
विक्रम सेन नई दिल्ली : सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस अहसनुद्दीन अमानुल्लाह की बेंच ने गुजारा भत्ता मांगने वाली एक महिला की अपील पर सुनवाई करते हुए 2014 के एक फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि काजी की अदालत, काजियात की अदालत व शरिया कोर्ट की कानून में कोई मान्यता नहीं है। न्यायमूर्ति अमानुल्लाह ने टिप्पणी की , ‘काजी की अदालत’, ‘दारुल कजा’ या ‘शरिया अदालत’ के रूप में पहचाने जाने वाले निकायों का, चाहे उनका लेबल कुछ भी हो, कोई कानूनी दर्जा नहीं है। जैसा कि विश्व लोचन मदन में पहले कहा गया था, उनके द्वारा जारी कोई भी आदेश या निर्देश बाध्यकारी नहीं है न ही इसे बलपूर्वक लागू किया जा सकता है। ऐसे निर्णय केवल तभी प्रासंगिक हो सकते हैं जब पक्षकार स्वेच्छा से उन्हें स्वीकार करें और तब भी केवल तब तक जब तक कि वे किसी मौजूदा कानून का उल्लंघन न करें।’प्राप्त जानकारी अनुसार एक महिला शहजाहन ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें पारिवारिक न्यायालय ने अपने निष्कर्षों को आंशिक रूप से, ‘काजी कोर्ट’ के समक्ष प्रस्तुत किए गए समझौते पर आधारित किया था।बाद में महिला ने शीर्ष अदालत का रुख किया, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने 4 फरवरी को आदेश दिया। हालांकि, यह आदेश अब सामने आया है। इस मामले में विस्तृत जानकारी अनुसार अपीलकर्ता-पत्नी और प्रतिवादी-पति दोनों ने इस्लामी रीति-रिवाजों का पालन करते हुए 24 सितंबर, 2002 को अपना दूसरा विवाह किया। 2005 में पति ने भोपाल में ‘काजी की अदालत’ के समक्ष तलाक की कार्रवाई शुरू की जिसे 22 नवंबर, 2005 को समझौता होने के बाद खारिज कर दिया गया।वर्ष 2008 में हालांकि पति ने फिर से ‘दारुल कजा’ के समक्ष तलाक के लिए अर्जी दी। लगभग उसी समय पत्नी ने आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की मांग करते हुए पारिवारिक न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। साल 2009 में दारुल कजा की अदालत ने तलाक को मंजूरी दे दी और तलाकनामा जारी हुआ, लेकिन फैमिली कोर्ट ने शहजाहन की भरण-पोषण की मांग को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि शहजाहन के पति ने उन्हें नहीं छोड़ा, बल्कि शहजाहन के स्वभाव की वजह से विवाद हुआ और वह खुद घर छोड़कर चली गईं। सुप्रीम कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के इस तर्क को गलत ठहराया। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को दृढ़ता से अस्वीकार करते हुए कहा: ‘यह धारणा कि दूसरी शादी से दहेज की मांग का जोखिम अपने आप खत्म हो जाता है, काल्पनिक और कानूनी आधारहीन दोनों है। इस तरह के तर्क का न्यायिक निष्कर्षों में कोई स्थान नहीं है।’सुप्रीम कोर्ट ने पारिवारिक न्यायालय द्वारा समझौता विलेख पर भरोसा करने को भी खारिज कर दिया। न्यायालय ने पाया कि 2005 में दर्ज किए गए समझौते में अपीलकर्ता-पत्नी द्वारा गलती स्वीकार करने का कोई उल्लेख नहीं था। इसके बजाय यह केवल पक्षों के शांतिपूर्ण तरीके से साथ रहने के आपसी निर्णय को दर्शाता है।सुप्रीम कोर्ट ने पारिवारिक अदालत के फैसले को अस्थायी बताते हुए कहा, ‘अपीलकर्ता के दावे को खारिज करना समझौते की गलत व्याख्या पर आधारित था और इसमें कोई ठोस आधार नहीं है।’सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिवादी-पति को अपीलकर्ता-पत्नी को 4,000 रुपये का मासिक भरण-पोषण देने का आदेश दिया जो उस तारीख से प्रभावी होगा जिस दिन से उसने सहायता मांगने के लिए अपनी मूल याचिका दायर की थी।