

भोपाल। नए वित्तीय वर्ष से पहले शराब ठेकों की अवधि खत्म होने में अभी समय है। लेकिन, राजधानी भोपाल सहित देवास, नर्मदापुरम और एक दर्जन से अधिक शहरों में शराब 30% से 50% फीसदी तक छूट पर बेची जा रही है। दो हफ्ते पहले तक महंगी शराब की शिकायतें थीं, अब कई दुकानों पर एक के साथ एक फी और लागत मूल्य के आसपास बिक्री हो रही है। बाजार में आई इस अचानक गिरावट ने आबकारी नीति, प्रतिस्पर्धा और सिस्टम तीनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
दो महीने पहले ही भारी डिस्काउंट शुरू हो गया
जानकार बताते हैं कि आम तौर पर 31 मार्च से ठीक पहले स्टॉक क्लियरेंस के लिए सीमित छूट दी जाती है। लेकिन, इस बार दो महीने पहले ही भारी डिस्काउंट शुरू हो गया। भोपाल में एक बड़े समूह द्वारा 50% तक छूट दिए जाने की चर्चा है। शहर में दो प्रमुख समूह सक्रिय हैं। एक के पास 62 और दूसरे के पास 25 दुकानें बताई जाती हैं। जिन जिलों में ठेकेदारों का सिंडिकेट मजबूत है, वहां कीमतें नियंत्रित और छूट सीमित है। जहां सिंडिकेट नहीं, वहां आपसी प्रतिस्पर्धा ने कीमतों को तेजी से नीचे ला दिया है।
न्यूनतम कीमत की बंदिश
मध्य प्रदेश आबकारी विभाग की आबकारी नीति 2025-26 में स्पष्ट है कि शराब की बिक्री एमआरपी से अधिक और एमएसपी से कम दर पर नहीं की जा सकती। ठेकेदारों का तर्क है कि हर माह कम से कम 85% स्टॉक उठाना अनिवार्य है। तय मात्रा न लेने पर भारी पेनल्टी लगती है। ऐसे में लाइसेंस अवधि समाप्त होने से पहले स्टॉक निकालना उनके लिए व्यावसायिक मजबूरी बन जाता है। सवाल यह है कि अगर बिक्री एमएसपी से नीचे नहीं हो सकती, तो 50% तक की छूट किस आधार पर दी जा रही है।
कार्रवाई होने पर हुआ असर
भोपाल में मौजूदा वित्तीय वर्ष में 14 ठेकेदारों पर प्रकरण दर्ज किए गए। 13 में एमआरपी से अधिक और एक में एमएसपी से कम दर पर बिक्री के मामले सामने आए। विभाग के पास एमआरपी और एमएसपी उल्लंघन पर कार्रवाई का अधिकार है और दंडात्मक कदम उठाए भी गए हैं। फि र भी, बाजार में जारी बड़े पैमाने की छूट यह संकेत देती है कि या तो निगरानी पर्याप्त नहीं है या फिर नियमों के भीतर रहकर कीमतें घटाने के रास्ते निकाले जा रहे हैं। राज्य को आबकारी से सालाना 14 हजार करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व मिलता है। नए वित्तीय वर्ष में 19,000 करोड़ रुपये का लक्ष्य संभावित बताया जा रहा है।