहरान समेत परमाणु केंद्रों, मिसाइल ठिकानों और नौसेना पर भारी बमबारी हुई। ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई की हत्या हो चुकी है। अमेरिकी सैनिकों की मौत छह से अधिक हो गई है, जबकि ईरान में सैकड़ों नागरिक मारे गए हैं। ट्रंप ने साफ कहा, “ईरान की बिना शर्त समर्पण” के बिना कोई समझौता नहीं। नेतन्याहू का लक्ष्य पूरा शासन बदलना है।
यह युद्ध सीमाओं का नहीं, तेल, समुद्री मार्गों और वैश्विक शक्ति का युद्ध है।
ईरान लंबे समय से मध्य-पूर्व की शक्ति-राजनीति का केंद्रीय स्तंभ रहा है। उसके परमाणु कार्यक्रम, बैलिस्टिक मिसाइलें और क्षेत्रीय प्रॉक्सी नेटवर्क (हिजबुल्लाह, हूती, इराकी मिलिशिया) अमेरिका-इजरायल की नींद उड़ाते रहे। जून 2025 के हमलों के बाद भी ईरान ने अपना कार्यक्रम फिर से खड़ा करने की कोशिश की। ट्रंप प्रशासन ने इसे “अभी या कभी नहीं” का मौका मानकर हमला बोल दिया। अब ईरान की सेना कमजोर, नौसेना लगभग नष्ट और मिसाइल स्टॉक भारी क्षति में है।
सबसे बड़ा दांव: स्ट्रेट ऑफ हरमुज
फारस की खाड़ी का यह संकीर्ण जलडमरूमध्य विश्व ऊर्जा का गला है। 2025 के पहले छह महीनों में यहां से रोजाना 20.9 मिलियन बैरल कच्चा तेल गुजरता था, यानी विश्व की कुल तेल खपत का लगभग 20% और समुद्री तेल व्यापार का 27%। सऊदी अरब, इराक, यूएई, कुवैत और ईरान का तेल मुख्य रूप से यहीं से एशिया (चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया) जाता है।
युद्ध शुरू होते ही ईरान ने हरमुज को प्रभावी रूप से बंद कर दिया। टैंकर ट्रैफिक 80% घट गया। सऊदी रिफाइनरी पर ड्रोन हमला हुआ, कतर के गैस प्लांट प्रभावित। तेल की कीमतें 9% तक उछल गईं। एशिया की अर्थव्यवस्थाएं (खासकर भारत और चीन) सबसे ज्यादा संकट में हैं। अगर यह स्थिति लंबी चली तो वैश्विक मंदी का खतरा मंडरा रहा है।
खाड़ी देशों की नई चिंता और ओपेक की भूमिका
सऊदी अरब, यूएई और अन्य खाड़ी राष्ट्र लंबे समय से स्थिरता के प्रतीक रहे। लेकिन अब ईरान के जवाबी हमलों का डर सताने लगा है। सऊदी अरामको ने रेड सी पोर्ट के जरिए निर्यात बढ़ाया, लेकिन हरमुज पर निर्भरता बनी हुई है। ओपेक+ ने तुरंत प्रतिक्रिया दी, अप्रैल 2026 से रोजाना अतिरिक्त 2,06,000 बैरल उत्पादन बढ़ाने का फैसला किया। यह बाजार को शांत करने की कोशिश है, लेकिन अगर हरमुज बंद रहा तो सऊदी-कुवैत-यूएई की अतिरिक्त क्षमता भी काम नहीं आएगी।
विश्लेषक कहते है, भविष्य में तेल राजस्व का बड़ा हिस्सा अब सुरक्षा, रक्षा तकनीक और रणनीतिक गठबंधनों पर खर्च होगा।
खाड़ी राज्यों की अकूत संपन्नता पर मंडराता खतरा और स्थायी ‘संरक्षण शुल्क’ का मॉडल
सऊदी अरब समेत खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के प्रमुख सात तेल-समृद्ध राष्ट्र, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, कुवैत, बहरीन, ओमान तथा क्षेत्रीय सहयोगी, विश्व की सबसे धनी अर्थव्यवस्थाएं हैं। इनके संप्रभु धन कोष (Sovereign Wealth Funds) कुल मिलाकर कई ट्रिलियन डॉलर के हैं। सऊदी अरब का पब्लिक इन्वेस्टमेंट फंड (PIF) अकेले 1.15 ट्रिलियन डॉलर से ऊपर, जबकि यूएई के फंड्स 2.9 ट्रिलियन डॉलर के करीब पहुंच चुके हैं। ये देश विज़न 2030 और मेगा प्रोजेक्ट्स के जरिए आर्थिक विविधीकरण की ओर बढ़ रहे थे।
लेकिन वर्तमान ईरान युद्ध और क्षेत्रीय टकराव ने इनकी इस अभूतपूर्व संपन्नता को सीधे खतरे में डाल दिया है। फारस की खाड़ी में अस्थिरता, स्ट्रेट ऑफ हरमुज पर हमले की आशंका, तेल रिफाइनरियों और बंदरगाहों पर ईरानी हमले — रास तनुरा रिफाइनरी (सऊदी) को नुकसान, कतर का एलएनजी उत्पादन ठप, बहरीन-कुवैत-यूएई के अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइलें, इन सबने खाड़ी की आर्थिक सुरक्षा को हिला दिया है।
यह खतरा संयोग नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से बनाए रखा जा रहा है। अमेरिका और इजरायल की नीति इन देशों को हमेशा एक ‘नियंत्रित असुरक्षा’ में रखने की है, ताकि वे स्थायी रूप से अमेरिकी-इजरायली सुरक्षा छत्र के नीचे रहें और भारी संरक्षण शुल्क चुकाते रहें, हथियार खरीद, सैन्य अड्डे प्रदान और आर्थिक साझेदारी के रूप में।
तथ्य इसकी पुष्टि करते हैं:
• मई 2025 में ट्रंप प्रशासन ने सऊदी अरब के साथ 142 बिलियन डॉलर का इतिहास का सबसे बड़ा रक्षा सौदा किया।
• जनवरी 2026 में सऊदी को पैट्रियट एडवांस्ड कैपेबिलिटी-3 मिसाइल सिस्टम के लिए अतिरिक्त अरबों डॉलर के सौदे मंजूर हुए।
• सऊदी अरब का वार्षिक रक्षा बजट अब 78 बिलियन डॉलर से ऊपर पहुंच चुका है।
• अमेरिका के प्रमुख सैन्य अड्डे इन देशों में हैं , कतर का अल-उदीद एयर बेस (CENTCOM मुख्यालय, 10,000+ सैनिक), बहरीन में यूएस नेवी की 5th फ्लीट, यूएई का अल-धफरा और कुवैत के बड़े कैंप।
ईरान की शक्ति घटने के बावजूद उसके प्रॉक्सी और बची क्षमता इन देशों में असुरक्षा का माहौल बनाए रखेगी। नतीजतन, खाड़ी के ये अमीर राष्ट्र अपनी तेल संपदा का बड़ा हिस्सा अमेरिकी हथियार कंपनियों और सुरक्षा ढांचे को देते रहेंगे। उनकी स्वतंत्र रणनीतिक विकास की राह सीमित हो जाएगी। यह सुरक्षा के नाम पर आर्थिक निर्भरता की नई व्यवस्था है, जहां संपन्नता का खतरा इन देशों को हमेशा अमेरिका-इजरायल के संरक्षण के लिए तैयार रखता है।
ईरान के प्रॉक्सी और क्षेत्रीय फैलाव
ईरान अकेला नहीं लड़ रहा। लेबनान का हिजबुल्लाह इजरायल पर रॉकेट दाग चुका है। यमन के हूती फिर लाल सागर में जहाजों पर हमले की तैयारी में हैं। इराक की पीएमएफ मिलिशिया ने अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया। ये संगठन ईरान की क्षेत्रीय ताकत के प्रतीक थे। अब इनके कमजोर होने से लेबनान, सीरिया, यमन और इराक में शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल सकता है।
ट्रंप-नेतन्याहू की रणनीति: वेनेजुएला मॉडल?
ट्रंप ने बार-बार कहा “ईरान के लोग उठ खड़े हों, सरकार अपने हाथ में ले लो।” लेकिन उनका असली मॉडल वेनेजुएला जैसा लगता है, जहां मैडुरो के बाद एक नया, अमेरिका के प्रति अनुकूल नेता आया। ट्रंप चाहते हैं कि ईरान का कोई नया “मजबूत शासक” तेल उद्योग में अमेरिका को हिस्सेदारी दे और परमाणु-मिसाइल कार्यक्रम छोड़ दे। नेतन्याहू का लक्ष्य ज्यादा व्यापक, पूरा शासन तहस-नहस। दोनों के बीच यह खिंचतान युद्ध को लंबा खींच सकती है।
भारत और विश्व अर्थव्यवस्था पर असर
भारत जैसे देश जो 80% तेल आयात करते हैं, उनके लिए यह संकट गंभीर है। हरमुज बंद रहने पर पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छू सकती हैं, मुद्रास्फीति बढ़ेगी और विकास दर प्रभावित होगी। वैश्विक स्तर पर भी यही स्थिति है। इतिहास गवाह है— मध्य-पूर्व का कोई भी संकट सीमित नहीं रहता। 1970 के दशक का तेल संकट याद कीजिए। आज फिर वही दौर लौट रहा है।
नई जंग की शुरुआत
ईरान युद्ध केवल एक देश के खिलाफ नहीं। यह तेल के नियंत्रण, समुद्री मार्गों की सुरक्षा, खाड़ी की संपन्नता पर खतरा और वैश्विक शक्ति संतुलन की नई जंग है। अगर अमेरिका-इजरायल यहां सैन्य अड्डे मजबूत कर लेते हैं और ईरान की शक्ति खंडित हो जाती है, तो पूरा मध्य-पूर्व नई दिशा में जाएगा। लेकिन सवाल यह है, क्या यह स्थायी शांति लाएगा या नई अस्थिरता?
वर्तमान में एक बात निश्चित है, पुरानी रणनीति खत्म हो चुकी है। अब तेल, शक्ति और सुरक्षा की नई जंग शुरू हो गई है। विश्व की महाशक्तियां और उभरती अर्थव्यवस्थाएं इसकी कीमत चुकाने को तैयार रहें।
