
विपक्ष के सांसदों ने मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै खंडपीठ के न्यायमूर्ति जीआर स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग चलाने की मांग करते हुए संसद के दोनों सदनों में नोटिस दाखिल किए हैं। यह कार्रवाई तमिलनाडु के तिरूपरनकुंड्रम पहाड़ी पर कार्तिकई दीपम उत्सव के दौरान पारंपरिक दीपक जलाने को लेकर हुए विवाद में न्यायाधीश के हालिया आदेश से संबंधित है। इसे विपक्षी सांसद संविधान के अनुच्छेद 218 के तहत ‘सिद्ध दुर्व्यवहार और अक्षमता’ मानता है। मुख्य रूप से डीएमके द्वारा समन्वित ये महाभियोग नोटिस लोकसभा और राज्यसभा में दाखिल किए गए हैं। इन पर सौ से अधिक लोकसभा सांसदों और पचास राज्यसभा सदस्यों के हस्ताक्षर हैं, जो कार्यवाही शुरू करने के लिए आवश्यक न्यूनतम संख्या को पूरा करते हैं। नोटिस में आरोप लगाया गया कि उक्त न्यायाधीश के आचरण से न्यायिक निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं। इन पर एक वरिष्ठ अधिवक्ता और एक विशेष समुदाय के अभिभाषकों को अनुचित पक्षपात दिखाने का आरोप भी लगाया गया। यह दावा भी किया गया कि उनके फैसले एक विशेष राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित थे, जो धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक सिद्धांतों के विरूद्ध थे।
यह विवाद मदुरै के तिरूपरनकुंड्रम पहाड़ी पर स्थित सुब्रमण्य स्वामी मंदिर में शुरू हुआ, जो हिंदू परंपरा में वार्षिक कार्तिकई दीपम उत्सव के लिए एक पवित्र स्थल है। कार्तिकई दीपम तमिलनाडु और दक्षिण भारत के अन्य हिस्सों में मनाया जाने वाला एक प्रमुख हिंदू त्यौहार है। इस पहाड़ी पर एक दरगाह भी है। हिंदू तमिलर काची के संस्थापक सीमान (जिन्हें रामा रविकुमार के नाम से भी जाना जाता है) द्वारा दायर एक याचिका पर, न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने तमिलनाडु के सुब्रमण्य स्वामी मंदिर के अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे मदुरै जिले में स्थित दीपस्तून (स्तंभ) पर दीपक प्रज्वलित करना सुनिश्चित करें। पीठ ने कहा कि ऐसा करने से आस-पास की दरगाह या मुस्लिम समुदाय के अधिकारों का उल्लंघन नहीं होगा। जब यह आदेश लागू नहीं हुआ, तो एकल न्यायाधीश ने 3 दिसंबर को एक और आदेश पारित किया। इसमें श्रद्धालुओं को स्वयं दीपक जलाने की अनुमति दी गई।
साथ ही केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) को उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया। 4 दिसंबर 2025 को न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने अवमानना याचिका पर पुनः सुनवाई की। उन्होंने पाया कि यद्यपि याचिकाकर्ता सीआईएसएफ कर्मियों के साथ पहाड़ी की तलहटी तक पहुंच गए थे, फिर भी मदुरै शहर के पुलिस आयुक्त लोगनाथन, आईपीएस ने उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया। इसके लिए मदुरै के जिला मजिस्ट्रेट और कलेक्टर द्वारा जारी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 163 (पूर्ववर्ती धारा 144 सीआरपीसी) के तहत एक आदेश का हवाला दिया। परिणामस्वरूप, सीआईएसएफ दल वापस लौट गया और याचिकाकर्ता न्यायालय की स्पष्ट अनुमति के बावजूद दीप प्रज्वलित नहीं कर सके।
संवैधानिक ढांचे को क्रियान्वित करने के लिए, विस्तृत प्रक्रियात्मक पहलुओं को सन् 1968 के न्यायाधीश जांच अधिनियम में निहित किया गया है। यह विधायी दस्तावेज उन चरणों की एक संरचित श्रृंखला को रेखांकित करता है जिनका सावधनीपूर्वक पालन हटाने की प्रक्रिया में निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए किया जाना चाहिए। अधिनियम के तहत हटाने की प्रक्रिया की शुरूआत संसद के किसी भी सदन के अध्यक्ष या अध्यक्ष को नोटिस प्रस्तुत करने से होती है। विशेष रूप से राज्यसभा सदस्यों या कम से कम सौ लोकसभा सदस्यों द्वारा नोटिस पर हस्ताक्षर किए जाने चाहिए। नोटिस प्राप्त होने पर, अध्यक्ष प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करने का महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले संबंधित व्यक्तियों और सामग्री से परामर्श करते हैं। यदि प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो अध्यक्ष या चेयरमैन आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन करते हैं। इस समिति का काफी महत्व होता है। इसमें सर्वोच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित न्यायविद शामिल होते हैं। शिकायत के आधार पर आरोप तय किए जाते हैं। इसकी एक विस्तृत प्रति संबंधित न्यायाधीश को भी दी जाती है। इससे उन्हें लिखित बचाव प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है।
जांच पूरी होने पर, अध्यक्ष या चेयरमैन को एक विस्तृत रिपोर्ट सौंपी जाती है। रिपोर्ट के साथ ही प्रक्रिया का अगला चरण शुरू होता है। इसमें संसदीय विचार-विमर्श और निष्कासन प्रस्ताव पर बहस शामिल होती है। निष्कासन प्रस्ताव को आगे बढ़ाने के लिए संसद के दोनों सदनों से अनुमोदन प्राप्त करना आवष्यक है। इसके लिए मापदंड सख्त है। इसके लिए सदन की कुल सदस्यता का बहुमत और उससे भी महत्वपूर्ण, उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई सदस्यों का बहुमत आवश्यक है। दोनों सदनों में निष्कासन प्रस्ताव के सफलतापूर्वक पारित होने पर, इसे अध्यक्ष को भेजा जाता है। इस प्रक्रिया में अंतिम निर्णायक के रूप में राष्ट्रपति, न्यायाधीश को हटाने का आधिकारिक आदेश जारी करते हैं, बशर्तें कि याचिका आवश्यक बहुमत मानदंडों को पूरा करती हो। यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है अब तक किसी भी भारतीय न्यायाधीश पर महाभियोग नहीं चलाया गया है।
सन् 1993 में, न्यायमूर्ति वी रामास्वामी महाभियोग की कार्यवाही का सामना करने वाले पहले न्यायाधीश बने। लोकसभा में प्रस्ताव पेश किए जाने के बावजूद, इसे आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल सका। इससे महोभियोग प्रक्रिया में आने वाली चुनौतियों के लिए एक मिसाल कायम हुई। वर्ष 2011 में, राज्यसभा द्वारा उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पारित किए जाने के बाद कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सौमित्र सेन ने इस्तीफा दे दिया था। न्यायमूर्ति सेन कदाचार के लिए उच्च सदन द्वारा महाभियोग का सामना करने वाले पहले न्यायाधीश बने। जुलाई 2011 में, सिक्किम उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति पीडी दिनाकरन ने भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बीच इस्तीफा दे दिया।
उनका मामला इसलिए उल्लेखनीय है कि महाभियोग की कार्यवाही शुरू होने वाली थी और राज्यसभा अध्यक्ष ने आरोपों की जांच के लिए एक न्यायिक पैनल का गठन किया था। सन् 2015 के 58 सदस्यों ने गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला के खिलाफ महाभियोग नोटिस शुरू किया। इस कार्रवाई का आधार पारदीवाला की आरक्षण के मुद्दे पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणियां थीं। उसी वर्ष, राज्यसभा के पचास से अधिक सदस्यों ने न्यायमूर्ति एसके गंगेले को हटाने के लिए एक प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे। इन पर ग्वालियर के एक पूर्व जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया गया था। हालांकि, न्यायाधीश जांच अधिनियम, 1968 के तहत गठित एक जांच समिति ने पाया कि रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री यौन उत्पीड़न के आरोप को साबित करने के लिए अपर्याप्त थी। परिणामस्वरूप, प्रस्ताव वापस ले लिया गया।
मार्च 2025 में, दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के आधिकारिक आवास में आग लगने की घटना में भारी मात्रा में अज्ञात नकदी बरामद हुई। इसके बाद, भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त तीन न्यायाधीशों के पैनल ने जांच की और निष्कर्ष निकाला कि वर्मा नकदी के भंडार का संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सके। पैनल ने पाया कि वर्मा का कदाचार इतना गंभीर था कि उनके खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू की जा सकती थी। जुलाई 2025 की शरूआत तक, सरकार को कथित तौर पर निचले सदन के सौ से अधिक सदस्यों का समर्थन प्राप्त हो गया था। इसके चलते उन्हें पद से हटाने का प्रस्ताव पेष किया जा सकता था। इसके बाद, लोकसभा अध्यक्ष ने संबंधित कानून (न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968) के तहत आरोपों की आगे जांच करने के लिए तीन सदस्यीय पैनल का गठन करके प्रक्रिया शुरू कर दी है।
इस प्रकार के मामलों में मुख्य चिंता यह है कि यदि राजनीतिक दल प्रतिकूल फैसलों पर न्यायाधीशों को महाभियोग की धमकी दे सकते हैं, तो न्यायपालिका की स्वतंत्र रूप से और बिना किसी भय या पक्षपात के कार्य करने की क्षमता इससे गंभीर रूप से प्रभावित होगी। मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जीआर स्वामीनाथन पर महाभियोग चलाने के प्रस्ताव की आलोचना इस तर्क पर भी केंद्रित है कि यह न्यायिक स्वतंत्रता को कमजोर करता है। साथ ही एक अलोकप्रिय फैसला सुनाने वाले न्यायाधीश के खिलाफ राजनीतिक प्रतिशोध का एक भी रूप है। इसे रोका जाना चाहिए। जब तक आवष्यक न हो, तब तक न्यायाधीश के विरूद्ध महाभियोग प्रस्ताव नहीं लाना चाहिए। सभी को इस मानसिकता से मुक्त होना आवश्यक है। स्वतंत्र न्यायपालिका के हित में यह उम्मीद की जानी चाहिए कि वे सांसद भी इस पर पुर्नविचार करेंगे, जिन्होंने उक्त न्यायाधीश के विरूद्ध महाभियोग का प्रस्ताव पेश किया है।
