
इंदौर। चर्चित भागीरथपुरा दूषित पानी मामले में मौतों का सिलसिला लगातार चिंता बढ़ा रहा है। अब तक इस घटना में 35 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि 450 से ज्यादा लोग बीमार होकर अस्पताल से इलाज के बाद घर लौट चुके हैं। इस गंभीर मामले को लेकर सरकार पहले ही सवालों के घेरे में है।
इसी बीच सामने आई दूसरी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने मामले को और रहस्यमय बना दिया है, क्योंकि इसमें भी मौत की स्पष्ट वजह का उल्लेख नहीं किया गया है। रिपोर्ट में केवल चिकित्सीय तथ्य दर्ज किए गए हैं, जिससे पूरे मामले पर नए सवाल खड़े हो गए हैं। यह रिपोर्ट 74 वर्षीय मंजूला वाढे की मौत से संबंधित है। बताया गया कि 29 दिसंबर की रात दूषित पानी पीने के बाद उन्हें अचानक उल्टी-दस्त की समस्या शुरू हो गई थी। उनके पति दिगंबर वाढे पूरी रात उनकी देखभाल करते रहे, लेकिन उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती रही। रात में मदद के लिए कोई उपलब्ध नहीं था। सुबह जब दिगंबर मदद के लिए बाहर निकले तो गली में नगर निगम की टीम सर्वे कर रही थी। डॉक्टरों ने मंजूला की हालत गंभीर बताकर उन्हें तुरंत एमवाय अस्पताल ले जाने की सलाह दी। एम्बुलेंस से अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया।
पोस्टमॉर्टम के बाद ही शव सौंपा
मंजूला के पति दिगंबर ने अस्पताल से शव सौंपने की मांग की थी, लेकिन अस्पताल प्रशासन ने पहले पोस्टमॉर्टम कराने की बात कही। दिगंबर इस प्रक्रिया के पक्ष में नहीं थे, फिर भी अस्पताल का कहना था कि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि मौत दूषित पानी से हुई या किसी अन्य कारण से, इसलिए पोस्टमॉर्टम किया गया।
रिपोर्ट में सामने आए तथ्य
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कुछ चिकित्सीय जानकारी दर्ज की गई है। लेकिन, मौत की वास्तविक वजह स्पष्ट नहीं की गई। रिपोर्ट के प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं :
– पुलिस द्वारा दिए गए ऑटोप्सी रिक्वीजिशन फॉर्म में मौत को दूषित पानी से जोड़ने का आरोप दर्ज किया गया।
– मृतका के पेट में लगभग 100 मिली पीला द्रव पाया गया।
– लिवर, गॉलब्लैडर और स्प्लीन में कंजेशन पाया गया।
– विसरा को केमिकल एनालिसिस के लिए सुरक्षित रखा गया है।
– आंत को कल्चर और सेंसिटिविटी जांच के लिए माइक्रोबायोलॉजी विभाग भेजा गया है।
इन तथ्यों के बावजूद रिपोर्ट में मौत का अंतिम कारण स्पष्ट नहीं बताया गया है।
सरकार की दलीलों पर सवाल
इस पूरे मामले को लेकर हाईकोर्ट में जनहित याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है। सरकार ने इसे महामारी घोषित किया है। सीनियर एडवोकेट नीरज सोनी का कहना है कि जब कोरोना महामारी के दौरान मौतों में पोस्टमॉर्टम कराया गया था, तो भागीरथपुरा में हुई मौतों में भी यही प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए थी। उनके अनुसार, अगर पोस्टमॉर्टम नहीं कराया जाता तो सरकार भविष्य में यह कह सकती थी कि मौतें सामान्य कारणों से हुई हैं और मुआवजा देने की जरूरत नहीं है। इसलिए पोस्टमॉर्टम कराना आवश्यक था।
‘वर्बल ऑटोप्सी’ पर भी विवाद
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सीएमएचओ डॉ. माधव हसानी ने ‘वर्बल ऑटोप्सी’ शब्द का इस्तेमाल किया। उनका कहना था कि अस्पताल से मिली जानकारी के आधार पर मौत दर्ज की गई, जबकि कारण की विधिवत पुष्टि नहीं हुई थी। हालांकि, पिछली सुनवाई में हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया था। कोर्ट की टिप्पणी से स्पष्ट हुआ कि मामले में अभी भी कई पहलुओं की गंभीर जांच जरूरी है। कुल मिलाकर, दूसरी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आने के बाद भी भागीरथपुरा में हुई मौतों की असली वजह अब तक सामने नहीं आ सकी है, जिससे पूरे मामले की जांच और भी अहम हो गई है।